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वैक्सीन से प्राइवेट पार्ट सिकुड़ने की अफवाह, बौखलाई भीड़ ने हेल्थ वर्कर्स को उतारा मौत के घाट; 17 लोगों की मौत

सरकार और स्वास्थ्य संगठन जब तक इस अफवाह पर लगाम कसते, तब तक यह डर हिंसा में बदल चुका था. रॉयटर्स की पड़ताल के मुताबिक, इस 'इन्फोडेमिक' (गलत सूचनाओं की महामारी) ने कानून-व्यवस्था को भी घुटनों पर ला दिया.

वैक्सीन से प्राइवेट पार्ट सिकुड़ने की अफवाह, बौखलाई भीड़ ने हेल्थ वर्कर्स को उतारा मौत के घाट; 17 लोगों की मौत

डिजिटल दुनिया की एक झूठी खबर कैसे असल जिंदगी में मौत का तांडव मचा सकती है, इसकी दहला देने वाली तस्वीर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) से सामने आई है. कांगो के शोपो प्रांत में फैली एक अजीबोगरीब अफवाह ने कई लोगों की जान ले ली है. 

दरअसल इस इलाके में अफवाह फैल गई कि पुरुषों के गुप्तांग छोटे होकर गायब हो रहे हैं. इसके ऐसी हिंसा फैली जिसमें अब तक 17 लोगों की जान जा चुकी है. इसमें सबसे दुखद पहलू यह है कि इस काल्पनिक बीमारी के डर से पागल हुई भीड़ ने उन स्वास्थ्य कर्मियों को भी नहीं बख्शा जो रिसर्च कर रहे थे. स्थानीय लोगों का मानना है कि वैक्सीन से उनके प्राइवेट पार्ट सिकुड़ जाएंगे. 

कैसे फैली अफवाह?

हिंसा का ये सिलसिला पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुआ. तब सोशल मीडिया पर अचानक ऐसे वीडियो और मैसेज की बाढ़ सी आ गई जिनमें दावा किया गया कि एक रहस्यमयी बीमारी पुरुषों को 'नपुंसक' बना रही है. सरकार और स्वास्थ्य संगठन जब तक इस अफवाह पर लगाम कसते, तब तक यह डर हिंसा में बदल चुका था. रॉयटर्स की पड़ताल के मुताबिक, इस 'इन्फोडेमिक' (गलत सूचनाओं की महामारी) ने कानून-व्यवस्था को भी घुटनों पर ला दिया.

इस बीच 6 अक्टूबर को इसांगी इलाके के इलम्बी गांव में हुई. वहां स्वास्थ्य कर्मियों की एक टीम टीकाकरण से जुड़ी रिसर्च के लिए पहुंची थी. बाहरी लोगों को हाई-विजिबिलिटी जैकेट पहने और टैबलेट हाथ में लिए देख गांव के युवकों को लगा कि यही लोग वह 'बीमारी' फैला रहे हैं. भीड़ ने टीम पर हमला कर दिया. इस हमले में बाल-बाल बचे जीन-क्लाउड म्बाटू ने बताया कि उनकी टीम के दो डॉक्टर, प्लासाइड म्बुंगी और जॉन तांगाकेया, भीड़ को समझाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्मादी लोगों ने उन्हें मौके पर ही मार डाला.

डॉक्टर तांगाकेया की विधवा जस्टीन ने रोते हुए रॉयटर्स को बताया,"उन्होंने उसे जिंदा जला दिया, मेरे पास उसकी एक निशानी तक नहीं छोड़ी." इसके कुछ ही देर बाद पास के याफिरा गांव में दो और स्वास्थ्य कर्मियों, मैथ्यू मोसीसी और केविन इलुंगा की भी भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी. अधिकारियों के मुताबिक, ये स्वास्थ्य कर्मी जिस रिसर्च के लिए वहां गए थे, उसका इस कथित बीमारी से कोई लेना-देना नहीं था.

अफवाह फैलाने में चर्च और सोशल मीडिया का हाथ

इस पूरी घटना की जड़ें सोशल मीडिया और स्थानीय धार्मिक संस्थाओं में गहरी धंसी हुई मिलीं. रॉयटर्स की रिपोर्ट में कहा गया कि दर्जनों वीडियो में पाया गया कि कई पादरी इस अफवाह को हवा दे रहे थे. प्रांतीय राजधानी किसंगानी के 'पेंटेकोस्टल चर्च लाइट ऑफ द वर्ल्ड' के एक वीडियो में एक टैक्सी ड्राइवर को यह दावा करते दिखाया गया कि पादरी जूल्स मुलिंदवा ने प्रार्थना के जरिए उसकी बीमारी ठीक कर दी. यह वीडियो टिकटॉक और फेसबुक पर लाखों बार देखा गया, जिससे लोगों का विश्वास इस अफवाह पर और पक्का हो गया.

हैरानी की बात यह है कि यह पादरी पहले भी कोरोना के इलाज का झूठा दावा करने के लिए सजा पा चुका है, लेकिन उसका प्रभाव अब भी बरकरार है. एक और चर्च 'असेंबली क्रिश्चियन डी किसंगानी' के पादरी क्रिस्टोफर कबाम्बा ने भी 'चमत्कारी इलाज' का दावा करने वाला वीडियो जारी किया.

मेटा (फेसबुक) और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ये वीडियो महीनों तक घूमते रहे और लोगों को गुमराह करते रहे. हालांकि अब प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए करीब एक दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया है और एक व्यक्ति को अफवाह फैलाने के आरोप में जेल भेजा है.

क्यों वैक्सीन या हेल्थ वर्कर्स से डरते हैं अफ्रीकी लोग?

अफ्रीका के कई हिस्सों में आधुनिक चिकित्सा के प्रति अविश्वास काफी पुराना है, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक काल और पश्चिमी देशों के संदिग्ध क्लिनिकल ट्रायल्स में छिपी हैं. अफ्रीकी संघ के रोग नियंत्रण केंद्र (Africa CDC) के महानिदेशक डॉ. जीन कासेया के अनुसार, जब लोग वैक्सीन या डॉक्टरों पर भरोसा नहीं करते, तो वे उन सेवाओं से दूर हो जाते हैं जो उनकी जान बचा सकती हैं. कांगो के अलावा मोजाम्बिक और मलावी में भी हैजे को लेकर फैली गलत सूचनाओं के कारण स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले हुए हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के नेतृत्व वाली 'अफ्रीका इन्फोडेमिक रिस्पांस एलायंस' (AIRA) इन अफवाहों पर नजर रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन फंड की भारी कमी आड़े आ रही है.

एयरलायंस की निदेशक एलोडी हो ने बताया कि अमेरिका और अन्य देशों द्वारा सहायता राशि में कटौती के कारण अब वे ऑनलाइन बातचीत ट्रैक करने वाले एआई (AI) प्लेटफॉर्म का सब्सक्रिप्शन तक नहीं भर पा रहे हैं. फिलहाल कांगो का स्वास्थ्य विभाग स्थानीय रेडियो और सामुदायिक कार्यकर्ताओं के जरिए लोगों को समझाने की कोशिश कर रहा है कि 'अंगों के सिकुड़ने' जैसी कोई बीमारी वजूद में ही नहीं है.

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