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होर्मुज बना ईरान का परमानेंट हथियार? अमेरिका से संभावित डील ने खाड़ी देशों की नींद क्यों उड़ा दी है

खाड़ी देशों के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि अमेरिका और ईरान की कूटनीति अब केवल यूरेनियम एनरिचमेंट पर रोक और तेल सप्लाई के अहम रास्ते होर्मुज को खुला रखने तक सीमित होती नजर आ रही है.

होर्मुज बना ईरान का परमानेंट हथियार? अमेरिका से संभावित डील ने खाड़ी देशों की नींद क्यों उड़ा दी है
  • अमेरिका और इजरायल के खिलाफ युद्ध में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है
  • खाड़ी देशों को डर है कि अमेरिका खुद को बचाने के लिए ईरान की इस नई ताकत को स्वीकार कर सकता है
  • अमेरिका क्षेत्रीय देशों को भरोसे में लिए बिना अकेले ही फैसला कर रहा जबकि खामियाजा खाड़ी देशों को भुगतना पड़ेगा
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अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में दूसरे दौर की वार्ता शुरू होने वाली है और खाड़ी देश एक नई चिंता में घिरे हैं. अधिकारियों और एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस वार्ता का फोकस अब ईरान का मिसाइल प्रोग्राम या उसके प्रॉक्सी संगठनों पर नकेल कसना नहीं बल्कि होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का कंट्रोल हो गया है. खाड़ी देशों को डर है कि अमेरिका अपना चेहरा बचाने के लिए ईरान की इस नई ताकत को स्वीकार कर सकता है. ऐसा हुआ तो क्षेत्र में ईरान का दबदबा हमेशा के लिए कायम हो जाएगा.

होर्मुजः ईरान का 'परमाणु हथियार'

रूस के पूर्व राष्ट्रपति और सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष दिमित्री मेदवेदेव के एक हालिया बयान ने खाड़ी देशों के इस डर को और पुख्ता कर दिया है. मेदवेदेव ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान ने अपने 'परमाणु हथियार' का परीक्षण कर लिया है और इसका नाम है- होर्मुज जलडमरूमध्य. ईरानी सुरक्षा सूत्र भी मानते हैं कि होर्मुज स्ट्रेट अब ईरान का "गोल्डन एसेट" (बहुमूल्य संपत्ति) बन चुका है. क्षेत्रीय भूगोल की इस देन को अब उससे कोई नहीं छीन सकता. यह ईरान की ऐसी अटूट ताकत बन गई है, उसे परमाणु सीमा लांघे बिना भी उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने की ताकत देती है. यह लंबे समय तक के लिए उसका हथियार बन चुका है.

यूरेनियम और तेल पर फोकस ज्यादा

खाड़ी देशों के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि अमेरिका और ईरान की कूटनीति अब केवल यूरेनियम एनरिचमेंट पर रोक और तेल सप्लाई के रास्ते को खुला रखने तक सीमित होती नजर आ रही है. अमीरात पॉलिसी सेंटर की प्रेसिडेंट एब्तेसाम अल केतबी का कहना है कि जो समझौता होता दिख रहा है, वो कोई ऐतिहासिक डील नहीं  बल्कि "सतत संघर्ष की इंजीनियरिंग" ज्यादा नजर आता है. ईरान की मिसाइलें और उसके प्रॉक्सी संगठन बड़ा खतरा बन चुके हैं, लेकिन वार्ता में ये मुद्दे हाशिए पर हैं. अब ज्यादा जोर होर्मुज को खुलवाकर दुनिया में ऊर्जा सुरक्षा को बहाल करने पर दिया जा रहा है. ईरानी की मिसाइलें और उसके प्रॉक्सी संगठनों की किसी को परवाह नहीं लगती. 

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ईरान को ढील से बढ़ेगी अस्थिरता

ईरानी सूत्र मानते हैं कि होर्मुज अब एक 'खुली तलवार' की तरह बन गया है जिसे म्यान से बाहर निकाल लिया गया है. दशकों तक होर्मुज को ठप करने की धमकी देना गलत माना जाता था, लेकिन मौजूदा युद्ध ने साबित कर दिया है कि ईरान इसका इस्तेमाल अपनी शर्तें मनवाने के हथियार के तौर पर प्रभावी ढंग से कर सकता है. खाड़ी देशों का मानना है कि अगर अमेरिका ने होर्मुज को सुरक्षित बनाने के बदले ईरान को प्रतिबंधों में ढील दी तो इससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ सकती है.

खाड़ी की किस्मत अकेले लिख रहा अमेरिका

सऊदी अरब स्थित गल्फ रिसर्च सेंटर के चेयरमैन अब्दुलअजीज सागेर कहते हैं कि अमेरिका मिडिल ईस्ट की क्षेत्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि क्षेत्रीय देशों को भरोसे में लिए बिना अकेले ही फैसला कर ले जबकि आर्थिक और सुरक्षा के लिहाज से युद्ध का खामियाजा खाड़ी देशों को भुगतना पड़ रहा है. 

अमेरिका की सीमाएं समझ चुके खाड़ी देश 

यूएई के एकेडमिशियन अब्दुल खालेक अब्दुल्ला कहते हैं कि अमेरिका ने इस जंग में ईरान को कम करके आंका. अरब देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी थाड और पैट्रियट मिसाइल के भरोसे रहे, लेकिन अब वो एक ही बाहरी रक्षक पर पूरी तरह निर्भर रहने की सीमाएं समझ चुके हैं. बहरहाल, अब सबकी नजरें इस्लामाबाद वार्ता पर हैं क्योंकि इसी के नतीजे तय करेंगे कि भविष्य में होर्मुज पर अंतरराष्ट्रीय नियम लागू होंगे या ईरान इसे हथियार की तरह इस्तेमाल करेगा.

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