आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI तेजी से लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है. अब लोग सवाल पूछने, सलाह लेने या सिर्फ बातचीत करने के लिए भी AI का इस्तेमाल करने लगे हैं. हालांकि एक्टपर्ट्स का कहना है कि इस बढ़ती आदत के साथ एक नई मनोवैज्ञानिक समस्या भी सामने आ रही है, जिसे 'AI साइकोसिस' कहा जा रहा है. यह कोई सीरियस मेडिकल बीमारी नहीं है, लेकिन साइकोलॉजी में इस शब्द का इस्तेमाल उस स्थिति को समझाने के लिए करते हैं जब लोग AI चैटबॉट्स के साथ बहुत ज्यादा इमोशनली जुड़ जाते हैं.
जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक AI से बातचीत करता है और उस पर भावनात्मक रूप से निर्भर होने लगता है, तो उसकी सोच और रियलिटी के बीच का फर्क कम हो सकता है.

AI साइकोसिस क्या है?
AI साइकोसिस एक ऐसी सिचुएशन को दर्शाता है जिसमें AI चैटबॉट्स के साथ लगातार बातचीत करने से किसी व्यक्ति के मन में गलत या भ्रमित करने वाले विचार मजबूत हो सकते हैं. AI चैटबॉट्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वे आमतौर पर लोगों की बातों से सहमत होने की कोशिश करते हैं ताकि बातचीत सहज और लंबी चल सके. लेकिन कभी-कभी यही बात समस्या बन सकती है.
अगर कोई व्यक्ति पहले से ही किसी गलत धारणा या भ्रम में है, तो चैटबॉट के जवाब उसे चुनौती देने के बजाय उस सोच को और मजबूत कर सकते हैं. इससे व्यक्ति को लग सकता है कि उसकी सोच सही है, जबकि असल में ऐसा नहीं होता.
जैसे-जैसे AI सिस्टम ज्यादा इंसानों की तरह बातचीत करने लगे हैं, कुछ लोग उनसे गहरा भावनात्मक रिश्ता बनाने लगे हैं. कई मामलों में लोग चैटबॉट को अपना दोस्त, साथी या यहां तक कि रोमांटिक पार्टनर की तरह देखने लगते हैं.
जब ऐसा होता है तो डिजिटल बातचीत और रियल दुनिया के रिश्तों के बीच की सीमा धुंधली हो सकती है. इससे व्यक्ति असली लोगों से कम बातचीत करने लगता है और AI पर ज्यादा निर्भर हो सकता है. खासकर वे लोग जो अकेलापन महसूस करते हैं, स्ट्रेस में रहते हैं या मानसिक रूप से परेशान होते हैं.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि टेक्नोलॉजी का उपयोग लोगों की मदद करने के लिए किया जाए, न कि उन्हें असल दुनिया से और दूर ले जाने के लिए.
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