Action Against Corruption: सरकारें भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात करती हैं. मंचों से सख्त कार्रवाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश हुए आंकड़े एक असहज और चुभती हुई तस्वीर सामने रखते हैं. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधायक पंकज उपाध्याय और भंवर सिंह शेखावत के सवालों के लिखित जवाब में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ यानी ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त संगठन के जो आंकड़े रखे हैं, उन्होंने कार्रवाई, देरी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
सरकारी जवाब के मुताबिक वर्ष 2020 से 2025 के बीच ईओडब्ल्यू के 70 आपराधिक मामलों में फैसला हुआ. इनमें 40 मामलों में सजा हुई और 30 में आरोपी बरी हो गए. यानी 57 प्रतिशत दोष सिद्धि दर रही. पहली नजर में यह आंकड़ा मजबूत लगता है, लेकिन असली कहानी समय की है. इन 70 मामलों में औसतन फैसला आने में 13 साल और 7 महीने लगे. कुछ मामलों में तो न्याय आने में तीन दशक लग गए. 1990 का मामला 33 साल बाद निपटा. इसी तरह 1995 के एक मामले में फैसला 28 साल बाद, 1996 के मामले में 29 साल बाद और 1999 के मामले का 26 साल बाद आया. ऐसे में सवाल यह है कि तीन दशक बाद आई सजा क्या वास्तव में निवारक असर छोड़ पाती है या सिर्फ एक औपचारिक उपलब्धि बनकर रह जाती है.

57% सजा, 14% एफआईआर, 1% से भी कम दोषसिद्धि... मध्य प्रदेश की भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था का चौंकाने वाला सच
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2.8 प्रतिशत मामलों में ही एफआईआर
शिकायतों के आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं. वर्ष 2020 से जनवरी 2026 तक ईओडब्ल्यू को कुल 19775 शिकायतें मिलीं. यानी हर साल औसतन तीन हजार से ज्यादा शिकायतें. अकेले जनवरी 2026 में 437 शिकायतें दर्ज हुईं. लेकिन, करीब बीस हजार शिकायतों में से केवल 2624 यानी लगभग 14 प्रतिशत ही औपचारिक रूप से दर्ज की गईं, लेकिन सिर्फ 566 मामलों में ही अपराध पंजीबद्ध हुआ. यानी कुल शिकायतों के मात्र 2.8 प्रतिशत मामले में ही एफआईआर दर्ज की गई. दूसरे शब्दों में 97 प्रतिशत से ज्यादा शिकायतें एफआईआर तक नहीं पहुंचीं. कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय ने इसी प्रक्रिया पर सवाल उठाए. उन्होंने रतलाम की सौ करोड़ रुपये की सीवरेज योजना की शिकायत का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि शिकायतों को विभागों को भेजकर कार्रवाई टालना जवाबदेही को कमजोर करता है.
1063 दर्ज मामलों में से सिर्फ 7 में सजा
अगर ईओडब्ल्यू के आंकड़े भौंहें चढ़ाते हैं तो, लोकायुक्त के आंकड़े चिंता की घंटी बजाती हैं. वर्ष 2022-23 से अब तक लोकायुक्त को 1884 शिकायतें मिलीं और 1063 आपराधिक मामले दर्ज किए गए. 1592 जांच पूरी की गईं और इस समय 1379 अधिकारी और कर्मचारी जांच के दायरे में हैं. लेकिन असली सवाल दर्ज मामलों के बाद की स्थिति पर है. 1063 आपराधिक मामलों में से 393 की जांच पूरी हुई, लेकिन 134 मामले अब भी अभियोजन स्वीकृति का इंतजार कर रहे हैं. यह वही प्रशासनिक अनुमति है, जो अक्सर न्याय की रफ्तार को धीमा कर देती है. केवल 39 मामलों में ही प्रारंभिक अभियोजन कार्रवाई ही शुरू हुई, 208 मामलों में चालान पेश हुए और दोषसिद्धि सिर्फ 7 मामलों में हुई.
यानी गणित साफ है. 1063 दर्ज मामलों में 7 सजा. यानी लगभग 0.65 प्रतिशत दोषसिद्धि दर. अगर सिर्फ 208 चालान वाले मामलों के आधार पर देखें तो भी सजा की दर लगभग 3 प्रतिशत के आसपास बैठती है. सैकड़ों जांच, सैकड़ों चालान और सजा केवल सात में.
अदालतों में सजा के आंकड़े बेहद कम
लोकायुक्त ने 20.97 करोड़ रुपये की वसूली और 153 मामलों में विभागीय कार्रवाई की जानकारी भी दी है. 12 मामले आरोपी की मृत्यु या डिस्चार्ज के कारण बंद हुए. वसूली बताती है कि गड़बड़ी पकड़ी गई. विभागीय कार्रवाई संकेत देती है कि प्रशासन ने कुछ स्वीकार किया. लेकिन अदालतों में सजा के आंकड़े बेहद कम हैं.
लेटलतीफी में दम तोड़ते मामले
दोनों एजेंसियों के आंकड़े मिलकर एक तीखा विरोधाभास पेश करते हैं. ईओडब्ल्यू में 57 प्रतिशत दोषसिद्धि दर है, लेकिन फैसला आने में औसतन 13 साल 7 महीने लगते हैं. लोकायुक्त में भारी संख्या में जांच और मामले दर्ज हैं, लेकिन सजा की दर बेहद कम है और 134 मामले अब भी अभियोजन स्वीकृति के इंतजार में अटके हैं. इसका मतलब यह है कि शिकायत दर्ज करने से लेकर जांच और फिर सजा तक का सफर लंबा, जटिल और अनिश्चित है.
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आंकड़े यह साबित नहीं करते कि भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही. लेकिन वे यह जरूर दिखाते हैं कि आरोप से सजा तक की राह संकरी है, धीमी है और आम नागरिक के भरोसे की परीक्षा ले रही है.
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