Neeraj Chopra Javelin Career Commonwealth Games 2026: आज जब नीरज चोपड़ा जैवलिन लेकर मैदान में उतरते हैं तो करोड़ों भारतीयों की उम्मीदें उनके साथ चलती हैं. लेकिन कुछ साल पहले तक यही नीरज एक ऐसे लड़के थे, जिसे गांव में लोग उसके बढ़े हुए वजन की वजह से चिढ़ाते थे. शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही लड़का एक दिन भारत को एथलेटिक्स का पहला ओलंपिक गोल्ड दिलाएगा. कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में नीरज आठ साल बाद फिर से मैदान में उतर रहे हैं. क्वालिफिकेशन राउंड से उनका नया अभियान शुरू होगा, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे कई साल की मेहनत, चोट, संघर्ष और लगातार खुद को बेहतर बनाने की कहानी छिपी है.
जब नीरज वजन कम करने के लिए पहुंचे स्टेडियम
24 दिसंबर 1997 को हरियाणा के पानीपत जिले के खंडरा गांव में जन्मे नीरज किसान परिवार से आते हैं. बचपन में उनका वजन तेजी से बढ़ गया था. 11 से 13 साल की उम्र में उनका वजन 80 किलो से ज्यादा हो चुका था. गांव के लोग मजाक उड़ाते थे और परिवार भी उनकी सेहत को लेकर चिंतित रहता था. इसी वजह से उन्हें पानीपत के स्टेडियम भेजा गया ताकि उनका वजन कम हो सके. किसी को नहीं पता था कि यही फैसला उनकी जिंदगी बदल देगा.
एक भाले ने बदल दी जिंदगी
स्टेडियम में नीरज ने पहली बार खिलाड़ियों को जैवलिन फेंकते देखा. उन्हें यह खेल पसंद आया और धीरे धीरे उन्होंने खुद भी भाला उठाना शुरू कर दिया. उनकी प्रतिभा को सबसे पहले कोच जयवीर चौधरी ने पहचाना और शुरुआती ट्रेनिंग के दौरान ही साफ हो गया कि नीरज में कुछ अलग बात है. इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान इसी खेल पर लगा दिया.
जिस दिन दुनिया ने पहली बार नीरज को पहचाना
साल 2016 नीरज के करियर का पहला बड़ा मोड़ साबित हुआ. पोलैंड में हुई विश्व अंडर 20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 86.48 मीटर का थ्रो फेंका. यह जूनियर विश्व रिकॉर्ड था और इसी के साथ उन्होंने गोल्ड मेडल भी जीत लिया. यहीं से दुनिया ने पहली बार भारत के इस युवा जैवलिन थ्रोअर को गंभीरता से लेना शुरू किया.
सेना ने दिया नया हौसला
विश्व चैंपियन बनने के कुछ समय बाद भारतीय सेना ने उन्हें नायब सूबेदार के पद पर नियुक्त किया. इससे उन्हें आर्थिक मजबूती भी मिली और खेल पर पूरा ध्यान देने का मौका भी. सेना का अनुशासन उनके खेल में भी साफ नजर आने लगा.
2018... जब नीरज ने दुनिया को अपनी ताकत दिखाई
2018 नीरज के करियर का गोल्डन साल रहा. उन्होंने पहले गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीता. इसके बाद जकार्ता एशियन गेम्स में भी स्वर्ण पदक अपने नाम किया. लगातार दो बड़े खिताब जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि अब वह सिर्फ उभरते खिलाड़ी नहीं, बल्कि दुनिया के बड़े दावेदार हैं.
जब चोट ने रोक दिया कदम
2019 में उनकी दाईं कोहनी में गंभीर चोट लगी. सर्जरी करानी पड़ी और कई महीने मैदान से दूर रहना पड़ा. हर खिलाड़ी के करियर में ऐसा दौर आता है, जब वापसी आसान नहीं होती. नीरज के लिए भी यह सबसे मुश्किल समय था. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. चोट से उबरने के बाद जनवरी 2020 में दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने 87.86 मीटर का थ्रो कर टोक्यो ओलंपिक का टिकट हासिल किया.
टोक्यो ओलंपिक 7 अगस्त 2021 की वो तारीख
टोक्यो ओलंपिक के फाइनल में नीरज ने दूसरे प्रयास में 87.58 मीटर का थ्रो किया. यही थ्रो भारत के लिए इतिहास बन गया. एथलेटिक्स में देश का पहला ओलंपिक गोल्ड और व्यक्तिगत स्पर्धा में दूसरा स्वर्ण पदक. उस दिन सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं जीता था, बल्कि भारतीय एथलेटिक्स की तस्वीर बदल गई थी.
टोक्यो ओलंपिक के बाद भी नीरज का सफर नहीं थमा. उन्होंने 2023 विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में गोल्ड जीता. एशियन गेम्स में फिर स्वर्ण पदक अपने नाम किया. पेरिस ओलंपिक 2024 में सिल्वर मेडल जीतकर लगातार दूसरे ओलंपिक में पोडियम पर पहुंचे. इसके बाद दोहा डायमंड लीग 2025 में पहली बार 90 मीटर का आंकड़ा पार करते हुए 90.23 मीटर का थ्रो किया. यह उनके करियर का सबसे लंबा थ्रो भी है.
हर टूर्नामेंट में खुद से लड़ते हैं नीरज
नीरज की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ दूरी नहीं, बल्कि निरंतरता है. बड़े मंच पर दबाव के बीच भी उनका प्रदर्शन अक्सर शानदार रहता है. यही वजह है कि उन्हें दुनिया के सबसे भरोसेमंद जैवलिन थ्रोअर में गिना जाता है. हालांकि हर प्रतियोगिता उनके नाम नहीं रही. 2025 विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में वह आठवें स्थान पर रहे, जबकि 2026 दोहा डायमंड लीग में चौथा स्थान मिला. लेकिन इन नतीजों ने उनके इरादों को कमजोर नहीं किया.
अब नजर कॉमनवेल्थ गेम्स पर
आठ साल बाद नीरज फिर कॉमनवेल्थ गेम्स के मैदान में उतर रहे हैं. 2018 में उन्होंने गोल्ड जीता था और 2022 में चोट की वजह से हिस्सा नहीं ले सके थे. आज उनका पहला लक्ष्य क्वालिफिकेशन पार करना होगा. अगर वह फाइनल में पहुंचते हैं तो 31 जुलाई की रात एक बार फिर भारत की नजरें उनके भाले पर होंगी.
नीरज की कहानी बताती है कि बड़े खिलाड़ी सिर्फ प्रतिभा से नहीं बनते. मेहनत, अनुशासन, मुश्किल समय में धैर्य और लगातार बेहतर बनने की जिद ही उन्हें दूसरों से अलग बनाती है.
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