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महिला आरक्षण के साथ परिसीमन का दांव, क्या बदल जाएगा संसद का पूरा गणित? दक्षिण के राज्यों को डर कैसा

प्रस्तावित परिसीमन के तहत दक्षिण भारत की सीटें तो बढ़ेंगी पर उनका डर ये है कि ये उस अनुपात में नहीं बढ़ेंगी जैसे अभी हैं, जबकि केंद्र सरकार ने जो फॉर्मूला दिया है उसमें दक्षिण भारत के राज्यों में वर्तमान अनुपात में ही लोकसभा सीटें रहेंगी.

महिला आरक्षण के साथ परिसीमन का दांव, क्या बदल जाएगा संसद का पूरा गणित? दक्षिण के राज्यों को डर कैसा
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  • सरकार महिलाओं को 33% आरक्षण देने के लिए लोकसभा सीटें 816 तक बढ़ाना चाहती है.
  • सरकार का दावा है कि किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा और सभी की सीटें अनुपात में बढ़ेंगी.
  • परिसीमन पर सबसे बड़ी बहस- दक्षिण को मिलेगा फायदा या घटेगा असर.
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भारत की राजनीति में इस वक्त महिला आरक्षण और परिसीमन, दो ऐसे बड़े मुद्दे सबसे अधिक चर्चा में हैं जो मिलकर देश का पूरा सियासी गणित बदल सकते हैं. एक तरफ सरकार कह रही है कि यह महिलाओं को सशक्त बनाने का ऐतिहासिक कदम है. दूसरी तरफ विपक्ष इसे लोकतंत्र पर सीधा हमला बता रहा है. सरकार संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देना चाहती है. इसके लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम लाया गया है. लेकिन इस कानून को लागू करने के लिए सीटों की संख्या बढ़ानी होगी. अभी लोकसभा में 543 सीटें हैं. प्रस्ताव है कि इसे बढ़ाकर करीब 816 से अधिकतम 850 सीटों तक किया जाए, और यही काम होगा परिसीमन के जरिए.

परिसीमन क्यों बना बड़ा मुद्दा?

संविधान के मुताबिक परिसीमन यानी जनसंख्या के आधार पर लोकसभा की सीटों की सीमाएं तय की जाती हैं. सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर यह प्रक्रिया करना चाहती है. यहीं से विवाद शुरू होता है. दक्षिण भारत की जनसंख्या वृद्धि कम रही है उत्तर भारत में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है. इसलिए उन्हें डर है कि नई सीटों का फायदा उत्तर को ज्यादा मिलेगा.

हालांकि प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी राज्य के साथ कोई अन्याय नहीं होगा. उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम सभी के साथ बराबरी होगी. किसी राज्य की लोकसभा सीटों का अनुपात कम नहीं होगा. साथ ही उन्होंने यह भी कहा, “महिला आरक्षण का जो विरोध करेंगे, उन्हें लंबे समय तक राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी.”

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अमित शाह ने क्या आंकड़े दिए?

गृह मंत्री अमित शाह ने विस्तार से बताया कि दक्षिण भारत को नुकसान नहीं, बल्कि फायदा होगा. उनके मुताबिक पांच दक्षिणी राज्यों की कुल सीटें 129 से बढ़कर 195 हो सकती हैं. यानी करीब 50% की बढ़ोतरी. इस तरह लोकसभा में उनकी सीटों का प्रतिशत 23.76 से बढ़कर 23.87 हो जाएगा.

उन्होंने यह भी बताया कि सबसे अधिक तमिलनाडु की सीटें बढ़ेंगी. वहीं अभी 39 सीटें हैं. इसमें 20 सीटों का इजाफा होगा और इस तरह तमिलनाडु की कुल सीटें 39 से बढ़कर 59 हो जाएंगी. इसी तरह कर्नाटक की वर्तमान 28 से बढ़कर 42 सीटें हो जाएंगी. आंध्र प्रदेश में 25 से 38 सीटें. केरल में 20 से 30 सीटें. और तेलंगाना में 17 से 26 सीटें हो जाएंगी.

बता दें कि लोकसभा में उत्तर प्रदेश के बाद सबसे अधिक सीटें महाराष्ट्र की हैं. उसे भी 24 अतिरिक्त सीटें मिलेंगी.

सरकार का दावा है कि सीटें प्रो-राटा आधार पर बढ़ेंगी. यानी हर राज्य का हिस्सा उसी अनुपात में बढ़ेगा जितना वर्तमान में है.

प्रियंका गांधी

प्रियंका गांधी
Photo Credit: ANI

विपक्ष का हमला

विपक्ष इस पूरे प्लान पर गंभीर सवाल उठा रहा है. कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा, “सरकार पहले ही संस्थाओं पर दबाव डाल रही थी, अब लोकतंत्र पर खुला हमला हो रहा है.”उनका सवाल है कि 33% आरक्षण मौजूदा 543 सीटों पर ही क्यों नहीं दिया जा सकता?

वहीं अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि, “नारी को नारा बनाया जा रहा है. ” उन्होंने ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग भी उठाई.

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दक्षिण भारत की चिंता बरकरार

हालांकि केंद्र सरकार ने लोकसभा की सीटों के बढ़ाए जाने को लेकर स्थिति स्पष्ट की है पर तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों को अब भी डर है कि भले सीटें बढ़ें, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनका अनुपात घट सकता है और ज्यादा आबादी वाले राज्यों का प्रभाव बढ़ सकता है. एम के स्टालिन पहले ही इसे ऐतिहासिक अन्याय बता चुके हैं.

जानकारों के मुताबिक प्रो-राटा फॉर्मूला अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. 2011 की जनगणना के आधार पर फैसला विवादित है. ऐसे में महिलाओं के लिए सीटें तय करना भी आसान नहीं होगा. यानी तस्वीर अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है.

सरकार के इस आश्वासन के बावजूद कि कोई अन्याय नहीं होगा, विपक्ष लोकतंत्र के खतरे में होने की दुहाई दे रहा है. पर अंत में इस मुद्दे पर फैसला इन्हीं सांसदों को करना है.

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