Railway Ticket Scam: अगर आप रेलवे से सफर करते हैं तो आपको जरूर पता होगा कि कैसे एक‑एक टिकट के लिए दलाल 5‑5 हजार रुपये तक मांग लेते हैं. कैसे तत्काल टिकट बुकिंग शुरू होते ही कुछ ही मिनटों में खत्म हो जाती है और आम यात्री की स्क्रीन पर वेटिंग लिस्ट चमकने लगती है. ये किसी एक दिन की कहानी नहीं है, ये रोज‑रोज होने वाली हकीकत है. जरा सोचिए, जिस देश में करोड़ों लोग रोज ट्रेन से सफर करते हैं. किसी को मेडिकल इमरजेंसी होती है, किसी को इंटरव्यू के लिए निकलना होता है, तो किसी को बेहद जरूरी काम से तुरंत कहीं पहुंचना होता है. ठीक इसी मजबूरी का फायदा उठाकर दलाल टिकटों को दोगुने‑तिगुने दाम पर बेचते हैं और आम आदमी की जेब पर सीधा डाका डालते हैं.
चौंका देंगे आंकड़े
देश में हर दिन करीब ढाई लाख, हर महीने 75 लाख और सालभर में लगभग 7 करोड़ तत्काल टिकट बुक होती हैं. अब सोचिए, अगर इनमें से एक बड़ा हिस्सा सिंडिकेट के हाथ चला जाए, तो उनकी कमाई कितनी होगी. ये 10‑20 या 50 करोड़ का खेल नहीं, बल्कि करीब 600 करोड़ रुपये का काला कारोबार है. लेकिन अब आपके मन में सवाल होगा कि ये सब होता कैसे है. कैसे ये सिंडिकेट सिस्टम में सेंध लगाता है. कैसे आपके हिस्से की टिकट पहले ही बुक कर ली जाती है और फिर वही टिकट आपको मनचाहे दाम पर बेची जाती है. इसी के लिए NDTV ने ऑपरेशन ब्लैक टिकट चलाया जिसमें इसके पीछे की पूरी कहानी सामने आई. इसमें हम आपको बताएंगे कि कैसे एक अवैध सॉफ्टवेयर इसकी जड़ है, जिसके जरिए दलाल महज 10 से 15 सेकंड में टिकट बुक कर लेते हैं और हम‑आप टिकट होने के इंतजार में ही रह जाते हैं.

अवैध सॉफ्टवेयर का होता है इस्तेमाल
NDTV की टीम ने जब तत्काल टिकट बुकिंग की हकीकत जानने के लिए पड़ताल शुरू की, तो सामने आया कि ये एक बड़ा और पूरी तरह संगठित घोटाला है. सरकार के सिस्टम को चकमा देने के लिए पूरा गिरोह बेहद योजनाबद्ध तरीके से काम करता है. इसमें एजेंट, सॉफ्टवेयर डेवलपर और सिस्टम की खामियों का फायदा उठाने वाले लोग शामिल होते हैं, जो मिलकर आम यात्रियों के हक पर डाका डालते हैं.
जांच में पता चला कि तत्काल टिकट बुकिंग सिस्टम में हेरफेर के लिए खास तरह के अवैध सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है.
कैसे काम करता है ये अवैध सोफ्टवेयर?
ये सॉफ्टवेयर इतने तेज होते हैं कि जैसे ही तत्काल टिकट की विंडो खुलती है, इंसानों से पहले खुद ही लॉग‑इन करके टिकट बुक कर लेते हैं. जहां एक आम यात्री को लॉग‑इन करने में 10 से 15 सेकंड लग जाते हैं, कैप्चा भरने और पेमेंट में वक्त लगता है, वहीं ये सॉफ्टवेयर पलक झपकते ही लॉग‑इन करते हैं, ऑटोमेटिक डिटेल्स भरते हैं, कैप्चा बायपास करते हैं और तुरंत पेमेंट भी कर देते हैं. इस पूरे खेल में बुकिंग सॉफ्टवेयर सबसे अहम हथियार है, जिसे खास तौर पर तत्काल सिस्टम को धोखा देने के लिए तैयार किया गया है.

सुनने में ये चौंकाने वाला जरूर लगता है, लेकिन इस घोटाले की सच्चाई इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली है. इसी का पर्दाफाश करने के लिए NDTV की टीम मुंबई पहुंची, जहां टीम की मुलाकात एथिकल हैकर हामिद अशरफ से हुई. अशरफ ने जब इस पूरे सिस्टम का लाइव डेमो दिखाया, तो सब हैरान रह गए.
आप जब तत्काल टिकट बुक करते हैं, तो आपको पूरा प्रोसेस फॉलो करना पड़ता है—लॉग‑इन, डिटेल भरना, कैप्चा डालना और फिर पेमेंट का इंतजार. लेकिन इसी दौरान ये गिरोह महज कुछ ही सेकंड में पूरा खेल खत्म कर देता है. नतीजा ये होता है कि देखते‑देखते सारी टिकटें खत्म हो जाती हैं और आम यात्री हाथ मलता रह जाता है. इस पूरे रैकेट की परतें तब और खुलीं, जब एथिकल हैकर हामिद अशरफ ने इसका लाइव डेमो दिखाया. हामिद का दावा है कि वो कभी इस सिंडिकेट का हिस्सा रहे हैं. उस वक्त वो नाबालिग थे, इसलिए कानून के पचड़े में फंसने के बाद भी आसानी से बाहर आ गए. आज वो इसी सिस्टम की पोल खोलकर बता रहे हैं कि कैसे तत्काल टिकट बुकिंग को हैक किया जाता है और आम लोगों के हक की टिकटें उड़ाई जाती हैं.
सिक्योरिटी से साथ बड़ा खिलवाड़
इस पूरे फर्जीवाड़े में हैकर्स बैंकिंग सिक्योरिटी के साथ भी बड़ा खिलवाड़ करते हैं. जांच में सामने आया है कि गिरोह के लोग कई बैंकिंग सिस्टम के OTP तक को बायपास करने की तैयारी पहले से करके रखते हैं. इसका मतलब ये कि पेमेंट के वक्त OTP आने का इंतजार ही नहीं करना पड़ता. एक क्लिक में पेमेंट पूरा होता है और टिकट बुक हो जाती है. और इतनी तेजी से कि सिस्टम को भनक तक नहीं लगती, लेकिन आम यात्री वेटिंग लिस्ट देखकर रह जाता है.

आधार या पैन कार्ड लिंक होना जरूरी फिर भी कैसे होता है स्कैम?
दलालों का ये गिरोह इसी तरह काम करता है और न सिर्फ आम जनता को बल्कि पूरे रेल टिकट सिस्टम को भी चूना लगाता है. आपके मन में भी ये सवाल जरूर आया होगा कि एक आईडी से तो सिर्फ दो तत्काल टिकट ही बुक किए जा सकते हैं और अब तो आधार या पैन कार्ड से लिंक आईडी अनिवार्य है. फिर दलाल इतने टिकट कैसे बुक करते हैं. क्या वो दूसरे लोगों की आईडी इस्तेमाल करते हैं? इसका जवाब है—नहीं. जब से आधार या पैन लिंक करना अनिवार्य हुआ, दलालों ने नया रास्ता निकाल लिया. अब ये लोग हजारों की संख्या में फर्जी आईडी तैयार करते हैं, सैकड़ों‑हजारों सिम कार्ड जुटाते हैं और इन्हीं नकली पहचान के जरिए एक साथ सैकड़ों टिकट बुक कर लेते हैं. सिस्टम दिखता सुरक्षित है, लेकिन असल में सेंध उसी आधार पर लगाई जाती है और इसका खामियाजा भुगतता है आम यात्री.

ऐप क्यों हो जाता है स्लो
अब आपके मन में एक सवाल और होगा कि जब हम टिकट बुक करने के लिए IRCTC ऐप खोलते हैं और बुकिंग शुरू करते हैं, तो अक्सर ऐप अचानक स्लो हो जाती है. क्या टिकट चोरों के इस सिंडिकेट की पहुंच आपके मोबाइल तक भी है, जो IRCTC ऐप की स्पीड को जानबूझकर कम कर दे? इसका जवाब है- हां. जांच में सामने आया है कि ये सिंडिकेट ऐसे खास सॉफ्टवेयर और तकनीकों का इस्तेमाल करता है, जिससे आम यूजर्स के मोबाइल ऐप और वेबसाइट की स्पीड धीमी हो जाती है.
जब तक आप टिकट बुक करने की कोशिश करते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और आपकी स्क्रीन पर सारी टिकटें बुक दिखने लगती हैं. इसी दौरान ये सिंडिकेट फर्जी IP एड्रेस बनाकर और ऑटोमेटेड सिस्टम के जरिए महज कुछ सेकंड में हजारों टिकट बुक कर लेता है. यानी सिस्टम स्लो आपको किया जाता है और दलालों के नेटवर्क के जरिए फायदा उठाया जाता है.
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