- पश्चिम बंगाल में PM मोदी का झालमुड़ी खाने का वीडियो वायरल हुआ. 12 करोड़ से अधिक लोगों ने इसे देखा, शेयर किया.
- आखिर यह वीडियो वायरल क्यों हुआ? क्या है इसकी मूल वजह?
- इसके लिए PM मोदी की सोशल इंजीनियरिंग को समझना जरूरी है, जो वर्षों के अथक प्रयास से आज इस मुकाम पर पहुंची है.
बीते दो दिनों के दौरान बहुत संभव है कि आपने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वो वीडियो जरूर देखा होगा जिसमें वो सड़क किनारे एक दुकान से झालमुड़ी खरीदते और खाते दिख रहे हैं. पीएम मोदी का झालमुड़ी खरीदने और खाने का ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है. इसे 24 घंटे में 100 मिलियन से ज्यादा व्यूज मिले हैं और गूगल सर्च ट्रैफिक में 22 साल का रिकॉर्ड टूट गया. यह वीडियो 19 अप्रैल 2026 का है. पीएम पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार के दौरान उस दिन चार रैलियों को संबोधित कर रहे थे. उस दौरान पश्चिम बंगाल के झारग्राम में उन्होंने एक रणनीतिक ब्रेक लिया. यह चुनाव प्रचार और आमजनों से जुड़ने का उनका एक पुराना तरीका रहा है. यह हमेशा कारगर रहा है और इस बार भी वही हुआ. अब तक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 12 करोड़ से भी अधिक लोगों ने इसे देखा, लाइक और शेयर किया है. यह संख्या इतनी इसलिए भी अहम है कि पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु जैसे चुनावी राज्यों में वोटर्स की संख्या इससे कहीं कम है.
राजनीतिक आलोचना
बेशक, झालमुड़ी वाले वीडियो को लेकर पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने इसकी आलोचना की. ममता बनर्जी ने इसे ड्रामा बताया और साथ ही यह भी पूछीं कि अगर यह पहले से तय नहीं था तो वहां एक से भी अधिक कैमरे कैसे मौजूद थे.
राजनीतिक छींटाकशी अपनी जगह पर चुनाव प्रचार को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी और राजनीतिक शैली को गहराई से समझें, तो एक बात साफ दिखती है- उन्हें अलग-अलग राज्यों की संस्कृति, खानपान, समस्याओं, स्थानीय मुद्दों और सांस्कृतिक मान्यताओं की गहरी समझ है. झालमुड़ी बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखंड समते देश के कई अन्य हिस्सों में खाई जाती है. बंगाल में यह काफी लोकप्रिय स्ट्रीट फूड में आता है.
Delighted to experience the Bagurumba Dwhou programme in Guwahati. It beautifully reflects the vibrancy of the Bodo culture.
— Narendra Modi (@narendramodi) January 17, 2026
https://t.co/elJCFygk2d
स्थानीय लोगों से पीएम मोदी का जुड़ाव
पीएम मोदी अक्सर जिस राज्य में जाते हैं, वहां के स्थानीय खान-पान का आनंद लेते हैं. इससे वो जमीनी स्तर पर लोगों से जुड़ने की कोशिश के रूप में दिखाना चाहते हैं. केवल खान पान तक ही नहीं बल्कि उनके हर भाषण, बातचीत और लेखन में लगातार उस जगह से जुड़ाव का भरपूर प्रदर्शन होता है जहां के विषय में वो अपनी बातें रखते हैं. यही वजह है कि उनका संदेश हर राज्य में अलग रंग और अलग प्रभाव के साथ सामने आता है.
मोदी अपने हर चुनावी मुहिम के लिए एक रणनीति बनाते हैं, उसमें सबसे अहम होता है प्रचार कैसे और किन माध्यमों से करना है, उसमें क्या क्या चीजें होंगी जो आम जनता को खूब पसंद आएगी? इसका लक्ष्य होता है स्थानीय लोगों से मोदी का जुड़ाव. चाहे बिहार चुनाव का प्रचार हो या फिर असम में मोदी को वहां की स्थानीय भाषा में अपना भाषण शुरू करते देखने, सुनने की तो आदत से पड़ चुकी है. लेकिन उनके प्रचार शैली को समझना है तो गुजरात के दौर से ही इसे देखना होगा.

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पीएम मोदी की प्रचार शैली का सोशल कनेक्ट
यह घटना मोदी की चुनाव प्रचार शैली के एक जाने-पहचाने पैटर्न का ही हिस्सा है, जिसे उनकी जन-नेता वाली छवि गढ़ने और सीधे जनता से जुड़ने के लिए डिजाइन किया गया है- जो पारंपरिक चुनावी रैलियों में दिए जाने वाले भाषणों से बिल्कुल अलग है. पीएम मोदी विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिम बंगाल के झारग्राम में सड़क किनारे रुककर स्थानीय दुकानदार से झालमुड़ी खाई.
Murarai, West Bengal: Chief Minister Mamata Banerjee says, "They have fitted a microphone, jhalmuri prepared in a shop with the help of SPG. He doesn't have 10 rupees in his pocket. What a drama. During elections, he says, ‘I am a chaiwala,....Why was a camera already installed… pic.twitter.com/4fEAWNCjhX
— IANS (@ians_india) April 20, 2026
पीएम के सोशल मीडिया हैंडल से इस वीडियो को पोस्ट किया गया जिसे न केवल बड़ी संख्या में देखा जा रहा है बल्कि लाइक और साझा भी किया जा रहा है. अब तक इसे देखने वालों की संख्या लाखों में पहुंच गई है.
इसी तरह असम में जब वो चुनाव प्रचार के पहुंचे तो वहां के चाय बगानों में झूमूर नृत्य करती महिलाओं के बीच दिखे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 से ही सोशल मीडिया के माध्यम से चुनाव प्रचार की मिसाल कायम की है.
नैरेटिव गढ़ने के कई उदाहरण मौजूद
2014 के लोकसभा चुनाव में डिजिटल माध्यम के जरिए प्रचार किसे याद नहीं होगा. उसी चुनाव के दौरान बहुप्रचारित 'चाय पे चर्चा' जैसे मुहिम आयोजित किए गए थे. एक साधारण चाय के जरिए उन्होंने खुद को आम आदमी से जोड़ा. यह नैरेटिव उनकी व्यक्तिगत कहानी से भी जुड़ा था, जिससे लोगों को एक भावनात्मक कनेक्शन मिला. बताया गया कि उस चुनाव के लिए एक छोटी सी टीम ने 2010 से ही तैयारियां शुरू कर दी थीं, जिसमें सोशल मीडिया और मोबाइल फोन पर प्रचार करने की रणनीति बन चुकी थी.
सैटेलाइट, डीटीएच, इंटरनेट, स्मार्टफोन... हर नई तकनीक को प्रचार के माध्यम में अधिक से अधिक इस्तेमाल करने की कला के माहिर हैं. 2014 के चुनाव के दौरान ही जब एक तरफ अन्य दलों के नेता जगह जगह पहुंच कर प्रचार कर रहे थे, तो मोदी जनता तक पहुंचने के लिए थ्री डी होलोग्राफिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने में जुटे थे, ताकि कम समय में अधिक से अधिक रैलियों के जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकें. एक ओर देश के बाकी नेता बैनर-पोस्टर से प्रचार कर रहे थे, उसी दौरान नरेंद्र मोदी डिजिटल माध्यम को प्रचार के सबसे मजबूत हथियार के रूप में ढाल रहे थे.

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गुजरात के दौर से दिखता आया प्रचार का अनोखा तरीका
केवल 2014 की नहीं उसके पहले और बाद के समय में भी मोदी एक सकारात्मक सोच के साथ आधुनिक तकनीक और तरीकों के माध्यम से प्रचार करते रहे हैं. 2007 के गुजरात चुनाव के दौरान भी उन्होंने प्रचार का एक अनोखा तरीका निकाला था. तब पोस्टर के साथ ही 'मोदी मास्क' का आइडिया सुपरहिट हुआ था. मोदी इस मास्क के जरिए सुदूर इलाकों तक भी पहुंच गए जहां प्रचार के लिए स्वयं पहुंचना संभव नहीं हो सका. 2007 के चुनाव में मोदी ने विकास को केवल मुद्दा नहीं बल्कि ब्रांड बना दिया था. वाइब्रेंट गुजरात जैसे इवेंट्स चुनावी नैरेटिव बन गए थे. पहली बार किसी राज्य के चुनाव में विकास को इतनी आक्रामक ब्रांडिंग के साथ पेश किया गया.

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जब मोदी के थ्री डी अवतार की हुई चर्चा
ठीक पांच साल बाद हुए 2012 के विधानसभा चुनाव में सीएम मोदी का 'थ्री डी' अवतार आया. मोदी खुद का इंटरनेट टीवी भी लेकर आए पर तब चुनाव आयोग ने आपत्ति जताई और उसे बंद करना पड़ा. 2012 में जब ज्यादातर नेता सोशल मीडिया को गंभीरता से नहीं ले रहे थे, तब मोदी ने ट्विटर और फेसबुक पर अपनी मजबूत मौजूदगी बना ली थी.
उनके भाषणों के छोटे क्लिप वायरल होने लगे, जिससे वह सीधे युवाओं तक पहुंचने लगे.
इसी थ्रीडी के नए अवतार के रूप में मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान ऊधमपुर में लोगों को संबोधित किया था. मंच पर एक तरफ मोदी थ्रीडी अवतार में आते हैं फिर सबसे सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते हैं. कुछ देर बैठते हैं और फिर घंटे भर उनका भाषण चलता है. उस दिन मोदी ने देश भर में 100 जगह एक साथ थ्रीडी तकनीक की मदद से रैलियों को संबोधित किया था. भारतीय राजनीति में पहली बार इतने बड़े स्तर पर इस तकनीक के इस्तेमाल ने प्रचार की सीमाएं तोड़ दीं.
समय के अनुसार बदलता नैरेटिव
इसी थरह 2019 में प्रचार का फोकस सिर्फ विकास नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और मजबूत नेतृत्व पर शिफ्ट हुआ. बालाकोट जैसे घटनाक्रमों के बाद मोदी ने इस नैरेटिव को अपने पक्ष में मजबूती से इस्तेमाल किया. उनके भाषणों और डिजिटल कंटेंट में यह थीम लगातार दिखाई दी. ये वही समय था जब मैं भी चौकीदार कैंपेन सोशल मीडिया पर ट्रेंड बन गया. तब लाखों की तादाद में लोगों ने अपने नाम के आगे चौकीदार जोड़ लिया था.
जब कोविड के दौरान बिहार में चुनाव हुए तो मोदी ने वर्चुअल रैलियों का व्यापक इस्तेमाल किया. पर पारंपरिक रैलियां संभव नहीं थीं तो उन्होंने डिजिटल माध्यमों से जनता के बीच अपनी पहुंच बनाए रखी. समय के मुताबिक खुद को ढालना उनकी रणनीति रही है.
पीएम मोदी ने रेडियो जैसे पारंपरिक माध्यम को भी नए तरीके से इस्तेमाल किया. मन की बात के जरिए वह सीधे जनता से संवाद करते हैं. आज जब सोशल मीडिया चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है. तब शॉर्ट वीडियो और रील्स की रणनीति उनका सबसे बड़ा प्रचार हथियार बन गया है. आज के समय में उनकी टीम छोटे वीडियो, रील्स और क्लिप्स पर खास ध्यान देती है. वो रैलियों में खुद ही भीड़ के वीडियो बनाते दिखते हैं. ये कंटेंट जल्दी वायरल होते हैं और युवाओं तक तेजी से पहुंचते हैं. झालमुड़ी वाला वीडियो भी इसी ट्रेंड का हिस्सा है.
राज्यों के अनुसार शब्द और उदाहरण बदलने का कौशल
गुजरात के मुख्यमंत्री रहते 2007 और 2012 के चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव 2014, 2019 और 2025 के अलावा तमाम राज्यों के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान देश की सांस्कृतिक विविधता की गहरी समझ वाली उनकी मजबूत रणनीति दिखती है. उनके भाषणों में हर राज्य के हिसाब से शब्द, उदाहरण और मुद्दे बदलते हैं.
उदाहरण के तौर पर असम में पहचान, घुसपैठ, और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे मुद्दे बेहद संवेदनशील हैं. इसलिए उनके भाषणों में एक तरफ सड़क, ब्रिज, इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी की बात होती है, तो दूसरी तरफ असम की अस्मिता और स्थानीय लोगों के अधिकारों की चर्चा भी बराबर होती है.
টিএমসি সরকারের আমলে আলু চাষিরা বেঁচে থাকার জন্য লড়াই করছেন, আর অন্যদিকে বালি মাফিয়ারা টাকার পাহাড়ের ওপর বসে আছে। এটি কোনোভাবেই গ্রহণযোগ্য নয়! pic.twitter.com/mdb6wNNySs
— Narendra Modi (@narendramodi) April 19, 2026
जब पश्चिम बंगाल पहुंचते हैं तो यहां उनका नजरिया बदल जाता है. यहां संस्कृति, भाषा और बौद्धिक परंपरा का बड़ा महत्व है. मोदी अपने भाषणों में बंगाली शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों का जिक्र करते हैं और स्थानीय प्रतीकों को सम्मान देते हैं. साथ ही, वह परिवर्तन का नैरेटिव गढ़ते हैं, जो वहां की राजनीतिक स्थिति से मेल खाता है. इससे यह संदेश जाता है कि वह स्थानीय भावनाओं को समझने वाले व्यक्ति हैं.
वहीं उत्तर प्रदेश में जनसंख्या बड़ी है तो मुद्दे भी विभिन्न हैं- धर्म, विकास, कानून-व्यवस्था, रोजगार. उनके भाषणों में यहां बड़े विजन की बात होती है, जिसमें देश की राजनीति को दिशा देने की ताकत हो.
तमिलनाडु में उनकी भाषा और अधिक संतुलित हो जाती है. यहां की संस्कृति को वो आदर देते दिखते हैं. तमिल भाषा और संस्कृति की तारीफ, वहां की महान हस्तियों का जिक्र और राज्य के योगदान को स्वीकार करना, ये सब उनके भाषण का हिस्सा होता है. इससे वो क्षेत्रीय पहचान की गहरी समझ को दर्शाते हैं.
UDF and LDF have failed Kerala's youth. pic.twitter.com/Bt1aRYM6DG
— Narendra Modi (@narendramodi) January 23, 2026
जब केरल पहुंचते हैं तो वहां अधिक वैचारिक हो जाते हैं. वहां विकास बनाम विचारधारा की बहस को सामने रखते हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक मुद्दो पर बात करते हैं. तो जिस राज्य में जाते हैं वहां की राजनीतिक सोच के हिसाब से पीएम मोदी अपनी बात रखते हैं.
उनके भाषणों में कहानियां होती हैं, वो भी बेहद रोचक अंदाज में बताई जाती है. जैसे किसी योजना का जिक्र करते समय वो केवल सिर्फ संख्या नहीं बताते, ये बताते हैं कि अमुक गांव की किसी महिला या किसान की जिंदगी में उस योजना से कैसे बदलाव आया. खास कर जब यह कहानी उसी राज्य से जुड़ी होती है, तब उसका असर भी अधिक मारक होता है.
2014 में देश के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही वो टेक्नोलॉजी की गहरी समझ रखने वाले नेताओं में से थे. डिजिटल युग में उन्होंने इस समझ को और प्रभावी बना दिया है. अब उनके हर भाषण का क्लिप, हर बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर तुरंत पहुंच जाता है. इससे उनका एक स्थानीय सा लगने वाला मैसेज भी राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई देता है. साथ ही एक राज्य में कही गई बात दूसरे तक भी पहुंचती है, ऐसे में राष्ट्रीय नेता के रूप में उनकी छवि और भी मजबूत होती जाती है.
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