विज्ञापन

धोनी को आदर्श मानने वालीं वर्ल्ड चैंपियन जैसमीन लम्बोरिया को जानें, आर्मी से है कनेक्शन और नजरें CWG गोल्ड पर

महिला बॉक्सिंग के 57 kg की मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन जैसमीन लम्बोरिया ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए गोल्ड जीतने की अब सबसे मजबूत दावेदार हैं.

धोनी को आदर्श मानने वालीं वर्ल्ड चैंपियन जैसमीन लम्बोरिया को जानें, आर्मी से है कनेक्शन और नजरें CWG गोल्ड पर
जैसमीन लम्बोरिया
PTI/NDTV

कॉमनवेल्थ गेम्स में इस समय जिन खिलाड़ियों पर गोल्ड को लेकर सबसे अधिक नजरें टिकी हैं, उनमें 24 साल की जैसमीन लम्बोरिया का नाम सबसे ऊपर है. 57 किलोग्राम वर्ग की मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन जैसमीन अब ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतने के मिशन पर हैं. पर लम्बोरिया की सफलता की कहानी बेहद संघर्ष के बाद बनी है.

ये कहानी है उस वर्ल्ड चैंपियन की जो एक ऐसे परिवार से आती हैं जहां संसाधन सीमित हैं लेकिन इसके बावजूद परिवार ने उनके सपनों की उड़ान को पंख देने में कोई कसर नहीं छोड़ा. यह कहानी भारतीय सेना की पहली महिला बॉक्सर बनने की है. और यह कहानी है उस खिलाड़ी की जो दबाव के समय खुद को शांत रखने के लिए महेंद्र सिंह धोनी की सोच को अपना आदर्श मानती हैं.

धोनी हैं प्रेरणा

जैसमीन कहती हैं कि उन्हें भारत के पूर्व क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का शांत स्वभाव सबसे ज्यादा प्रेरित करता है. उनके मुताबिक, "धोनी को कैप्टन कूल यूं ही नहीं कहा जाता. मैं भी मुश्किल हालात में उसी तरह शांत रहना चाहती हूं."

बॉक्सिंग जैसे खेल में जहां एक छोटी सी गलती मुकाबला पलट सकती है, वहां मानसिक मजबूती उतनी ही जरूरी होती है जितनी शारीरिक ताकत.

साल 2025 जैसमीन के करियर का सबसे शानदार साल साबित हुआ. उन्होंने पहले अस्ताना और फिर दिल्ली में बॉक्सिंग वर्ल्ड कप में गोल्ड मेडल जीता. इसके बाद लिवरपूल में वर्ल्ड चैंपियन बनकर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. वर्ल्ड चैंपियन बनने के बाद अब उनका अगला लक्ष्य साफ है. कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज नहीं, गोल्ड.

पेरिस ओलंपिक की हार ने बदल दी सोच

पेरिस ओलंपिक 2024 जैसमीन के लिए उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा. पहले ही मुकाबले में उन्हें फिलीपींस की अनुभवी मुक्केबाज नेस्टी पेटेसियो से हार का सामना करना पड़ा. लेकिन जैसमीन इस हार को अपने करियर का सबसे बड़ा सबक मानती हैं.

उनका कहना है कि इस हार के बाद उन्होंने अपनी फिटनेस, तकनीक और मानसिक तैयारी तीनों पर दोबारा काम किया. इसी मेहनत का नतीजा था कि उन्होंने 60 किलोग्राम वर्ग छोड़कर दोबारा 57 किलोग्राम में वापसी की और विश्व चैंपियन बन गईं.

भारतीय सेना ने बदली दिशा

बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में कांस्य पदक जीतने के बाद जैसमीन भारतीय सेना में शामिल हुईं. वह भारतीय सेना की पहली महिला बॉक्सर बनीं जिन्हें कॉर्प्स ऑफ मिलिट्री पुलिस में शामिल किया गया.

आज वह सेना के मिशन ओलंपिक्स विंग के तहत पुणे स्थित आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षण लेती हैं. यहीं उनके खेल में नई ऊर्जा आई. कोचों ने उनकी ताकत बढ़ाई, जबकि स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट ने मानसिक मजबूती पर काम किया.

भारतीय सेना अब लड़कियों को भी शुरुआती उम्र से अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनाने की दिशा में काम कर रही है. 2024 में सेना ने 12 से 16 साल की लड़कियों के लिए गर्ल्स स्पोर्ट्स कंपनी शुरू की, जहां बॉक्सिंग समेत कई ओलंपिक खेलों की ट्रेनिंग दी जा रही है.

जैसमीन कहती हैं कि अगर वह पहली महिला बॉक्सर हैं, तो आखिरी नहीं होंगी. उन्हें सबसे ज्यादा खुशी तब हुई जब इसी कार्यक्रम की एक युवा बॉक्सर ने एशियन चैंपियनशिप में गोल्ड जीता.

बॉक्सिंग खून में थी

जैसमीन हरियाणा के भिवानी से आती हैं. भिवानी को भारत की मिनी क्यूबा कहा जाता है क्योंकि यहां से कई अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज निकले हैं.

उनके परदादा हवा सिंह भारतीय बॉक्सिंग के दिग्गजों में गिने जाते हैं. उन्होंने 1966 और 1970 एशियाई खेलों में लगातार दो गोल्ड मेडल जीते थे और भिवानी बॉक्सिंग क्लब की नींव रखने वालों में शामिल थे.

यही क्लब आगे चलकर ओलंपिक पदक विजेता विजेंदर सिंह जैसे खिलाड़ियों की नर्सरी बना.

जैसमीन कहती हैं कि उन्हें परदादा के पदकों से ज्यादा उनकी सादगी और विनम्रता की कहानियां प्रेरित करती हैं.

साधारण परिवार, असाधारण सपना

जैसमीन के पिता जयवीर होमगार्ड में काम करते हैं जबकि उनकी मां जोगिंदर गृहिणी हैं. घर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन परिवार ने कभी बेटी के सपनों के सामने रुकावट नहीं बनने दी.

करीब 14 साल की उम्र में उन्होंने बॉक्सिंग को गंभीरता से अपनाया और अपने परिवार के मार्गदर्शन में अभ्यास शुरू किया. आज वही बेटी विश्व चैंपियन बनकर देश का नाम रोशन कर रही है.

बचपन में जैसमीन मैरी कॉम, विजेंदर सिंह, अमित पंघाल, मनीष कौशिक, नीरज चोपड़ा, माइकल फेल्प्स और मिल्खा सिंह जैसे खिलाड़ियों को अपना आदर्श मानती थीं.

आज खुद जैसमीन नई पीढ़ी की लड़कियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं.

उनका मानना है कि बॉक्सिंग को लंबे समय तक पुरुषों का खेल माना जाता रहा, लेकिन अब भारतीय महिला मुक्केबाज दुनिया को बता रही हैं कि प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता.

अब नजर सिर्फ गोल्ड पर

बर्मिंघम में ब्रॉन्ज जीतने के बाद इस बार जैसमीन का लक्ष्य सिर्फ एक है. जब विदेश की धरती पर भारत का राष्ट्रगान बजे और वह पोडियम पर सबसे ऊपर खड़ी हों.

वर्ल्ड चैंपियन बनने के बाद अब कॉमनवेल्थ गोल्ड उनकी अगली बड़ी मंजिल है. अगर वह ऐसा कर पाती हैं तो यह सिर्फ उनके करियर की नहीं, बल्कि भारतीय महिला मुक्केबाजी और भारतीय सेना के खेल कार्यक्रम की भी एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी.

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Commonwealth Games 2026, Other Sports
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com