विज्ञापन

बीजेपी का 'केवट' कार्ड: मध्य प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवारी पर निशाना उत्तर प्रदेश की 160 सीटों पर

बीजेपी ने मध्य प्रदेश मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को राज्यसभा उम्मीदवार बनाकर एक बड़ा राजनीतिक और सांस्कृतिक दांव खेला है. धार्मिक प्रतीकवाद और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को साधने की इस रणनीति का सीधा असर मध्य प्रदेश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की करीब 160 नदी-आधारित सीटों पर पड़ेगा, जहां 2027 में चुनाव होने हैं.

बीजेपी का 'केवट' कार्ड: मध्य प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवारी पर निशाना उत्तर प्रदेश की 160 सीटों पर

MP Rajya Sabha Election: रामायण में एक साधारण केवट की भूमिका भले ही छोटी थी, लेकिन हमारी सांस्कृतिक स्मृति में वह बहुत बड़ी है. वनवास के दौरान निषादराज ने भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण को गंगा पार कराई थी. यह घटना केवल सेवा की कहानी नहीं थी, बल्कि भक्ति, सम्मान और एक गहरे सामाजिक प्रतीक की कहानी बन गई थी. सदियों बाद, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) उसी सांस्कृतिक प्रतीक को अपनी आधुनिक राजनीति की नई पटकथा में बेहद चतुराई से इस्तेमाल करती दिख रही है. मध्य प्रदेश राज्य मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को मध्य प्रदेश से तीसरी राज्यसभा सीट के लिए उम्मीदवार बनाकर बीजेपी नेताओं ने इस नामांकन को भगवान राम और केवट के व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ना शुरू कर दिया है. अब यह राजनीतिक संदेश संकेतों में नहीं, बल्कि खुले शब्दों में जनता के बीच दिया जा रहा है.

'केवट लगाएगा बीजेपी की नाव पार'

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस फैसले पर कहा कि जिस तरह भगवान श्रीराम ने निषादराज को गले लगाकर सम्मान दिया था, उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बीजेपी ने ओरछा के जमीनी कार्यकर्ता महेश केवट को यह बड़ा अवसर दिया है. यादव ने यह भी दावा किया कि विधानसभा में पर्याप्त संख्याबल के आधार पर बीजेपी अपनी तीनों राज्यसभा सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज करेगी.वहीं, बीजेपी विधायक आशीष शर्मा ने इस प्रतीक को और आगे बढ़ाते हुए पूरे राजनीतिक मुकाबले को सीधे रामायण के संदर्भ में रख दिया. उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी अनुकूल हालात बनाना बीजेपी का पुराना काम है. शर्मा के शब्दों में, “जिस तरह केवट ने भगवान श्रीराम की नाव पार लगाई थी, उसी तरह यह केवट अब बीजेपी की नाव पार लगाएंगे.

भोपाल से लखनऊ तक गूंजेगा यह दांव

इन बयानों ने महेश केवट की उम्मीदवारी को एक बेहद बड़े राजनीतिक अर्थ से भर दिया है. सतह पर तो यह मध्य प्रदेश की एक राज्यसभा सीट का सामान्य नामांकन दिखता है, लेकिन इसके भीतर बीजेपी धार्मिक प्रतीकवाद, पिछड़ा वर्ग (OBC) पहुंच, बुंदेलखंडी पहचान और मध्य प्रदेश के साथ-साथ पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के लिए एक अचूक चुनावी संदेश का प्रभावी समीकरण तैयार करती दिख रही है. इस पूरी रणनीति में उत्तर प्रदेश का एंगल सबसे अहम माना जा रहा है.

बीजेपी ने भले ही महेश केवट को मध्य प्रदेश के कोटे से मैदान में उतारा हो, लेकिन एमपी और यूपी दोनों राज्यों के राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह दांव भोपाल की सीमाओं से कहीं आगे तक जाता है. माना जा रहा है कि बीजेपी इसके जरिए पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के बड़े केवट-निषाद-मल्लाह सामाजिक समूह को एक सधा हुआ संदेश देना चाहती है, जहां साल 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं.

यूपी का नदी-आधारित जातीय समीकरण और 160 सीटें

उत्तर प्रदेश कोई सामान्य पड़ोसी राज्य नहीं है. 403 विधानसभा सीटों वाला यह सूबा बीजेपी के लिए सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक युद्धक्षेत्र है. यहां का जातीय गणित पूरे हिंदी पट्टी की राजनीति की दिशा तय करता है. मध्य प्रदेश, खासकर बुंदेलखंड के इलाके से दिया गया कोई भी सामाजिक संकेत बहुत तेजी से यूपी की नदी किनारे बसी सीटों तक पहुंच जाता है.मछुआरों और नाविक समुदायों को अति पिछड़ा वर्ग (EBC) में गिना जाता है. उत्तर प्रदेश की करीब 150 से 160 नदी-आधारित विधानसभा सीटों पर इन समुदायों की उल्लेखनीय और निर्णायक मौजूदगी है. ये सीटें पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी के कुछ हिस्सों में फैली हुई हैं. नाविक और मछुआरा समुदाय से जुड़ी उपजातियां जैसे निषाद, केवट, मल्लाह, कश्यप और बिंद; गंगा, यमुना, गोमती और घाघरा जैसी प्रमुख नदियों के किनारे स्थित 60 से अधिक सीटों पर खास प्रभाव रखती हैं. करीबी चुनावी मुकाबलों में ये समुदाय ही जीत और हार के बीच का असली फर्क बनते हैं.

ओरछा के रामराजा दरबार से जुड़ाव

महेश केवट की उम्मीदवारी केवल जातीय पहचान पर ही आधारित नहीं है, बल्कि उनका धार्मिक और क्षेत्रीय प्रोफाइल बीजेपी को प्रतीकवाद की एक और मजबूत परत देता है. महेश केवट का परिवार दशकों से ओरछा स्थित 'हरदौल का बैठक' (हरदौल महल) से मुख्य पुजारी परिवार के रूप में जुड़ा रहा है. यह ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल पूरे बुंदेलखंड में गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है. वर्तमान में महेश के भाई मुकेश वहां पुजारी हैं, और उनकी अनुपस्थिति में महेश स्वयं भी पुजारी की भूमिका निभाते हैं. इस जुड़ाव ने महेश केवट और उनके परिवार को बुंदेलखंड में, खासकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के नाविक व मछुआरा समुदायों के बीच एक बड़ा सामाजिक सम्मान दिलाया है. यही बात उन्हें बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी चेहरा बनाती है, जिसके जरिए पार्टी हिंदुत्व के प्रतीक, पिछड़ा वर्ग की राजनीति और बुंदेलखंडी क्षेत्रीय गौरव को एक ही राजनीतिक संदेश में पिरो रही है.

बीजेपी की रणनीति के ये हैं तीन बड़े उद्देश्य

बीजेपी के लिए महेश केवट का यह नामांकन मुख्य रूप से तीन बड़े उद्देश्यों को साधता हुआ दिखाई देता है:

अति पिछड़ा वर्ग (EBC) पर पकड़: केवट, निषाद, धीमर, मल्लाह, बिंद और अन्य मछुआरा समुदाय भले ही हमेशा बड़े जातीय विमर्श की सुर्खियों में न दिखें, लेकिन कई सीटों पर ये चुपचाप चुनावी नतीजों को पलटने का माद्दा रखते हैं.

बुंदेलखंड पर विशेष फोकस: ओरछा से आने वाले नेता को चुनकर पार्टी मध्य प्रदेश में क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश कर रही है, और साथ ही उत्तर प्रदेश के सटे बुंदेलखंड बेल्ट (झांसी, जालौन, ललितपुर, बांदा, हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट) से भी सीधा संवाद कर रही है.

कार्यकर्ताओं को बड़ा संदेश: महेश केवट को एक ऐसे कार्यकर्ता के रूप में पेश किया जा रहा है, जो बूथ और स्थानीय निकाय स्तर से उठकर राज्यसभा की दौड़ तक पहुंचा है. यह बीजेपी के उस दावे को मजबूत करता है जहां वह खुद को संगठन और कार्यकर्ता आधारित पार्टी बताती है.

संघ का साथ और पार्षद से राज्यसभा चुनाव तक का सफर

महेश केवट की निजी जीवन यात्रा भी इस पूरी राजनीतिक कथा को मजबूती देती है. केवट समुदाय से आने वाले महेश केवट गणित विषय में स्नातक (Graduate) हैं. वे साल 1984 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े रहे हैं और 1995 से बीजेपी की सक्रिय राजनीति में काम कर रहे हैं. वे ओरछा नगर परिषद में पार्षद और उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं. बाद में उन्हें सूबे के मछुआ कल्याण बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया और राज्य मंत्री का दर्जा भी दिया गया.

अब कांग्रेस पर दबाव बनाने का सबसे बड़ा चेहरा

महेश केवट के इस राजनीतिक उभार में एक दिलचस्प मोड़ भी शामिल है. उन्हें कभी बीजेपी से निष्कासित भी किया गया था. उन पर आरोप था कि उन्होंने कुछ अन्य पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर निवाड़ी नगर परिषद अध्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर दिया था. हालांकि, बाद में उनका यह निष्कासन रद्द हुआ और वे फिर से बीजेपी में लौटे. घर वापसी के बाद उन्होंने संगठन में अपनी जगह बनाई, सरकारी पद पाया और अब वे राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार के रूप में सामने हैं. जो नेता कभी स्थानीय चुनाव में कांग्रेस की मदद करने के आरोप में पार्टी से बाहर हुआ था, वही अब कांग्रेस पर सबसे बड़ा राजनीतिक दबाव बनाने वाले बीजेपी के रणनीतिक उम्मीदवार बन चुके हैं.

मीनाक्षी नटराजन से मुकाबला और 2028 की तैयारी

इस समय राज्यसभा सीट पर महेश केवट का सीधा मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन से है. जो राज्यसभा चुनाव पहले अपेक्षाकृत सीधा और आसान दिख रहा था, वह अब राजनीतिक गणित, पार्टी अनुशासन और जातीय संदेश की कड़ी परीक्षा में बदल गया है. महेश केवट को मैदान में उतारकर बीजेपी ने इस मुकाबले में एक बड़ी अनिश्चितता ला दी है और कांग्रेस को अपने संख्याबल की कड़ी निगरानी करने के लिए मजबूर कर दिया है. लेकिन यह बड़ी कहानी एक राज्यसभा सीट से कहीं आगे जाती है. मध्य प्रदेश के लिए इस कदम को साल 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के रूप में पढ़ा जा रहा है, तो वहीं उत्तर प्रदेश के लिए यह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले का एक शुरुआती और बेहद सटीक सामाजिक संदेश है. रामायण के नदी किनारे से दिल्ली के राज्यसभा गलियारों तक, बीजेपी ने एक केवट को बेहद संवेदनशील राजनीतिक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है.
ये भी पढ़ें: कभी कांग्रेस के लिए क्रॉस वोटिंग करने पर पार्टी से निकाले गए थे, अब उसी से बीजेपी को जिताएंगे?
ये भी पढ़ें: एमपी राज्यसभा चुनाव: महेश केवट की एंट्री से बदला समीकरण, संख्या बल में आगे होकर भी अलर्ट मोड में कांग्रेस

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
MP Rajya Sabha Election 2026, Mp Rajya Sabha Chunav, Mahesh Kevat, Mp Politics News
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com