समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव और सीएम अखिलेश यादव
नई दिल्ली:
अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के बीच की लड़ाई अब बहुत आगे बढ़ गई है. उत्तर प्रदेश के राजनीति में यह पहली बार देखने को मिल रहा है जब बाप और बेटा कुर्सी के लिए एक-दूसरे से लड़ रहे हैं.
कभी अखिलेश यादव अपने आप को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करते हैं तो कभी मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि वह खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. अब कौन क्या है कुछ पता नहीं चल पा रहा है. चुनाव को अब ज्यादा दिन भी नहीं रह गए हैं फिर भी दोनों के बीच कोई सुलह नहीं हो पाई है. ऐसे में चुनाव में किसका क्या फायदा होगा या नुकसान इसके बारे में जानने के लिए एनडीटीवी ने लखनऊ के दो वरिष्ठ पत्रकारों से बात की. चलिए जानते इन दोनों पत्रकारों का क्या कहना है...
(पढ़ें : सपा में संग्राम - सोशल मीडिया पर छाया 'समाजवादी ड्रामा- ई सायकिल हमार बा')
समाजवादी पार्टी को नुकसान होगा
वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का कहना है अखिलेश और मुलायम अपने पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हैं. दोनों अपने दिमाग से नहीं चल रहे हैं. एक रामगोपाल यादव की सलाह पर चल रहा है तो दूसरा शिवपाल यादव की सलाह पर. अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने का इससे बढ़िया उदाहरण हिंदुस्तान के राजनीति में नहीं मिलेगा. दोनों के बीच कलह के वजह से जो नुकसान हुआ है उस नुकसान की भरपाई करना अब मुश्किल है. अब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का भविष्य अंधकार में है. बाप और बेटे वापस की इस लड़ाई से दूसरे पार्टियों को फ़ायदा हो सकता है.
(पढ़ें : यदि मुलायम सिंह यादव को नहीं मिला साइकिल सिंबल, ये होगा उनका तुरुप का पत्ता!)
मुस्लिम वोट डिवाइड होने से बीजेपी का फायदा होगा
शरत प्रधान का कहना है मुस्लिम वोट डिवाइड हो जाने से बीजेपी को फायदा होगा. शरत प्रधान यह मानते हैं कि अब मुस्लिम नहीं चाहेगा कि किसी एक कमज़ोर पार्टी को वोट दिया जाए जो सरकार नहीं बना सकता है. अब तक मुस्लिम वोट के स्ट्रेंथ पर समाजवादी पार्टी चुनाव जीत रही थी. अगर बाप और बेटे अलग हो जाते हैं और अलग-अलग उम्मीदवार खड़े करते हैं तो मुस्लिम वोट अलग हो जाएगा. कुछ अखिलेश को वोट देंगे तो कुछ मुलायम सिंह यादव को, ऐसे में फायदा बीजेपी को होगा.
अगर मुलायम और अखिलेश एक हो भी जाते हैं तब भी सरकार बनाना मुश्किल है
शरत प्रधान का कहना है कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ने बहुत भ्रम पैदा कर दिए हैं. अब यह यकीन करना मुश्किल है कि यह दोनों एक होंगे. अगर मुलायम और अखिलेश एक हो भी जाते हैं तो थोड़ा बहुत फायदा होगा लेकिन सरकार बनाने का चांस बहुत कम है. समाजवादी पार्टी के जो समर्थक हैं वह बिखर गए हैं. नीचे के कैडर में दरार पड़ गई है. अगर तीन महीने पहले ऐसा होता और अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी से अलग हो जाते हैं और अपनी नई पार्टी बना लेते तो वह हीरो बन जाते लेकिन अब देर हो चुकी है.
अगर कांग्रेस अखिलेश के साथ गठबंधन करती है
शरत प्रधान का कहना है अगर बाप और बेटे के बीच यह झगड़ा नहीं होता तो अखिलेश के सरकार बनाने की चांस थे. अगर दोनों अलग होकर चुनाव लड़ेंगे तो अभी भी मुलायम सिंह से ज्यादा अखिलेश यादव को सीट मिलेंगी लेकिन अखिलेश सरकार नहीं बना पाएंगे. अगर अखिलेश यादव और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो जाता है तब मुस्लिम वोट का फायदा तो होगा लेकिन अखिलेश की सरकार बनेगी या नहीं बनेगा यह कहना अब मुश्किल है. कांग्रेस की खुद की स्थिति उत्तर प्रदेश इतनी अच्छी नहीं है.
सुनीता एरोन का कहना है कि अखिलेश फिर मुख्यमंत्री बन सकते हैं
लखनऊ की वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरोन का कहना है कि आज की तारीख में बहुत ज्यादा कंफ्यूजन है. मायावती जी ने एक नया एक्सपेरिमेंट किया है जिसके जरिए वह मुस्लिम को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही हैं. बीजेपी नोटबंदी लेकर आयी है और यह पता नहीं चल पा रहा कि इस नोटबंदी का फायदा बीजेपी को होगा या नहीं.
दूसरी तरफ मुलायम सिंह की पार्टी में कलह चल रही है. अगर जल्दी से जल्दी यह कलह नहीं खत्म होती और अखिलेश और मुलायम जल्दी से जल्दी चुनाव प्रचार के लिए नहीं निकलते हैं तो समाजवादी पार्टी का नुकसान होगा. अब तक जितने सर्वे आए हैं उस में यह आया है कि अखिलेश यादव एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं. एक साफ़-सुथरे मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश ने अपनी छवि बनाई है. अगर अखिलेश यादव अच्छे उम्मीदवारों को खड़ा करते हैं और समय पर प्रचार पर निकलते हैं तो वह फिर मुख्यमंत्री बन सकते हैं.
अगर मुलायम और अखिलेश अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं
सुनीता एरोन का कहना है कि अगर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो इसका नुकसान दोनों को होगा. दोनों का वोटबैंक एक ही है, ऐसे में कुछ वोट अखिलेश यादव को पड़ेंगे तो कुछ मुलायम सिंह यादव को. समाजवादी पार्टी का जो अपना वोट है वह डिवाइड हो जाएगा. अब अगर दोनों एक हो जाते हैं, अध्यक्ष पद को लेकर जो कलह चल रही है अगर वह सुलझ जाती है और एक ही कैंडिडेट लिस्ट बनाई जाती है तब समाजवादी पार्टी को फायदा होगा.
जीतने के लिए समाजवादी पार्टी को साफ़-सुथरे उम्मीदवार खड़े करने पड़ेंगे
अगर समाजवादी पार्टी को ज्यादा सीटें जीतनी हैं तो मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव को एक ऐसा फार्मूला तैयार करना पड़ेगा जिसमें मुलायम सिंह यादव का सम्मान भी रहे और अखिलेश की अपनी जगह बनी रहे. यह मानना है सुनीता एरोन का. उनका कहना है कि अच्छे और साफ़-सुथरे कैंडिडेटों की लिस्ट तैयार करनी होगी. अगर अच्छे कैंडिडेट खड़े होते हैं तो समाजवादी पार्टी को फायदा होगा. यदि फिर से क्रिमिनल बैकग्राउंड के उम्मीदवार खड़े होते हैं तो जीतना मुश्किल है. एरोन का कहना है कि अगर अखिलेश, मुलायम से अलग हो जाते हैं और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लेते हैं तो इसका उन्हें फायदा मिलेगा.
कभी अखिलेश यादव अपने आप को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करते हैं तो कभी मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि वह खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. अब कौन क्या है कुछ पता नहीं चल पा रहा है. चुनाव को अब ज्यादा दिन भी नहीं रह गए हैं फिर भी दोनों के बीच कोई सुलह नहीं हो पाई है. ऐसे में चुनाव में किसका क्या फायदा होगा या नुकसान इसके बारे में जानने के लिए एनडीटीवी ने लखनऊ के दो वरिष्ठ पत्रकारों से बात की. चलिए जानते इन दोनों पत्रकारों का क्या कहना है...
(पढ़ें : सपा में संग्राम - सोशल मीडिया पर छाया 'समाजवादी ड्रामा- ई सायकिल हमार बा')
समाजवादी पार्टी को नुकसान होगा
वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का कहना है अखिलेश और मुलायम अपने पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हैं. दोनों अपने दिमाग से नहीं चल रहे हैं. एक रामगोपाल यादव की सलाह पर चल रहा है तो दूसरा शिवपाल यादव की सलाह पर. अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने का इससे बढ़िया उदाहरण हिंदुस्तान के राजनीति में नहीं मिलेगा. दोनों के बीच कलह के वजह से जो नुकसान हुआ है उस नुकसान की भरपाई करना अब मुश्किल है. अब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का भविष्य अंधकार में है. बाप और बेटे वापस की इस लड़ाई से दूसरे पार्टियों को फ़ायदा हो सकता है.
(पढ़ें : यदि मुलायम सिंह यादव को नहीं मिला साइकिल सिंबल, ये होगा उनका तुरुप का पत्ता!)
मुस्लिम वोट डिवाइड होने से बीजेपी का फायदा होगा
शरत प्रधान का कहना है मुस्लिम वोट डिवाइड हो जाने से बीजेपी को फायदा होगा. शरत प्रधान यह मानते हैं कि अब मुस्लिम नहीं चाहेगा कि किसी एक कमज़ोर पार्टी को वोट दिया जाए जो सरकार नहीं बना सकता है. अब तक मुस्लिम वोट के स्ट्रेंथ पर समाजवादी पार्टी चुनाव जीत रही थी. अगर बाप और बेटे अलग हो जाते हैं और अलग-अलग उम्मीदवार खड़े करते हैं तो मुस्लिम वोट अलग हो जाएगा. कुछ अखिलेश को वोट देंगे तो कुछ मुलायम सिंह यादव को, ऐसे में फायदा बीजेपी को होगा.
अगर मुलायम और अखिलेश एक हो भी जाते हैं तब भी सरकार बनाना मुश्किल है
शरत प्रधान का कहना है कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ने बहुत भ्रम पैदा कर दिए हैं. अब यह यकीन करना मुश्किल है कि यह दोनों एक होंगे. अगर मुलायम और अखिलेश एक हो भी जाते हैं तो थोड़ा बहुत फायदा होगा लेकिन सरकार बनाने का चांस बहुत कम है. समाजवादी पार्टी के जो समर्थक हैं वह बिखर गए हैं. नीचे के कैडर में दरार पड़ गई है. अगर तीन महीने पहले ऐसा होता और अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी से अलग हो जाते हैं और अपनी नई पार्टी बना लेते तो वह हीरो बन जाते लेकिन अब देर हो चुकी है.
अगर कांग्रेस अखिलेश के साथ गठबंधन करती है
शरत प्रधान का कहना है अगर बाप और बेटे के बीच यह झगड़ा नहीं होता तो अखिलेश के सरकार बनाने की चांस थे. अगर दोनों अलग होकर चुनाव लड़ेंगे तो अभी भी मुलायम सिंह से ज्यादा अखिलेश यादव को सीट मिलेंगी लेकिन अखिलेश सरकार नहीं बना पाएंगे. अगर अखिलेश यादव और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो जाता है तब मुस्लिम वोट का फायदा तो होगा लेकिन अखिलेश की सरकार बनेगी या नहीं बनेगा यह कहना अब मुश्किल है. कांग्रेस की खुद की स्थिति उत्तर प्रदेश इतनी अच्छी नहीं है.
सुनीता एरोन का कहना है कि अखिलेश फिर मुख्यमंत्री बन सकते हैं
लखनऊ की वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरोन का कहना है कि आज की तारीख में बहुत ज्यादा कंफ्यूजन है. मायावती जी ने एक नया एक्सपेरिमेंट किया है जिसके जरिए वह मुस्लिम को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही हैं. बीजेपी नोटबंदी लेकर आयी है और यह पता नहीं चल पा रहा कि इस नोटबंदी का फायदा बीजेपी को होगा या नहीं.
दूसरी तरफ मुलायम सिंह की पार्टी में कलह चल रही है. अगर जल्दी से जल्दी यह कलह नहीं खत्म होती और अखिलेश और मुलायम जल्दी से जल्दी चुनाव प्रचार के लिए नहीं निकलते हैं तो समाजवादी पार्टी का नुकसान होगा. अब तक जितने सर्वे आए हैं उस में यह आया है कि अखिलेश यादव एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं. एक साफ़-सुथरे मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश ने अपनी छवि बनाई है. अगर अखिलेश यादव अच्छे उम्मीदवारों को खड़ा करते हैं और समय पर प्रचार पर निकलते हैं तो वह फिर मुख्यमंत्री बन सकते हैं.
अगर मुलायम और अखिलेश अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं
सुनीता एरोन का कहना है कि अगर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो इसका नुकसान दोनों को होगा. दोनों का वोटबैंक एक ही है, ऐसे में कुछ वोट अखिलेश यादव को पड़ेंगे तो कुछ मुलायम सिंह यादव को. समाजवादी पार्टी का जो अपना वोट है वह डिवाइड हो जाएगा. अब अगर दोनों एक हो जाते हैं, अध्यक्ष पद को लेकर जो कलह चल रही है अगर वह सुलझ जाती है और एक ही कैंडिडेट लिस्ट बनाई जाती है तब समाजवादी पार्टी को फायदा होगा.
जीतने के लिए समाजवादी पार्टी को साफ़-सुथरे उम्मीदवार खड़े करने पड़ेंगे
अगर समाजवादी पार्टी को ज्यादा सीटें जीतनी हैं तो मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव को एक ऐसा फार्मूला तैयार करना पड़ेगा जिसमें मुलायम सिंह यादव का सम्मान भी रहे और अखिलेश की अपनी जगह बनी रहे. यह मानना है सुनीता एरोन का. उनका कहना है कि अच्छे और साफ़-सुथरे कैंडिडेटों की लिस्ट तैयार करनी होगी. अगर अच्छे कैंडिडेट खड़े होते हैं तो समाजवादी पार्टी को फायदा होगा. यदि फिर से क्रिमिनल बैकग्राउंड के उम्मीदवार खड़े होते हैं तो जीतना मुश्किल है. एरोन का कहना है कि अगर अखिलेश, मुलायम से अलग हो जाते हैं और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लेते हैं तो इसका उन्हें फायदा मिलेगा.
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