जब कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का पहला मेडल जीतने के बाद झंडू कुमार का नाम स्टेडियम में गूंजा, तो उस नाम का महत्व उनके गले में लटके ब्रॉन्ज मेडल से कहीं ज्यादा था. 'झंडू' नाम उन्हें तब दिया गया था जब उनके माता-पिता ने उनके पोलियो के इलाज में अपनी सारी जमा-पूंजी खर्च कर दी थी. आज, इसी नाम ने भारत का मान बढ़ाया है.
बिहार के 28 वर्षीय पैरा पावरलिफ्टर ने शुक्रवार को पुरुषों के हैवीवेट वर्ग में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता. उन्होंने 181 किग्रा और 190 किग्रा वज़न सफलतापूर्वक उठाकर कुल 130.9 अंक हासिल किए. 196 किग्रा वज़न उठाने की उनकी साहसी कोशिश, जो उन्हें बेहतर मेडल की दौड़ में शामिल कर सकती थी, निराशाजनक रही.
SAI के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने पत्रकारों से कहा, 'खुशी का ठिकाना नहीं है. मैं कल रात से सो नहीं पाया हूं. लेटने पर भी नींद नहीं आ रही है.' हालांकि, आखिरी लिफ्ट में मिली असफलता उन्हें परेशान नहीं करती. 'मैंने पहली लिफ्ट सुरक्षित तरीके से की. अगर मैं पहली लिफ्ट में ज्यादा ज़ोर लगाता और असफल हो जाता, तो मेरे लिए मुश्किल हो जाती. मेरा आत्मविश्वास कम हो जाता. मेरा मकसद पहली लिफ्ट पास करना था. उसके बाद, दूसरी लिफ्ट मेडल की दौड़ में शामिल होने के लिए थी. तीसरी लिफ्ट गोल्ड मेडल के लिए थी.
उन्होंने कहा कि, 'मैं गोल्ड मेडल नहीं जीत सका. यह एक तकनीकी खराबी थी. जल्दबाजी में सांस लेने में मुझसे गलती हो गई. जब मैं ऊपर जा रहा था, तो मैंने लिफ्ट सही तरीके से की. लेकिन जब मैं बाहर निकला, तो वह (बारबेल) रैक में फंस गया.' मेडल जीतने वाली कोशिशों के बारे में सोचने से बहुत पहले, बिहार के इस पावरलिफ्टर को खेल के मैदान से दूर कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा था.
पोलियो और लोगों के ताने
उन्होंने कहा कि, 'मेरे परिवार का कहना है कि जब मैं 5 साल का था, तब मुझे पोलियो हुआ था. मुझे बैठकर चलना पड़ता था. लोग मेरा मज़ाक उड़ाते थे.' लोग कहते थे, 'अब जब वह दिव्यांग हो गया है, तो क्या करेगा?' ताने यहीं नहीं रुके. उनके अनोखे नाम के पीछे एक दुखद कहानी है. पोलियो होने के बाद उनके इलाज में परिवार की सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई. उनके पिता के दोस्त परिवार का मज़ाक उड़ाते हुए कहते थे, 'आपके बेटे ने सब झंडू कर दिया, सारे पैसे खत्म कर दिए.' यह निकनेम (उपनाम) ही रह गया.
बार-बार नाम पूछा और जोर-जोर से हंसने लगे
उन्होंने एक बार इसे बदलकर 'अविनाश कुमार' करने की कोशिश की. लेकिन एक सरकारी दफ़्तर में अधिकारियों ने उन्हें "झंडू कुमार" कहकर बुलाया. कौतूहलवश उन्होंने उन्हें अंदर बुलाया, बार-बार उनका नाम पूछा और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे. 'मुझे लगा कि अगर मेरे नाम पर सब हंस रहे हैं. तो यह नाम अच्छा ही है.' उस दिन से उन्होंने इस नाम को अपना लिया.
माता-पिता आज भी गांव में सब्ज़ियां बेचते हैं
उन्होंने कहा कि, 'अब हमारे सभी कागज़ात में नाम 'झंडू कुमार' ही है. इसलिए, 'अविनाश कुमार' का अब कोई अस्तित्व नहीं है.' ज़िंदगी संघर्षपूर्ण बनी रही. उनके माता-पिता आज भी गांव में सब्ज़ियां बेचते हैं, जबकि उन्होंने अपनी डाइट और सप्लीमेंट्स का खर्च उठाने के लिए आठ-नौ महीने ई-रिक्शा चलाया. 'मैंने अपनी डाइट के लिए ई-रिक्शा चलाया. मैंने सोचा कि 200-400 रुपये कमाऊंगा और उससे सप्लीमेंट्स लेकर जिम जारी रखूंगा.'
'मैं शाम को जिम जाता था, लेकिन दिक्कत यह थी कि दिन भर गाड़ी चलाने के बाद मैं थक जाता था, इसलिए जिम का समय कम हो रहा था.' अपनी दिव्यांगता के कारण गाड़ी चलाना भी आसान नहीं था. मुझे ब्रेक दबाने में दिक्कत होती थी, लेकिन पोलियो के बावजूद मैंने इसे संभाल लिया.'
इत्तेफ़ाक से ही शुरू हुआ पावरलिफ्टिंग का सफर
शुरुआत में शॉट-पुट खिलाड़ी रहे झंडू ने पैरा पावरलिफ्टिंग के बारे में कभी नहीं सुना था, जब तक कि बिहार के कोच कुंदन पांडे ने उनके शरीर-गठन को देखकर उन्हें इस खेल को आज़माने का सुझाव नहीं दिया. उन्होंने सलाह मानी, सासाराम में राज्य स्तरीय चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और सीमित आर्थिक मदद व रुक-रुक कर हुई ट्रेनिंग के बावजूद धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए.
2022 में नेशनल चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने से उनका यह भरोसा और मज़बूत हुआ कि वह कुछ बड़ा हासिल कर सकते हैं. उसी साल सुधीर ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता. उन्होंने कहा, "जब हमारे जिम के मालिक ने मुझे बताया कि सुधीर भाई ने 212kg वज़न उठाकर कॉमनवेल्थ गेम्स जीता है, तो मैंने कहा कि मैं भी ऐसा ही करूँगा. मैंने सोचा कि मुझे अपने देश के लिए ऐसा करना है.'
गांधीनगर में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के नेशनल सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस में ट्रेनिंग कर रहे झंडू का कहना है कि उनकी खेल से जुड़ी ज़रूरतों का ध्यान रखा जाता है, भले ही घर पर ज़िंदगी सादगी भरी हो. 'मेरे माता-पिता खुश हैं, मेरे गाँव में मिठाइयाँ बाँटी गई हैं." उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, 'कॉमनवेल्थ गेम्स का ब्रॉन्ज़ मेडल तो बस शुरुआत है. 'मेरा सफ़र शुरू हो गया है, आगे पैरा एशियन गेम्स और पैरालंपिक्स हैं, जिनके लिए मुझे तैयारी करनी है." उन्होंने अपने लिए और भी बड़ा लक्ष्य तय कर लिया है. 232kg का रिकॉर्ड है. मैं उस रिकॉर्ड को तोड़ना चाहता हूँ,'
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