- अखिलेश ने राम मंदिर चढ़ावे की चोरी पर सवाल उठाए और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के चरणों में बैठे नजर आए
- समाजवादी पार्टी ने 2022 में ब्राह्मण वोटरों को लुभाने की कोशिश की थी लेकिन अधिकांश वोट भाजपा को मिले थे
- अखिलेश यादव का नया रुख सॉफ्ट हिंदुत्व के रूप में देखा जा रहा है, भाजपा के हिंदुत्व से मुकाबला करना कठिन है
अखिलेश यादव इन दिनों बदले अंदाज में नजर आ रहे हैं. राम मंदिर में चढ़ावा चोरी पर उन्होंने सधे हुए अंदाज में सवाल खड़े किए हैं. शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के चरणों में बैठे नजर आए हैं और पंडित जी जो कुछ कहेंगे, वह किया जाएगा वाला बयान भी उनका चर्चा में रहा है. यही नहीं समाजवादी पार्टी के कार्यालय पर सनातन ही समाजवाद है वाले पोस्टर भी लगे दिखे. इन सभी घटनाक्रमों को अखिलेश यादव की बदली चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. अगले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हो सकते हैं. ऐसे में अखिलेश यादव के इस बदले अंदाज और रणनीति की चर्चाएं खूब हैं. हालांकि उनके ही समर्थक वर्ग में इसे लेकर ऊहापोह की स्थिति भी है.
सपा ने 2022 के विधानसभा चुनाव में भी ऐन वक्त पर ब्राह्मणों को लुभाने की काफी कोशिश की थी. भगवान परशुराम की प्रतिमा लगवाई थी. खुद अखिलेश यादव ने अनावरण किया था. लेकिन चुनावी नतीजों में हार मिली और डेटा बताता है कि ब्राह्मण समाज के 98 फीसदी वोट भाजपा को गए थे. इस आधार पर अखिलेश यादव की रणनीति पर सवाल उठे थे कि क्या ब्राह्मणों को लुभाने के चक्कर में उन्होंने ओबीसी और दलित वर्ग का एक हिस्सा खो दिया. अब तक पीडीए की बात करने वाले अखिलेश यादव के नए रुख को मीडिया का एक वर्ग सॉफ्ट हिंदुत्व बता रहा है. लेकिन यह भी ध्यान देना जरूरी है कि हिंदुत्व भाजपा की सबसे मजबूत पिच है.
'चले थे कमाने, पड़ गए गंवाने' वाला खतरा!
अरुण जेटली ने एक समय कांग्रेस की सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति पर कहा था कि जब लोगों के पास असली वर्जन मौजूद है तो लोग नकली को क्यों पसंद करेंगे. सपा के मामले में भी यह स्थिति दिखती है क्योंकि अखिलेश यादव का जिन योगी आदित्यनाथ से मुकाबला है, वह अपने आप में ही हिंदुत्व के ब्रांड अंबेसडर हैं. भगवा वेश और गोरक्षपीठ के महंत के तौर पर वह हिंदुत्व के एक ऐसे चेहरे हैं, जिनसे किसी भी तरह से अखिलेश यादव इस पिच पर मुकाबला नहीं कर सकते. ऐसे में पीडीए के नारे से इतर रणनीति बदलना उनके लिए रिस्की हो सकता है. उनके सामने यह समस्या होगी कि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोट के सपा के पक्ष में ध्रुवीकरण में कमी आ सकती है, जबकि सवर्णों का वोट उस अनुपात में शायद ही मिले, जितनी उन्हें उम्मीद है.
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दिल्ली में ज्यादा वक्त बिता रहे अखिलेश, लखनऊ में माता प्रसाद के भरोसे
यूजीसी बिल समेत कई ऐसे मामले रहे हैं, जब सवर्णों के बीच भाजपा को लेकर सवाल उठे हैं. लेकिन इस नाराजगी से वोटिंग पैटर्न में कोई बदलाव आएगा, यह मुश्किल लगता है. इसलिए भी अखिलेश यादव की रणनीति पर सवाल है. अखिलेश यादव की राजनीति में एक समस्या यह भी आ रही है कि वह सांसद के तौर पर दिल्ली में पहले से ज्यादा वक्त बिता रहे हैं, जबकि यूपी विधानसभा में माता प्रसाद पांडेय नेता विपक्ष हैं. इतने बुजुर्ग नेता को उन्होंने विधानसभा में कमान दी है, जो बहुत मुखर नहीं हैं. ऐसे में यह कमी भी लखनऊ में खलती है.
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