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फर्जी वरिसाना के जरिये सीमेंट कंपनी को बेची आदिवासियों की जमीन, ईओडब्ल्यू में केस दर्ज

मैहर के भदनपुर में आदिवासी परिवार की 3.500 हेक्टेयर जमीन फर्जी वारिसाना और दस्तावेजों के जरिये हड़पकर 2.50 करोड़ रुपये में सीमेंट कंपनी को बेचने का आरोप है. EOW रीवा ने पटवारी समेत 9 आरोपियों पर केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.

फर्जी वरिसाना के जरिये सीमेंट कंपनी को बेची आदिवासियों की जमीन, ईओडब्ल्यू में केस दर्ज

मध्‍यप्रदेश के मैहर जिले में आदिवासियों की भूमि से जुड़े फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है. आरोपियों ने फर्जी वारिसाना दर्ज किया और ऋण पुस्तिका तैयार कर बेशकीमती जमीन हड़पते हुए अल्ट्राटेक सीमेंट प्लांट को बेच दी. इस मामले में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ रीवा ने पटवारी व बिचौलियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया है. शिकायत की जांच के बाद मामला आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ में पंजीबद्ध कर लिया गया है और विस्तृत विवेचना जारी है.

कैसे शुरू हुआ खेल?

डॉ.अरविंद सिंह ठाकुर EOW रीवा एसपी के अनुसार मामला मैहर जिले के ग्राम भदनपुर से जुड़ा है. गरीब आदिवासी परिवार की लगभग 3.500 हेक्टेयर कृषि भूमि को सुनियोजित तरीके से राजस्व अभिलेखों में हेरफेर की गई. शिकायत में बताया गया कि भूमि मूल रूप से रामसिंह गोड़ के नाम वर्ष 2010-11 तक राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज थी. वर्ष 2012-13 के दौरान तत्कालीन हल्का पटवारी और बिचौलियों ने मिलीभगत कर बिना सक्षम राजस्व अधिकारी के आदेश और बिना वास्तविक भू-स्वामी की जानकारी के जमीन का वारिसाना उनके पुत्र राजेन्द्र सिंह के नाम दर्ज करा दिया.

इसके बाद फर्जी ऋण पुस्तिका तैयार कराई गई और जमीन के नाम पर बैंक से ऋण दिलाने का झांसा देकर राजेन्द्र सिंह को धोखे में रखा गया. आगे चलकर संबंधित भूमि शोभा कोल और बैजनाथ कोल के नाम रजिस्ट्री व खसरे में दर्ज करवा दी गई. जांच में यह भी सामने आया कि उक्त भूमि बाद में अल्ट्राटेक सीमेंट की सरला नगर इकाई को लगभग 2.50 करोड़ रुपये में बेच दी गई. हैरानी की बात यह है कि वास्तविक भूमि स्वामी या उसके परिवार को इस बिक्री की कोई जानकारी नहीं थी और न ही उन्हें कोई धनराशि प्राप्त हुई.

तत्कालीन पटवारी सहित 9 आरोपी बनाए गए

मामले में तत्कालीन पटवारी अशोक सिंह सहित कई बिचौलियों और संबंधित व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया है. इनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 420, 467, 468, 471 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धारा 7, 13(1)(ए) और 13(2) के तहत अपराध दर्ज किया गया है. साथ ही अन्य संबंधित राजस्व अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है.

आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ का कहना है कि दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड और बैंक लेनदेन की गहन जांच की जा रही है. यह मामला आदिवासी भूमि की सुरक्षा और राजस्व तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है. अधिकारियों का दावा है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

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धर्मेंद्र वर्मा
संवाददाता
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