मुंबई में किन्नर प्रिया पाटिल भी बीएमसी का चुनाव लड़ रही हैं.
- सरकारी आदेश न होने से ओबीसी का प्रमाणपत्र नहीं मिल रहा
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुतबिक किन्नर ओबीसी श्रेणी में
- रोजगार के जरिए रोजी-रोटी कमाना चाहते हैं किन्नर
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मुंबई:
इस बार मुंबई महानगरपालिका चुनाव में किन्नर भी भाग्य आजमाएंगे. किन्नर मां ट्रस्ट की तरफ की तरफ से इसके लिए प्रिया पाटिल किन्नर का नाम आगे बढ़ाया गया है, लेकिन इसके लिए जरूरी दस्तावेजों को जमा करने में उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है.
कुर्ला में रहने वाली 30 साल की प्रिया पाटिल 12 वीं पास है और निर्मला निकेतन से समाज सेवा में डिप्लोमा कर रही हैं. अपने समाज के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा रखने वाली प्रिया बीएमसी चुनाव में खड़ी हो रही हैं. उन्हें आधार कार्ड, मतदाता सूची में नाम और शौचालय का इस्तेमाल करने जैसे प्रमाण-पत्र तो मिल गए हैं लेकिन ओबीसी का प्रमाणपत्र नहीं मिल पाया. जबकि साल 2014 में सर्वोच्च न्यायालय किन्नरों को ओबीसी में शामिल करने का फैसला दे चुका है.
प्रिया ने बताया कि तहसीलदार का कहना है कि अभी इस संदर्भ में कोई जीआर ही नहीं निकला है. प्रिया ओबीसी उम्मीदवार के लिए आरक्षित वार्ड क्रमांक 163 से चुनाव लड़ना चाहती हैं लेकिन सरकारी उदासीनता के चलते वे बगल के सामान्य वार्ड से चुनाव लड़ने के लिए मजबूर हैं.
मुंबई में तकरीबन चार लाख किन्नर हैं. मुंबई में किन्नरों के उत्थान के लिए काम करने वाली संस्था किन्नर मां का दावा है कि कागजों पर तृतीयपंथी कॉलम तो छप गए हैं लेकिन अभी तक कोई सुविधा और संरक्षण नहीं मिला है. किन्नर मां ट्रस्ट की अध्यक्ष सलमा खान का कहना है कि उनके समाज को सरकार और समाज दोनों से उपेक्षा ही मिलती आई है. उन्होंने कहा कि ''किन्नरों के लिए शेल्टर होम, चिकित्सा और कुटीर उद्योग की तुरंत जरूरत है और यह सब हम भीख में नहीं मांग रहे, यह हमारा हक है.''
किन्नर सोनाली चौकेकर का कहना है कि किन्नर भी रोजगार और नौकरी के जरिए रोजी-रोटी कमाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें मौका नहीं दिया जाता. भेदभाव किया जाता है. ओबीसी का दर्जा मिलने से सरकारी योजनाओं और नौकरी का लाभ मिल सकता है लेकिन सरकार उसके लिए जरूरी कदम ही नहीं उठा रही.
चुनाव की तैयारी में जुटी प्रिया का कहना है बात चुनाव में जीत या हार की नहीं , बात मान-सम्मान की है. हमारी असली लड़ाई तो किन्नरों के प्रति लोगों के मन में बनी गलत धारणा को दूर करना है. इसके लिए चुनाव एक अच्छा मौका है.
कुर्ला में रहने वाली 30 साल की प्रिया पाटिल 12 वीं पास है और निर्मला निकेतन से समाज सेवा में डिप्लोमा कर रही हैं. अपने समाज के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा रखने वाली प्रिया बीएमसी चुनाव में खड़ी हो रही हैं. उन्हें आधार कार्ड, मतदाता सूची में नाम और शौचालय का इस्तेमाल करने जैसे प्रमाण-पत्र तो मिल गए हैं लेकिन ओबीसी का प्रमाणपत्र नहीं मिल पाया. जबकि साल 2014 में सर्वोच्च न्यायालय किन्नरों को ओबीसी में शामिल करने का फैसला दे चुका है.
प्रिया ने बताया कि तहसीलदार का कहना है कि अभी इस संदर्भ में कोई जीआर ही नहीं निकला है. प्रिया ओबीसी उम्मीदवार के लिए आरक्षित वार्ड क्रमांक 163 से चुनाव लड़ना चाहती हैं लेकिन सरकारी उदासीनता के चलते वे बगल के सामान्य वार्ड से चुनाव लड़ने के लिए मजबूर हैं.
मुंबई में तकरीबन चार लाख किन्नर हैं. मुंबई में किन्नरों के उत्थान के लिए काम करने वाली संस्था किन्नर मां का दावा है कि कागजों पर तृतीयपंथी कॉलम तो छप गए हैं लेकिन अभी तक कोई सुविधा और संरक्षण नहीं मिला है. किन्नर मां ट्रस्ट की अध्यक्ष सलमा खान का कहना है कि उनके समाज को सरकार और समाज दोनों से उपेक्षा ही मिलती आई है. उन्होंने कहा कि ''किन्नरों के लिए शेल्टर होम, चिकित्सा और कुटीर उद्योग की तुरंत जरूरत है और यह सब हम भीख में नहीं मांग रहे, यह हमारा हक है.''
किन्नर सोनाली चौकेकर का कहना है कि किन्नर भी रोजगार और नौकरी के जरिए रोजी-रोटी कमाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें मौका नहीं दिया जाता. भेदभाव किया जाता है. ओबीसी का दर्जा मिलने से सरकारी योजनाओं और नौकरी का लाभ मिल सकता है लेकिन सरकार उसके लिए जरूरी कदम ही नहीं उठा रही.
चुनाव की तैयारी में जुटी प्रिया का कहना है बात चुनाव में जीत या हार की नहीं , बात मान-सम्मान की है. हमारी असली लड़ाई तो किन्नरों के प्रति लोगों के मन में बनी गलत धारणा को दूर करना है. इसके लिए चुनाव एक अच्छा मौका है.
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