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This Article is From Dec 18, 2025

राजस्थान: 1993 के सीरियल बम ब्लास्ट के दोषियों की समय पूर्व रिहाई की याचिका खारिज, हाई कोर्ट का फैसला 

मामला साल 1993 के सीरियल बम ब्लास्ट से जुड़ा है. जब 5 दिसंबर की आधी रात को मुंबई, सूरत, लखनऊ, कानपुर और हैदराबाद में लंबी दूरी की 6 ट्रेनों में सिलसिलेवार धमाके हुए थे.

राजस्थान: 1993 के सीरियल बम ब्लास्ट के दोषियों की समय पूर्व रिहाई की याचिका खारिज, हाई कोर्ट का फैसला 
राजस्थान हाई कोर्ट ने 1993 के सीरियल बम ब्लास्ट के दोषियों की समयपूर्व रिहाई की याचिका को खारिज कर दिया है.

1993 serial train bomb blasts case: राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने 1993 के सिलसिलेवार ट्रेन बम ब्लास्ट प्रकरण में आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (TADA) के तहत दोषी ठहराए गए और आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषियों की समयपूर्व रिहाई (Premature Release) की मांग को खारिज कर दिया है.

जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों में दोषी व्यक्तियों को रिहा करना समाज और राष्ट्र, दोनों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है. इस तरह की रिहाई से समाज में गलत संदेश जाएगा और राष्ट्रीय सुरक्षा व सार्वजनिक शांति पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है.

पिछले 20 वर्ष से अधिक समय से जेल में बंद हैं

अदालत ने दौसा निवासी असफाक खान, मुंबई के फजलुर रहमान सुफी, उत्तर प्रदेश के कबीनगर निवासी अबरे रहमत अंसारी और गुलबर्ग के मोहम्मद एजाज अकबर की याचिकाएं खारिज की है. ये सभी पिछले 20 वर्ष से अधिक समय से जेल में बंद हैं. दोषियों ने बढ़ती उम्र व स्वास्थ्य कारणों के आधार पर रिहाई की मांग कर रहे थे.

दोषियों की मांग- नीति के तहत विचार होना चाहिए

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार 20 वर्ष की सजा पूरी होने के बाद रिहाई पर विचार किया जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि उनके मामलों पर उस नीति के तहत विचार होना चाहिए, जो उनके सजा सुनाए जाने के समय लागू थी.

टाडा के तहत दोषियों की समयपूर्व रिहाई पर स्पष्ट प्रतिबंध

वहीं, केंद्र सरकार और राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भरत व्यास तथा महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने याचिकाओं का विरोध किया. सरकार ने कहा कि राजस्थान कैदी (सजा में कमी) नियम, 2006 और पूर्ववर्ती नियम, 1958, दोनों में ही टाडा के तहत दोषियों की समयपूर्व रिहाई पर स्पष्ट प्रतिबंध है. नियम 9(5) के अनुसार, ऐसे मामलों पर सलाहकार बोर्ड विचार नहीं कर सकता.

क्या था पूरा मामला ? 

मामला साल 1993 के सीरियल बम ब्लास्ट से जुड़ा है. जब 5 दिसंबर की आधी रात को मुंबई, सूरत, लखनऊ, कानपुर और हैदराबाद में लंबी दूरी की 6 ट्रेनों में सिलसिलेवार धमाके हुए थे. इन धमाकों में दो लोगों की मौत हुई थी, जबकि 22 अन्य घायल हुए थे. इसके बाद पूरे मामले की जांच सीबीआई ने की. 28 फरवरी 2004 को ट्रायल पूरा होने के बाद कोर्ट ने आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी.

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