
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन (फाइल फोटो)
लंदन:
सलमान रश्दी और नील मुखर्जी सहित 200 से अधिक जानेमाने लेखकों ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन से कहा है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ होने वाली अपनी बातचीत के दौरान भारत में ‘बढ़ती असहिष्णुता’ और ‘बढ़ते भय के वातावरण’ का मुद्दा उठाएं।
कैमरन को लिखे गए खुले पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में बुकर पुरस्कार से सम्मानित रश्दी, हाल में बुकर पुरस्कार के लिए चुने गए भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक मुखर्जी के साथ ही इयान मैकइवान और हरी कुंजरू शामिल हैं।
पत्र में कहा गया है, ‘हम हस्ताक्षर करने वाले भारत में भय का वातावरण, असहिष्णुता बढ़ने और कट्टरपंथ या कट्टरवाद की आलोचना करने वालों या उसे चुनौती देने वालों के प्रति हिंसा को लेकर बहुत चिंतित हैं...हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आप इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ सार्वजनिक और निजी चर्चा करें।’ इसमें कहा गया है, ‘कृपया इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वर्तमान स्थिति के बारे में बात करें, उनसे आग्रह करें कि भारत के संविधान में निहित लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की भावना के प्रति ईमानदार रहें।’ पत्र का प्रकाशन पीईएन इंटरनेशनल की ओर से किया गया है, जो प्रमुख साहित्यिक हस्तियों के लिए एक विश्वव्यापी सदस्यता संगठन है। इस पर हस्ताक्षर इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड स्थित उसके केंद्रों के सदस्यों ने किया है।
इस पत्र में हाल में एम.एम. कलबुर्गी, गोविंद पानसरे और नरेंद्र दाभोलकर की हत्याओं का उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही इसमें उन विरोध प्रदर्शनों का भी उल्लेख किया गया है, जिसके तहत कम से कम 40 भारतीय लेखकों ने अपने पुरस्कार साहित्य अकादमी को हमलों पर उसकी चुप्पी की निंदा करते हुए लौटा दिये हैं।
पत्र में कहा गया है, ‘विरोध सभी भाषाओं के भारतीय लेखकों के समुदाय से आगे बढ़ गया है। वैज्ञानिक, कलाकार, फिल्म निर्माता, शिक्षाविद्, विद्वान, अभिनेताओं ने या तो असहिष्णुता के वातावरण के बारे में शिकायत की है या पुरस्कार ऐसे पैमाने पर लौटा दिये हैं जैसा भारत में इससे पहले नहीं देखा गया।’
पत्र में कहा गया है, ‘मानवाधिकार प्रोत्साहित करने की ब्रिटेन की घोषित प्रतिबद्धता के तहत हम आपसे कहते हैं कि आप उपरोक्त मुद्दों को प्रधानमंत्री के समक्ष उठायें और उनसे लेखकों, कलाकारों और अन्य आलोचक आवाजों को बेहतर सुरक्षा मुहैया कराने का अनुरोध करें ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके। इन संरक्षणों के बिना एक लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण समाज संभव नहीं है।’ पीईएन इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक कार्ल्स टोर्नर ने कहा, ‘प्रधानमंत्री मोदी की ब्रिटेन यात्रा एक मौका है...यह सुनिश्चित करने का कि भारत में असहमति और आलोचना के प्रति असहिष्णुता की परेशान करने वाली प्रवृत्ति को समाप्त किया जाए।’
इंग्लिश पीईएन के कार्यकारी निदेशक जो ग्लानविले कहते हैं, ‘ब्रिटेन के लेखक भारत के अपने सहयोगियों की एकजुटता में खड़े हैं। भारत में लेखकों के लिए जारी खतरों और बढ़ते प्रतिकूल वातावरण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण प्रदान करने में सरकार की विफलता पर विरोध की एक अभूतपूर्व लहर देखी गई है।’ पीईएन की ओर से भारत में ‘असहिष्णुता बढ़ने’ के मुद्दे पर एक महीने से कम समय में यह दूसरा ऐसा पत्र है। 17 अक्टूबर को 150 से अधिक देशों के लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों एवं कलाकारों के प्रति एकजुटता प्रदर्शित की थी। इस पत्र के अलावा विरोध की अन्य आवाजों में ‘मोदी नॉट वेल्कम’ के साथ ही कास्टवाचयूके की ओर से डाउनिंग स्ट्रीट और उसके बाद पार्लियामेंट स्क्वायर में आयोजित विरोध प्रदर्शन शामिल हैं। प्रदर्शनकारियों का एक अन्य समूह मांग करेगा कि भारत सरकार ब्रिटिश फिल्म निर्माता लेस्ली उडविन के वृत्तचित्र ‘इंडियाज डॉटर’ पर लगा प्रतिबंध हटाये।
विपक्षी लेबर पार्टी के जेरेमी कोर्बिन सहित करीब 46 सांसदों ने एक संसदीय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें कैमरन से भारत सरकार के साथ मानवाधिकार मुद्दों को उठाने की मांग की गई है।
ये प्रदर्शन मोदी की ब्रिटेन की इस बहुप्रतीक्षित पहली यात्रा को फीका कर सकते हैं। मोदी अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन सहित शीर्ष ब्रिटिश नेताओं के साथ बातचीत करने के अलावा महारानी के साथ भोज करेंगे और प्रवासी भारतीयों को संबोधित भी करेंगे।
कैमरन को लिखे गए खुले पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में बुकर पुरस्कार से सम्मानित रश्दी, हाल में बुकर पुरस्कार के लिए चुने गए भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक मुखर्जी के साथ ही इयान मैकइवान और हरी कुंजरू शामिल हैं।
पत्र में कहा गया है, ‘हम हस्ताक्षर करने वाले भारत में भय का वातावरण, असहिष्णुता बढ़ने और कट्टरपंथ या कट्टरवाद की आलोचना करने वालों या उसे चुनौती देने वालों के प्रति हिंसा को लेकर बहुत चिंतित हैं...हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आप इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ सार्वजनिक और निजी चर्चा करें।’ इसमें कहा गया है, ‘कृपया इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वर्तमान स्थिति के बारे में बात करें, उनसे आग्रह करें कि भारत के संविधान में निहित लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की भावना के प्रति ईमानदार रहें।’ पत्र का प्रकाशन पीईएन इंटरनेशनल की ओर से किया गया है, जो प्रमुख साहित्यिक हस्तियों के लिए एक विश्वव्यापी सदस्यता संगठन है। इस पर हस्ताक्षर इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड स्थित उसके केंद्रों के सदस्यों ने किया है।
इस पत्र में हाल में एम.एम. कलबुर्गी, गोविंद पानसरे और नरेंद्र दाभोलकर की हत्याओं का उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही इसमें उन विरोध प्रदर्शनों का भी उल्लेख किया गया है, जिसके तहत कम से कम 40 भारतीय लेखकों ने अपने पुरस्कार साहित्य अकादमी को हमलों पर उसकी चुप्पी की निंदा करते हुए लौटा दिये हैं।
पत्र में कहा गया है, ‘विरोध सभी भाषाओं के भारतीय लेखकों के समुदाय से आगे बढ़ गया है। वैज्ञानिक, कलाकार, फिल्म निर्माता, शिक्षाविद्, विद्वान, अभिनेताओं ने या तो असहिष्णुता के वातावरण के बारे में शिकायत की है या पुरस्कार ऐसे पैमाने पर लौटा दिये हैं जैसा भारत में इससे पहले नहीं देखा गया।’
पत्र में कहा गया है, ‘मानवाधिकार प्रोत्साहित करने की ब्रिटेन की घोषित प्रतिबद्धता के तहत हम आपसे कहते हैं कि आप उपरोक्त मुद्दों को प्रधानमंत्री के समक्ष उठायें और उनसे लेखकों, कलाकारों और अन्य आलोचक आवाजों को बेहतर सुरक्षा मुहैया कराने का अनुरोध करें ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके। इन संरक्षणों के बिना एक लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण समाज संभव नहीं है।’ पीईएन इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक कार्ल्स टोर्नर ने कहा, ‘प्रधानमंत्री मोदी की ब्रिटेन यात्रा एक मौका है...यह सुनिश्चित करने का कि भारत में असहमति और आलोचना के प्रति असहिष्णुता की परेशान करने वाली प्रवृत्ति को समाप्त किया जाए।’
इंग्लिश पीईएन के कार्यकारी निदेशक जो ग्लानविले कहते हैं, ‘ब्रिटेन के लेखक भारत के अपने सहयोगियों की एकजुटता में खड़े हैं। भारत में लेखकों के लिए जारी खतरों और बढ़ते प्रतिकूल वातावरण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण प्रदान करने में सरकार की विफलता पर विरोध की एक अभूतपूर्व लहर देखी गई है।’ पीईएन की ओर से भारत में ‘असहिष्णुता बढ़ने’ के मुद्दे पर एक महीने से कम समय में यह दूसरा ऐसा पत्र है। 17 अक्टूबर को 150 से अधिक देशों के लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों एवं कलाकारों के प्रति एकजुटता प्रदर्शित की थी। इस पत्र के अलावा विरोध की अन्य आवाजों में ‘मोदी नॉट वेल्कम’ के साथ ही कास्टवाचयूके की ओर से डाउनिंग स्ट्रीट और उसके बाद पार्लियामेंट स्क्वायर में आयोजित विरोध प्रदर्शन शामिल हैं। प्रदर्शनकारियों का एक अन्य समूह मांग करेगा कि भारत सरकार ब्रिटिश फिल्म निर्माता लेस्ली उडविन के वृत्तचित्र ‘इंडियाज डॉटर’ पर लगा प्रतिबंध हटाये।
विपक्षी लेबर पार्टी के जेरेमी कोर्बिन सहित करीब 46 सांसदों ने एक संसदीय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें कैमरन से भारत सरकार के साथ मानवाधिकार मुद्दों को उठाने की मांग की गई है।
ये प्रदर्शन मोदी की ब्रिटेन की इस बहुप्रतीक्षित पहली यात्रा को फीका कर सकते हैं। मोदी अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन सहित शीर्ष ब्रिटिश नेताओं के साथ बातचीत करने के अलावा महारानी के साथ भोज करेंगे और प्रवासी भारतीयों को संबोधित भी करेंगे।
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