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'दर्द से बड़ी मंजिल होती है...' पिता ने बढ़ाया हौसला, एम्बुलेंस में दिया इंटरव्यू, दिव्यांगता को हराकर हिमांशु ऐसे बने डिप्टी कलेक्टर

Himanshu Soni Success Story: हिमांशु की कहानी में असली परीक्षा उस वक्त आई जब इंटरव्यू से ठीक 9 दिन पहले आई, जब वो बाथरूम में फिसल गए और उनका हाथ बुरी तरह फ्रैक्चर हो गया. डॉक्टरों ने तुरंत ऑपरेशन की सलाह दी और 23 अगस्त को उनका ऑपरेशन हुआ. हिमांशु साक्षात्कार देने के हालत में नहीं थे, उन्होंने एम्बुलेंस से इंटरव्यू स्थल तक गए.

'दर्द से बड़ी मंजिल होती है...' पिता ने बढ़ाया हौसला, एम्बुलेंस में दिया इंटरव्यू, दिव्यांगता को हराकर हिमांशु ऐसे बने डिप्टी कलेक्टर

Himanshu Soni Success Story: अगर हौसला बुलंद है तो हारी हुई बाजी भी आसानी से जीत सकते हैं... ऐसा ही हुआ है जबलपुर के हिमांशु सोनी के साथ. हिमांशु सोनी का एक ही सपना था डिप्टी कलेक्टर बनना, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उनके जीवन में दिव्यांगता बड़ी बाधा थी. रोजमर्रा के काम कार्यों के लिए उन्हें घरवालों और व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ता है...

व्हीलचेयर-एंबुलेंस से डिप्टी कलेक्टर की कुर्सी तक... 

लेकिन हिमांशु दिव्यांगता को अपने सपनों के बीच आने नहीं दिया. उन्होंने संघर्ष और जज्बे के दम पर मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) परीक्षा में दिव्यांग कोटा में प्रथम स्थान, जबकि ओवरऑल 13वीं रैंक हासिल कर डिप्टी कलेक्टर बनने का सपना साकार किया. इन सब के बीच सबसे चौकाने वाली बात ये थी उनका इंटरव्यू साक्षात्कार कक्ष ने नहीं, बल्कि एम्बुलेंस में हुआ था...

हिमांशु सोनी का जन्म जबलपुर के अधारताल में हुआ. वो जन्म से ही 100 प्रतिशत दिव्यांग हैं, इसके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी. 

हिमांशु का जीवन आसान नहीं रहा. रोजमर्रा के काम करने के लिए उन्हें हमेशा घरवालों और व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने हार मानना कभी नहीं सीखा.

इंटरव्यू से 9 दिन पहले हुआ हादसा

उनकी कहानी में असली परीक्षा उस वक्त आई जब इंटरव्यू से ठीक नौ दिन पहले, 19 अगस्त 2025 को वो बाथरूम में फिसल गए और उनका हाथ बुरी तरह फ्रैक्चर हो गया. डॉक्टरों ने तुरंत ऑपरेशन की सलाह दी और 23 अगस्त को उनका ऑपरेशन हुआ.

पिता ने बढ़ाया हौसला

इसी बीच 28 अगस्त 2025 को इंटरव्यू की तारीख नजदीक आ गई. हालत इतनी खराब थी कि चलना-फिरना तक मुश्किल था. एक पल को हिमांशु ने इंटरव्यू छोड़ने का मन भी बना लिया, लेकिन उनके पिता ने हौसला बढ़ाया और कहा- 'मौका हाथ से मत जाने देना, दर्द से बड़ी मंजिल होती है.' यही प्रेरणा हिमांशु को आगे बढ़ने की ताकत बनी.

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एम्बुलेंस में हुआ था इंटरव्यू

हिमांशु ट्रेन से इंदौर पहुंचे और वहां से एम्बुलेंस में इंटरव्यू स्थल तक गए. हालत देखकर उन्होंने आयोग के अधिकारियों से निवेदन किया, जिसके बाद अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अधिकारियों ने एम्बुलेंस में ही उनका इंटरव्यू लिया. हिमांशु ने हिम्मत नहीं हारी और अपने आत्मविश्वास से हर सवाल का जवाब दिया. नतीजा आया तो वो न केवल सफल हुए बल्कि पूरे प्रदेश के लिए मिसाल बन गए.

चुनौतियों से भरा रहा हिमांशु का जीवन

हिमांशु सोनी कहते हैं, 'काफी संघर्ष के बाद यह सफलता हासिल हुई है. जन्म से ही मेरा जीवन चुनौतियों से भरा हुआ था. मुझे खुद समझ में नहीं आता था, मेरे हाथ और पैर कहां हैं. मैंने चुनौतियों को अपनी कमजोरी कभी नहीं माना और निरंतर पढ़ाई करता रहा.'

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हिमांशु सोनी बोले- 'असफलता पर नहीं होना चाहिए निराश'

वो कहते हैं कि निरंतर मेहनत करनी चाहिए. असफलता मिलने पर निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि निराश होना, अपनी ही सफलता पर संदेह खड़ा करता है. महान विचारक ब्रूस ली ने कहा था, 'मुझे उस आदमी से डर नहीं लगता जो 10,000 किक एक-एक बार करता है, मुझे उससे डर लगता है जो एक ही किक 10,000 बार अभ्यास करता है.'

इसके पहले हिमांशु ने पीएससी परीक्षा 2022 में सफलता हासिल की थी और उनका चयन संचालक लोक शिक्षक पद पर हुआ था. लेकिन इस बार उनकी जीत केवल एक परीक्षा की नहीं, बल्कि कठिनाइयों पर जीत, हौसले की जीत और उन सभी दिव्यांगजनों के लिए प्रेरणा है जो जीवन से जूझते हुए भी सपनों को पूरा करना चाहते हैं.

आज हिमांशु सोनी की सफलता संदेश देती है—'अगर जज्बा सच्चा हो तो कठिनाइयां कितनी भी हों, मंजिल जरूर मिलती है.'

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