एशियाई खेलों में जाने से पहले उन्हें चोटों और खराब फार्म जैसी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन नागोया पहुंचते ही भारतीय पहलवानों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए दो गोल्ड समेत कुल छह मेडल जीते. अब वे 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक के लिए खुद को तैयार करने पर ध्यान दे रहे हैं. नागोया में अमन सहरावत और सुजीत कलकल ने गोल्ड मेडल जीते, जबकि नितेश सिवाच और अंतिम पंघाल ने सिल्वर और दीपक पूनिया व सुनील कुमार ने ब्रॉन्ज मेडल हासिल किए.
सहरावत के लिए, पुरुषों के 57 किग्रा फ्री स्टाइल में गोल्ड मेडल जीतना उनके करियर का सबसे बेहतर पल है. पेरिस ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद, 23 वर्षीय खिलाड़ी को 2025 में पेट की लगातार बीमारी का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उन्हें कई अहम टूर्नामेंट से बाहर होना पड़ा. नागोया में, उन्होंने फ़ाइनल में मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन हान चोंग सोंग को 11-7 से हराया.
स्वदेश लौटने पर उन्होंने कहा,"उतार-चढ़ाव और चोटें तो आती-जाती रहती हैं. ऐसा दौर भी आते हैं, लेकिन मुझे खुद पर भरोसा था. हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए, और मैंने भी यही किया. आज मैंने खेलों में गोल्ड मेडल जीता है. भविष्य का लक्ष्य ओलंपिक है." उन्होंने आगे कहा,"हमने देश के लिए गोल्ड जीता. भविष्य की योजना भी यही है - हम देश के लिए गोल्ड जीतेंगे और उसी के हिसाब से तैयारी करेंगे. मैं सभी देशवासियों का शुक्रिया अदा करता हूं. मैचों में उनकी दुआओं का ही असर हुआ." "हम भविष्य में और बेहतर करेंगे. पूरा देश हमें प्यार दे रहा है. अब LA ओलंपिक में हमारा राष्ट्रगान बजेगा."
भारत के एक और फ्रीस्टाइल गोल्ड मेडलिस्ट सुजीत के लिए, यह उम्मीदों पर खरा उतरने की बात थी. वर्ल्ड नंबर 2 इस सीजन में बिना कोई मैच हारे इन खेलों में उतरे थे. 65 किग्रा फाइनल में, उन्होंने 2-9 से पिछड़ने के बाद वापसी करते हुए ताजिकिस्तान के अब्दुलमज़िद कुदिएव को 10-9 से हराया और उस कैटेगरी में जीत हासिल की जिसमें पहले योगेश्वर दत्त और बजरंग पूनिया एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीत चुके थे. एयरपोर्ट पर कलकल ने कहा कि उनके लंबे संघर्ष का आखिरकार फल मिल गया है.
सुजीत ने कहा,"मैंने जो भी मेहनत की, उसका फल मिला है. फ़ाइनल मैच मुश्किल था, लेकिन उस समय मैं सिर्फ़ जीतने के बारे में सोच रहा था." "अब हम और प्रैक्टिस करेंगे, और अगर सब ठीक रहा, तो हम ओलंपिक्स में भी गोल्ड जीतेंगे. ओलंपिक्स के लिए प्रैक्टिस पहले ही शुरू हो चुकी है."
पुरुषों की 97kg ग्रीको-रोमन कैटेगरी में नितेश सिवाच के सिल्वर मेडल के पीछे एक दिलचस्प कहानी है. करियर की शुरुआत में घुटने की गंभीर चोट के कारण उन्हें 18 महीने से ज़्यादा समय तक रेसलिंग से दूर रहना पड़ा था. इस दौरान उन्होंने पानीपत में अपने परिवार के डेयरी बिजनेस में मदद की और दूध बेचा.
उनकी वापसी एशियन गेम्स के फ़ाइनल में ऐतिहासिक जगह बनाने के साथ हुई- इस वेट कैटेगरी में 64 सालों में भारत का यह पहला फ़ाइनल था. आखिरकार वे जापान के यूरी नाकाज़ातो से 0-4 से हार गए. सिवाच ने कहा,"मुझे बहुत अच्छा लग रहा है. यह पहली बार है जब मुझे इतना सम्मान और इज्जत मिल रही है. मैं पहली बार इतने शानदार स्वागत का अनुभव कर रहा हूं और बहुत खुश हूं."
उन्होंने माना कि वे गोल्ड जीतने के लक्ष्य के साथ गेम्स में गए थे, लेकिन सिल्वर मेडल से भी खुश थे क्योंकि यह इस बड़े इवेंट में उनका पहला मौका था. उन्होंने आगे कहा,"मेरा लक्ष्य गोल्ड जीतना था. मैं गोल्ड तो नहीं जीत पाया, लेकिन मैंने सिल्वर मेडल ज़रूर जीता और मैं इससे बहुत खुश हूं. चूंकि यह मेरा पहला एशियन गेम्स था, इसलिए मैं सिल्वर मेडल पाकर खुश हूं."
नितेश सिवाच ने कहा,"लोग कहते थे कि हम ग्रीको-रोमन में मेडल नहीं जीत पाएंगे, लेकिन हम अच्छा प्रदर्शन करते रहेंगे. हम लॉस एंजिल्स ओलंपिक्स से मेडल जीतकर लाएंगे." "मुझसे कुछ गलतियां हुईं, जिसकी वजह से मुझे सिल्वर मेडल से ही संतोष करना पड़ा. आगे मेरा लक्ष्य 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक्स में गोल्ड जीतना है, और मैं इसके लिए बहुत कड़ी मेहनत करूंगा."
उन्होंने कहा कि ओलंपिक्स की उनकी तैयारी पहले ही शुरू हो चुकी है. सिवाच ने कहा,"ओलंपिक्स के लिए मेरी तैयारी उसी दिन से शुरू हो गई थी, जिस दिन मैंने मेडल जीता था. मुझे ओलंपिक्स में गोल्ड जीतना है."
दीपक पूनिया भी अपने करियर के एक मुश्किल दौर से गुज़रने के बाद मेडल जीतकर दिल्ली पहुंचे. 2019 वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीतने वाले पूनिया, जो पहले 86kg और 92kg कैटेगरी में खेलते थे, इस साल मसल इंजरी के बाद 97kg कैटेगरी में चले गए और नई वेट कैटेगरी में एशियन गेम्स के लिए चुने गए. उन्होंने ब्रॉन्ज़ मेडल के मुकाबले में मंगोलिया के गनखुयाग गनबातर को 2-1 से हराया.
पूनिया ने कहा,"मेडल जीतना मेरे लिए काफी मुश्किल था क्योंकि मैं पहले 86kg कैटेगरी में खेलता था, लेकिन इस बार मैंने 97kg कैटेगरी में हिस्सा लिया. कई चुनौतियां थीं, और मेरी उम्मीद और लक्ष्य गोल्ड मेडल जीतना था. हालांकि, मुझे ब्रॉन्ज़ मेडल से ही संतोष करना पड़ा." "उम्मीद है कि हम आने वाले टूर्नामेंट में और भी बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे."
पूनिया ने कहा कि उनके अनुभव ने उन्हें दबाव संभालने में मदद की. उन्होंने कहा,"मैं लंबे समय से खेल रहा हूं, इसलिए दबाव तो होता ही है. हर एथलीट पर दबाव होता है. लेकिन मुझे समझ आ गया था कि दबाव को कैसे संभालना है. मेरे मन में बस यही था कि मुझे अपना बेस्ट देना है. ऐसा नहीं था कि मुझे बहुत ज़्यादा दबाव लेना था. मुझे बस अपना 100 परसेंट देना था और मैंने वही किया."
वहीं, अंतिम पंघाल ने महिलाओं की 53kg कैटेगरी में हांगझोऊ एशियन गेम्स के अपने ब्रॉन्ज़ मेडल को सिल्वर मेडल में बदला, हालांकि फाइनल में उन्हें जापान की मो कियोका से 1-9 से हार का सामना करना पड़ा. उनके कोच ने कॉम्पिटिशन से पहले उन्हें शांत रखने पर काम किया, यहां तक कि उनका आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए उन्हें अपने तय प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ पिछली जीत के वीडियो भी दिखाए.
पंघाल ने कहा,"यह दूसरी बार है जब मैंने मेडल जीता है. लेकिन मैंने सोचा था कि मुझे पहला स्थान हासिल करना है, पर मैं ऐसा नहीं कर पाई. भविष्य में, मैं इससे बेहतर करने की कोशिश करूँगी."
पुरुषों की 87kg ग्रीको-रोमन कैटेगरी में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने वाले सुनील कुमार ने हांगझोऊ में जीते अपने ब्रॉन्ज़ मेडल की बराबरी की और दो एशियन गेम्स मेडल जीतने वाले पहले भारतीय ग्रीको-रोमन रेसलर बन गए. घुटने की सर्जरी से उबरने के बाद वे पोडियम पर लौटे और ब्रॉन्ज़ मेडल के मुक़ाबले में फिलीपींस के कैलम जॉनस्टन रॉबर्ट्स को 'टेक्निकल सुपीरियरिटी' के आधार पर 9-0 से हराया. कुमार ने कहा,"मैं बहुत खुश हूं और अपने सभी देशवासियों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं. आपकी दुआएं और समर्थन हमेशा मेरे साथ बना रहे."
(इनपुट-पीटीआई)
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