- बांग्लादेश में संसदीय चुनावों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 4 % के करीब है
- कई महिला उम्मीदवारों ने ऑनलाइन ट्रोलिंग, साइबरबुलिंग और यौन उत्पीड़न की शिकायत की है
- महिला प्रत्याशियों के चरित्र पर हमला किया जाता है जबकि पुरुष नेताओं की आलोचना नीतियों को लेकर होती है
बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव हो रहे हैं. चुनावी तैयारियों और अभियानों के बीच महिलाओं की आत्मनिर्भरता, रोटी और रोजगार एक अहम मुद्दा बना हुआ है. खासतौर से जमात-ए-इस्लामी की तरफ से महिलाओं को लेकर की गई टिप्पणी के बाद से राजनीति में महिलाओं की भागीदारी ने तूल पकड़ लिया है. लेकिन इसी बीच चुनावी मैदान में उतर रहीं महिला उम्मीदवारों पर ऑनलाइन और जमीनी स्तर पर हमले बढ़ने और उन्हें जानबूझकर निशाना बनाए जाने की रिपोर्टें सामने आ रही हैं.
आधी आबादी के बावजूद प्रतिनिधित्व बेहद कम
बांग्लादेश में जो चुनाव होने वाला है, उसमें महिला प्रत्याशियों आंकड़ा सिर्फ 4 फीसदी के आसपास है. यहां आधी आबादी महिलाओं की है, लेकिन बैलेट पेपर पर उनका नाम मुश्किल से ही आता है. देश की संसद में 350 सीटें हैं, जिनमें 300 पर चुनाव हो रहे हैं जबकि बाकी 50 सीटों पर महिलाओं को आनुपातिक प्रतिनिधित्व के हिसाब से चुना जाता है. आयोग की तरफ से जारी आंकड़े के अनुसार चुनाव लड़ रहे 51 दलों में से 30 पार्टियों ने एक भी महिला उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा है. रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया है कि बढ़ती कानून-व्यवस्था महिलाओं को चुनाव लड़ने से रोकने वाली एक मुख्य वजह है.
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साइबर बुलिंग, चरित्र हनन, यौन उत्पीड़न और धमकियां
स्थानीय मीडिया ने बताया कि कई चुनाव क्षेत्रों की महिला उम्मीदवारों ने ऑनलाइन और जमीनी स्तर पर साइबरबुलिंग, चरित्र हनन, यौन उत्पीड़न और धमकियों की रिपोर्ट की है. इन कृत्यों का मकसद महिला उम्मीदवारों को डराना और उनके चुनावी कैंपेन को रोकना है. ढाका-19 से नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) उम्मीदवार दिलशाना पारुल ने कहा कि उन्हें लगातार ऑनलाइन ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा है, खासकर हेडस्कार्फ पहनने के उनके फैसले को लेकर. बांग्लादेशी अखबार ‘द ढाका ट्रिब्यून' ने उनके हवाले से कहा, “न सिर्फ विरोधी पार्टियों के समर्थकों बल्कि जो लोग खुद को प्रोग्रेसिव कहते हैं, वे भी इसमें शामिल हैं. मेरा मानना है कि मुझे सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया है.”
कार्यकर्ताओं को मिली धमकियां
पारुल ने आरोप लगाया है कि उनके अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकियां भी मिली हैं. उन्होंने कहा, “हाल ही में, मेरी टीम पर एक गांव की बिजली साइट पर हमला हुआ. मुझे यह भी चेतावनी देने वाले कॉल आए कि अशुलिया में एक पूर्व वार्ड कमिश्नर मेरी महिला श्रमिकों को वोट देने से रोकने के लिए धमका रहा है. जब भी ऐसा लगता है कि बीएनपी हार सकती है, तो धमकियां बढ़ जाती हैं.”
लिंग आधारित टारगेटिंग पर जोर देते हुए, पारुल ने कहा कि पुरुष नेताओं की ज्यादातर आलोचना भ्रष्टाचार या नीतियों को लेकर होती है, जबकि महिलाओं पर उनके चरित्र को लेकर हमला किया जाता है. इसके बावजूद, उन्होंने कहा कि वह फील्ड में काम करती रहेंगी और अपने चुनाव क्षेत्र के विकास पर ध्यान देंगी.
बैनर फाड़ने, गलत सूचना फैलाने और “इंस्टीट्यूशनल सपोर्ट” पर सवाल
‘द ढाका ट्रिब्यून' के अनुसार, ढाका-20 से एनसीपी उम्मीदवार नबीला तस्नीद ने कहा, “हमारे बैनर और फेस्टून फाड़ दिए गए हैं. जब हमने अधिकारियों को इसकी सूचना दी, तो उन्होंने फोटो या वीडियो सबूत मांगे, जिससे पता चलता है कि इंस्टीट्यूशनल समर्थन कहां है.”
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तस्नीद ने गठबंधन समर्थित समूहों पर गलत जानकारी फैलाने और महिला नेतृत्व पर सवाल उठाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि कुछ लोग दावा करते हैं कि समाज महिला नेताओं को स्वीकार नहीं करेगा. उनके मुताबिक, ऑनलाइन प्रोपेगेंडा और चरित्र पर हमला उनका मुख्य हथियार है. तस्नीद ने कहा कि उनका कैंपेन एजेंडा खेती, किसानों के अधिकार, रोजगार, तकनीकी शिक्षा और महिलाओं के लिए विदेशों में अवसरों पर फोकस करता है.
महिला प्रत्याशी ने क्या बताया
ढाका-12 से गोनोशोंगहोटी आंदोलन की उम्मीदवार तस्लीमा अख्तर ने कहा कि ऑनलाइन उत्पीड़न इसलिए बढ़ता है क्योंकि बिना नाम बताए हमला करना आसान होता है. उन्होंने कहा, “जब टारगेट कोई महिला होती है, तो यह और भी आसान हो जाता है.” उन्होंने यह भी कहा कि डराने-धमकाने से वह महिलाओं के अधिकारों, बारहवीं क्लास तक मुफ्त शिक्षा और भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और ड्रग सिंडिकेट के खिलाफ कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेंगी.
“बिना महिलाओं के गवर्नेंस सुधार असंभव”—खालिदा जिया की पोती
इसी बीच, भूतपूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की पोती और बीएनपी चीफ तारिक रहमान की बेटी जाइमा रहमान ने सियासी दलों से राजनीति में महिलाओं की बराबरी की बात की है. रविवार को ढाका में आयोजित एक इवेंट के दौरान उन्होंने साइबर बुलिंग का जिक्र किया. जाइमा ने राजनीतिक पार्टियों से स्ट्रक्चरल रुकावटों को दूर करने और महिलाओं के लिए एक रास्ता बनाने का आग्रह किया. उन्होंने कहा कि पॉलिसी बनाने में उनकी सक्रिय भागीदारी के बिना सार्थक गवर्नेंस सुधार असंभव है.
विमेन इन डेमोक्रेसी (विंड) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में जाइमा ने राजनीतिक पार्टियों से महिला नेताओं को साइबर-बुलिंग और शारीरिक खतरों से बचाने के लिए एक कानूनी आचार संहिता अपनाने का आह्वान किया. जाइमा ने कहा, “राजनीतिक पार्टियों को अपनी महिला नेताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए. उन्हें उनके साथ खड़ा रहना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चुनौतियों का सामना करते समय उन्हें कभी अकेला न छोड़ा जाए.”
उन्होंने महिलाओं को प्रभावी पॉलिसी लागू करने में सक्षम बनाने के लिए राजनीतिक पहुंच, वित्तीय संसाधनों और बोलने की आजादी की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने कहा, “अगर महिलाएं पॉलिसी बनाने में शामिल नहीं होंगी, तो हम जरूरी नजरिए को कभी पूरी तरह से नहीं समझ पाएंगे,” और कहा कि सिस्टमैटिक रुकावटें महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में बाधा डाल रही हैं.
छात्र राजनीति से स्थानीय सरकार तक “पाथवे” बनाने की मांग
नेतृत्व विकास के महत्व पर जोर देते हुए, जाइमा ने छात्र नेतृत्व और स्थानीय सरकार के बीच की खाई को पाटने का आह्वान किया. उन्होंने कहा, “हमें छात्र राजनीति से स्थानीय सरकार तक एक रास्ता बनाने की जरूरत है, और हमें इसे बनाए रखना चाहिए. इसके बिना, हम प्रतिभाशाली नेताओं को अवसर प्रदान नहीं कर सकते.” उन्होंने लैंगिक असमानताओं पर कहा: “पुरुषों को अक्सर स्थापित मार्गदर्शन से फायदा होता है, लेकिन महिलाओं को सांस्कृतिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है. राजनीतिक पार्टियों को मेंटरशिप और ट्रेनिंग कार्यक्रमों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए.”
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