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जूतों की जंग- कहीं मैराथन में इतिहास रचने वाले एथलीट ना रह जाएं पीछे!

इसमें कोई शक नहीं कि फॉर्मूला वन के कारों की तरह इक्विपमेंट, पहनावे और मशीन का असर खेलों पर ज़रूर होता है. लेकिन इन सबमें हमेशा एथलीट का रोल सबसे अहम होता है. फ़िलहाल एडिडास और नाइकी के जूतों को लेकर सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त बहस चल पड़ी है.

जूतों की जंग- कहीं मैराथन में इतिहास रचने वाले एथलीट ना रह जाएं पीछे!
जूतों को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहा है बहस

1908 के लंदन ओलिंपिक्स के मैराथन से लेकर अबतक 118 साल के इतिहास में केन्या के सैबेस्टियन सावे इथोपिया के योमिफ़ केजेल्चा ने मानव इतिहास में पहली बार लंदन मैराथ के 42.2 किलोमीटर (26.2 मील) की दूरी 2 घंटे से कम समय में पूरी कर ली. खेलों की दुनिया में ये इतनी बड़ी बात है कि इसकी तुलना शायद क्रिकेट में सर डॉन ब्रैडमैन के 99.94 के अविश्सनीय टेस्ट औसत (क्योंकि ब्रैडमैन के दूसरे नंबर पर श्रीलंका के बैटर पीएचकेडी मेंडिस का टेस्ट औसत 62.66 और 25वें नंबर पर सचिन तेंदुलकर का औसत 53.78 है), यूसेन बोल्ट के 9.58 सेकेंड में 100 मीटर का वर्ल्ड रिकॉर्ड, मशहूर तैराक माइकल फेल्प्स के ओलिंपिक्स में सबसे ज़्यादा 23 मेडल का रिकॉर्ड या अमेरिकी टीम के 1904 के सेंट लुइस ओलिंपिक में जीते गए 239 मेडल्स के रिकॉर्ड (85% मेडल) से की जा सकती है.

जूतों को लेकर सोशल मीडिया पर बहस  

इसमें कोई शक नहीं कि फॉर्मूला वन के कारों की तरह इक्विपमेंट, पहनावे और मशीन का असर खेलों पर ज़रूर होता है. लेकिन इन सबमें हमेशा एथलीट का रोल सबसे अहम होता है. फ़िलहाल एडिडास और नाइकी के जूतों को लेकर सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त बहस चल पड़ी है. इस रेस को जीतने के लिए adidas कंपनी ने बेशक एथलीट पर बड़ा इन्वेस्टमेंट (निवेश किया), एथलीट सैबेस्टियन सावे की बेतहाशा टेस्टिंग करवाई ताकि उनपर डोपिंग का आरोप ना लगे, जूते के रिसर्च से लेकर डिज़ाइन पर करोड़ों रुपये खर्च किये. सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म ‘X' पर एक अनीश मूनका @anishmoonka ने एक बेहतरीन पोस्ट डाली है. इस लंबे पोस्ट में अनीश ने पूरे मैराथन के प्रोसेस के बारे में विस्तार से लिखा है. इस पोस्ट को 4.2 मिलियन से ज़्यादा लोगों ने देखा है और 25,000 से ज़्यादा लोगों ने लाइक किया है. NDTV या इस लेख को लिखनेवाला संवाददाता इस पोस्ट के फ़ैक्ट्स या तथ्यों की पुष्टि नहीं करता. लेकिन ये पोस्ट ज्ञानवर्धक है और एक नैरेटिव भी गढ़ता दिखाई देता है.  

अनीश ने ‘X' पर पोस्ट किया है, “Nike ने 2 घंटे की मैराथन तोड़ने की कोशिश में दस साल लगाए. उन्होंने इस पर एक प्रोजेक्ट का नाम रखा. खास जूते बनाए. दुनिया के सबसे बड़े मैराथनर को इसे हासिल करने के लिए पैसे दिए. कल, एक केन्याई धावक ने आखिरकार इसे 1:59:30 में कर दिखाया, Adidas पहनकर. सेबेस्टियन सावे पहले पेसमेकर हुआ करते थे. पेसमेकर वो धावक होता है जिसे आप रेस के शुरुआती कुछ मील तक स्पीड सेट करने के लिए रखते हैं और फिर वो फिनिश से पहले हट जाता है. जनवरी 2022 में, सावे को स्पेन में एक हाफ-मैराथन के लिए ठीक यही काम करने को बुक किया गया था. उसने अपनी जिंदगी में कभी तीन मील से ज्यादा रेस नहीं की थी. वो पूरे 13 मील तक दौड़ा और पूरी रेस जीत गया. उसके कुछ समय बाद Adidas ने उसे साइन कर लिया. चार साल बाद, वो आधिकारिक मैराथन 2 घंटे से कम में दौड़ने वाला पहला इंसान बन गया.”

अनीश इसी पोस्ट में नाइकी के प्रयासों के बारे में भी विस्तार से बताते हैं. वो लिखते हैं, “Nike ने इस पूरे प्रोजेक्ट की शुरुआत 2016 में "Breaking2" नाम के एक पब्लिक लक्ष्य के साथ की थी। उन्होंने जूतों, पेसमेकर्स, साइंस लैब्स और खुद एलियुड किपचोगे के लिए पैसे दिए. किपचोगे ने 2019 में वियना में 1:59:40 दौड़ा, लेकिन वो इवेंट एक बंद-कोर्स प्रदर्शनी थी जिसमें घूमते हुए पेसमेकर्स और सड़क पर हरी लेजर लाइन दिखाने वाली एक पेस कार थी. खेल की सर्वोच्च संस्था ने इसे कभी असली रेस नहीं माना. वो गिना नहीं गया. फिर Nike का रनिंग बिजनेस धराशायी हो गया. एक तिमाही में डिजिटल बिक्री 26% गिर गई. Dick's Sporting Goods में बिकने वाले जूतों में उनका हिस्सा पांच महीनों में 39% से गिरकर 32% हो गया. On Running 2020 और 2025 के बीच $33 करोड़ से बढ़कर $1.8 अरब की हो गई. Hoka लगभग चार गुना बढ़ गई. रोजर फेडरर Nike छोड़कर On में चले गए. अक्टूबर 2024 में Nike के बोर्ड ने CEO को निकाल दिया. 

Nike और Adidas के बीच की रेस के दौरान adidas की कोशिशों पर भी अनीश ने रोशनी डाली है. अनीश आगे लिखते हैं, “Adidas ने इसी दौरान एक बेहतर जूता बनाने में समय लगाया। नया Adizero Adios Pro Evo 3 बनाने में तीन साल लगे. इसका वजन 97 ग्राम है, लगभग 3.4 औंस, ताश की गड्डी से भी हल्का. Wall Street Journal में छपी एक स्टडी के मुताबिक, 3.5 औंस हल्का जूता पहनने से एक धावक पूरी मैराथन में करीब 57 सेकंड बचाता है. सावे ने तीसरे स्थान पर आए धावक को 58 सेकंड से हराया. Adidas ने एक ऐसा काम भी किया जो Nike ने किपचोगे के लिए कभी नहीं किया. उन्होंने ट्रैक एंड फील्ड की आधिकारिक एंटी-डोपिंग बॉडी को $50,000 का चेक लिखा, और कहा कि सावे का टेस्ट दुनिया के किसी भी दूसरे धावक से ज्यादा सख्ती से किया जाए. पिछले साल के बर्लिन मैराथन से दो महीने पहले उसका 25 बार टेस्ट हुआ, और Adidas ने उसके कॉन्ट्रैक्ट की पूरी अवधि तक इसे फंड करने का वादा किया. तर्क ये था: जिस पल सावे इतनी तेज मैराथन दौड़ता, दुनिया पूछने वाली थी कि उसने चीटिंग की क्या, खासकर तब जब उसकी देशवाली रूथ चेपंगेटिच को 2025 में 3 साल का डोपिंग बैन लगा. Adidas ने पहले ही कदम उठा लिया. जूता $500 का है और मुश्किल से मिलता है. 2024 में सभी बड़ी मैराथन रेस में से आधी Adidas के Adizero जूतों ने जीतीं. कल लंदन में, टॉप पांच में से चार फिनिशर्स ने वही Adidas जूता पहना था. योमिफ केजेल्चा सावे के 11 सेकंड बाद लाइन पार कर गए और उन्होंने भी 2 घंटे तोड़ दिए. टॉप तीन धावकों ने पिछले वर्ल्ड रिकॉर्ड को तोड़ दिया. Nike का इकलौता जवाब एक इंस्टाग्राम पोस्ट था. तीन वाक्य लंबे: "घड़ी फिर से सेट हो गई है. कोई फिनिश लाइन नहीं है." 10 साल के मूनशॉट को अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी से हारने पर उनकी यही पूरी सार्वजनिक प्रतिक्रिया थी.”

इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. खुद @adidas और दुनिया भर के स्पोर्ट्स फ़ैन्स इस रेस और adidas नये जूते- #Adizero Adios Pro Evo 3 को लेकर लुभावने ट्वीट किये हैं. Adidas ने लिखा है, “फ़ास्ट के नये युग में आपका स्वागत है. The #Adizero Adios Pro Evo 3 अब आधिकारिक तौर पर सब-2 (दो घंटे से कम समय वाला) जूता बन गया है.      

जूतों का विज्ञान सही, पर एथलीट ना पीछे छूट जाए

जूते, पहनावे, हेल्दी ड्रिंक्स,खाना और एक्विपमेंट किसी भी खेल का अभिन्न हिस्सा हैं. खेलों में विज्ञान की हद से ज़्यादा अहमियत है. Adidas की कोशिशों की तारीफ़ करनी होगी और खेलों में धेर्य के साथ रिसर्च और निवेश की भी सराहना करनी होगी. दूसरे इनवेस्टर्स के लिए भी ये बड़ा सबक़ है. लेकिन इन सबके बीच एथलीट की काबिलियत को बार-बार अंडरलाइन किये जाने की ज़रूरत है, 

केन्या के 30 साल के एथलीट सेबैस्टियन सावे (Sabastian Sawe) ने लंदन मैराथन में वो कर दिखाया जिसे हासिल करना पिछले तकरीबन सवा सौ साल के वक्त में दुनिया भर के एथलीटों के लिए एक मिथक रहा. केन्या के सुपरस्टार एथलीट सेबैस्टियन सावे ने लंदन मैराथन में इतिहास रचते हुए 26 अप्रैल, रविवार को हमेशा के लिए यादगार बना दिया. सावे ने लंदन मैराथन की 42.2 किलोमीटर (26.2 मील) की दूरी 1 घंटे 59 मिनट 30 सेकंड में पूरी कर ली. बड़ी बात ये भी है कि लंदन मैराथन के इस रेस को इथोपियो के योमिफ केजेल्चा ने भी 2 घंटे से कम वक्त में पूरा कर लिया. योमिफ केजेल्चा ने अपने डेब्यू में 1:59:41 का समय निकाला और मैराथन के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि बेहद मुश्किल मानीजाने वाली मैराथन रेस को दो इंसानों ने दो घंटे से भी कम में वक्त में पूरा कर लिया.

कौन हैं सेबैस्टियन सावे, क्या खाते हैं और क्या है रुटीन?

केन्या के 30 साल के सेबैस्टियन सावे ने लंदन मैराथन को पूरा करने में 1:59:30 (1 घंटा, 59 मिनट, 30 सेकंड) का समय निकाला और केन्या के ही केल्विन किप्टम के पिछले वर्ल्ड रिकॉर्ड को 65 सेकंड से पीछे छोड़ दिया. केन्या के लॉन्ग डिस्टेंस रनर सावे ने इससे पहले 2023 वर्ल्ड रोड रनिंग चैंपियनशिप्स और 2023 वर्ल्ड क्रॉस कन्ट्री चैंपियनशिप्स में गोल्ड के अलावा 2025 बर्लिन मैराथन और 2025 और 2026 के लंदन मैराथन में गोल्ड मेडल अपने नाम किए हैं. 

सावे केन्या के रिफ़्ट वैली वाले ग्रामीण इलाके से आते हैं जहां से ज़्यादातर बड़े रनर्स निकलते हैं. वो शुरुआत में 10,000 मीटर और हाफ़ मैराथन में माहिर माने जाते थे. सावे एक गरीब परिवार से उभरे एथलीट बताये जाते हैं. दूसरे रनर्स की तरह उनके लिए भी दौड़ना ग़रीबी से निकलने का रास्ता रहा है. वो केन्या के हाई अल्टीट्यूड सेंटर कपटागाट या इटेन में ट्रेनिंग करते हैं. वो मशहूर कोच पैट्रिक सैंग की अगुआई में ट्रेनिंग करते हैं जो मशहूर रनर Eliud Kichoge के भी कोच रहे हैं. 

सावे हर रोज़ सुबह 5 बजे उठकर 25-30 किमी की ट्रेनिंग करते रहे हैं. हफ़्ते भर में वो 200 किमी से ज़्यादा भागने का टारगेट पूरा करते रहे हैं. उनका खाना उगाली, सब्जी और दूध बताया जाता है. वो शहरों के चकाचौंध से दूर रहनेवाले ऐसे एथलीट हैं जो अपनी कमाई का हिस्सा गांवों में ही लगा देते हैं. 

ग़ौरतलब है कि सावे ने जिन केल्विन किप्टुम का रिकॉर्ड तोड़ा वो खुद उनके दोस्त रहे. केल्विन किप्टुम का 2024 में सिर्फ़ 24 साल की उम्र में एक रोड एक्सीडेंट में देहांत हो गया. 

55 मिनट कम करने में 118 साल का वक्त लगा 

1908 के लंदन ओलिंपिक्स में अमेरिका के जॉनी हेज़ ने मैराथन की रेस को पूरा करने के लिए 2:55:18.4 (2 घंटा, 55 मिनट, 18.4 सेकेंड) का वक्त निकाला था. फिर 1929 में हैरी पेन ने 2:30:57.6  सेकेंड में ये रेस पूरी की. इंग्लैंड के ही जिम पीटर्स ने 1952 में 2:20:42.2 के वक्त में ये रेस पूरी की. ऑस्ट्रेलिया के डेरेक क्लेयटन 1967 में पहली बार मैराथन के वक्त को 2 घंटा 10 मिनट से कम की सीमा रेखा यानी 2:09:36.4 में रेस पूरी कर ली. 

मोरक्को के खालिद खनौचि जो बाद में अमेरिकी एथलीट बन गए, ने 1999 के शिकागो मैराथन में 2:05:42 का वक्त निकाला. केन्या के केल्विन किप्टम ने शिकागो मैराथन 2:00:35 के वक्त में ये मैराथन पूरी की थी. मगर 2 घंटे से कम का वक्त निकालने वाले पहले दो एथलीट साबित हुए केन्या के 30 साल के एथलीट सेबैस्टियन सावे और इथोपियो के योमिफ केजेल्चा. 

मैराथन के बड़े मुक़ाम- 100 साल में 55 मिनट फ़ास्ट हुए रनर्स

टाइम    एथलीट    साल    देश
2:55:18.4    जॉनी हेज    1908    इंग्लैंड
2:20:42.2    जिम पीटर्स    1952    इंग्लैंड
2:09:36.4    डेरेक क्लेयटन    1967    ऑस्ट्रेलिया

2:05:42        खालिद खनौचि    1999    मोरक्को(बाद में अमेरिका)
2:00:35    केल्विन किप्टम    2023    केन्या

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