- AI कंपनियां यूजर्स चैट पर लाखों डॉलर का बिजली खर्च करती हैं. एक चैटबॉट क्वेरी करीब 2.9 वॉट/घंटे बिजली लेती है.
- टेक दिग्गज AI सिस्टम के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन और रेगुलेटर के पास 'किल स्विच' की मांग करते हैं.
- खुद निर्णय लेने वाले सिस्टम, गलत सूचना तेजी से फैलाने, साइबर सुरक्षा पर हमला करने जैसे तीन बड़े AI जोखिम हैं.
AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर लोग चैटबॉट से ऐसे बातें करते हैं जैसे किसी इंसान से कर रहे हों. लेकिन नई दिल्ली में आयोजित NDTV Ind.AI Summit में इस साधारण-सी लगने वाली आदत पर ये भी सोचने को मजबूर किया कि क्या AI से 'प्लीज' और 'थैंक्यू' कहना सही है? सवाल ये भी उठा कि AI अगर इंसानी नियंत्रण से बाहर गया तो कैसे इसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं. ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने बताया कि उनकी बेटियां चैटबॉट से बात करते समय हमेशा शिष्ट भाषा इस्तेमाल करती हैं.
सुनक बोले कि उन्होंने अपनी बेटियों को समझाया कि ऐसा करना जरूरी नहीं क्योंकि AI इंसान नहीं है और इससे कंप्यूटिंग खर्च भी बढ़ता है. फिर उन्होंने बताया कि उनकी बेटियां उनसे असहमत थीं और उनका जवाब था, "पापा, अगर AI ने कभी दुनिया पर कब्जा कर लिया तो इसे देखते हुए हम उसके प्रति विनम्र रहना चाहते हैं." सुनक ने मजाक में इसे एक बढ़िया बीमा पॉलिसी कहा.
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बिजली, लागत और शिष्टाचार का गणित
सुनक ने अपनी बेटियों को जो कंप्यूटिंग के खर्च वाली बात बताई वो ओपन एआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन भी पिछले साल सोशल मीडिया एक्स पर कह चुके हैं कि AI कंपनियां यूजर्स के चैट पर लाखों डॉलर का बिजली खर्च करती हैं. वजह साफ है- कंपनियों के ये AI सिस्टम बड़े-बड़े डेटा सेंटर पर चलते हैं, जिन्हें लगातार बिजली और कूलिंग चाहिए होता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक चैटबॉट क्वेरी लगभग 2.9 वॉट प्रति घंटे बिजली लेती है, जबकि सामान्य सर्च करीब 0.3 वॉट प्रति घंटे. यानी हर अतिरिक्त शब्द भी खर्च के पैमाने को बढ़ाता है.
ये भी पढ़ें: AI को सिर्फ पैसा नहीं, पावर भी चाहिए... सैम ऑल्टमैन ने एआई को लेकर क्या चेतावनी दी
क्या शिष्टाचार से जवाब बेहतर आते हैं?
तो फिर एक बार आते हैं उसी सवाल पर कि क्या AI के साथ शिष्टाचार से बात करनी चाहिए? गूगल डीपमाइंड के वैज्ञानिक मरे शैनहन ने 2022 में किए अपने एक शोध में बताया था कि विनम्र भाषा से AI बेहतर जवाब देता है, क्योंकि वो यूजर के टोन को मिरर करता है. माइक्रोसॉफ्ट वर्कलैब के डिजाइन मैनेजर कर्टिस बीवर्स ने भी कहा है कि सम्मानजनक भाषा से AI अधिक सहयोगी और प्रोफेशनल प्रतिक्रिया देता है. वो इसका तकनीकी पहलू ये बताते हैं कि AI पैटर्न की पहचान करता है, वो यूजर से उसकी बातचीत का लहजा सीखता है और उसी हिसाब से जवाब भी देता है.
AI का नियंत्रण किसके हाथ?
NDTV के AI समिट में कई दिग्गजों ने चेतावनी दी कि AI का विकास तेजी से हो रहा है और अगर नियंत्रण ढीला पड़ा तो परिणाम खतरनाक हो सकते हैं. AI एक्सपर्ट स्टुअर्ट रसेल कहते हैं कि भविष्य के AI सिस्टम खुद को कॉपी करने लगे तो वो इंसानी नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं. तकनीक बेकाबू न हो इसके लिए उन्होंने सुझाव दिया कि AI सिस्टम का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन हो, रेगुलेटर के पास 'किल स्विच' हो ताकि अनियंत्रित होने की किसी भी संभावना पर उसे पूरी तरह निरस्त किया जा सके. साथ ही उन्होंने इसकी तकनीकी निगरानी अनिवार्य करने पर विशेष बल दिया. इतना ही नहीं उन्होंने ये भी बताया कि ये तकनीकी निगरानी कोई आम तरीके से न हो और साफ लहजे में कहा कि यह उतना ही जरूरी है जितना परमाणु तकनीक में इसकी अनिवार्य जरूरत होती है.
‘एक्सटिंक्शन रिस्क' की चेतावनी
AI के तीन गॉडफादर्स में गिनती किए जाने वाले ज्योफ्री हिंटन ने पहले ही चेतावनी दे रखी है कि अगर सुपर-इंटेलिजेंट AI बनाया गया तो उससे करीब 10 से 20 फीसदी मानवता को खत्म करने की संभावना का खतरा हो सकता है. बता दें कि उन्हें 2024 में नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है. इसी तरह कनाडा के टेक दिग्गज और AI गॉडफादर में गिने जाने वाले योशुआ बेंगियो ने कहा कि टेक कंपनियां मुनाफे के चक्कर में सुरक्षा पर पर्याप्त निवेश नहीं कर रहीं. उनका कहना है कि अगर AI को सुरक्षित नहीं बनाया गया तो दुर्घटनाएं होंगी.

'रशियन रूले' को हिंदी फिल्म शोले के गब्बर ने भी अपने रिवॉल्वर से खेला था
'रशियन रूले' वाला विकास मॉडल
कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि बड़ी टेक कंपनियां प्रतिस्पर्धा में अपनी तेज दौड़ के लिए जोखिम को नजरअंदाज कर रही हैं. इस स्थिति को 19वीं शताब्दी में रूस की जेल से शुरू होने वाले 'रशियन रूले' जैसा बताया गया जिसे हिंदी फिल्म शोले के गब्बर ने भी अपने रिवॉल्वर से खेला था. इसमें पिस्टल में एक गोली रखते हुए उसे कनपटी पर रख कर ट्रिगर दबाया जाता है, गोली चली तो मौत का खतरा. कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि AI के क्षेत्र में रशियन रूले की तरह AI का प्रत्येक नया मॉडल लॉन्च करना संभावित खतरे को भी बढ़ा सकता है.
नौकरियों पर असर: सबसे बड़ा डर
AI के बढ़ते इस्तेमाल से नौकरी जाने का डर भी समिट का बड़ा मुद्दा रहा. अमेरिकी टेक दिग्गज एलेन मस्क पहले ही कह चुके हैं कि भविष्य में AI और रोबोट सारे काम कर सकते हैं, जिससे इंसानों की जरूरत कम हो सकती है. इसे लेकर जो चिंताएं हैं उनमें सबसे बड़ा यह है कि जैसे-जैसे कंपनियां ऑटोमेशन की ओर बढ़ेंगी हजारों, लाखों की तादाद में बाजार से नौकरियां खत्म हो सकती हैं. ऐसे में नए स्किल्स की जरूरत होगी. यानी कई पारंपरिक प्रोफेशन बदल जाएंगे. हालांकि कुछ जानकारों का मानना है कि AI नौकरियां खत्म नहीं करेगा बल्कि काम की प्रकृति को बदलेगा.
ये भी पढ़ें: AI नौकरियां खाएगा या फिर बढ़ाएगा? Google से लेकर OpenAI के CEO ने दिया जवाब
डेटा और प्राइवेसी का सवाल
समिट में डेटा सुरक्षा पर भी गंभीर चिंता जताई गई. AI की क्षमताएं अब सिर्फ डेटा एनालिसिस तक सीमित नहीं हैं, येह खुद कंटेंट बना सकते हैं. इससे कई संभावित खतरे हैं. बीते एक-डेढ़ साल के दौरान सबने देखा है कि कैसे डीपफेक और फर्जी खबरें जैसी घटनाएं बढ़ी हैं. जानकारों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मानक का बनाना जरूरी है, जो AI से बने कंटेंट की पहचान कर सके.

Photo Credit: AI Generated
‘नुकसानदेह AI' की आशंका
कुछ मामलों में AI सिस्टम ने टेस्ट के दौरान डेवलपर के खिलाफ बदला लेने जैसी हरकतें कीं. एक मामले में AI को बताया गया कि उसे बंद करने की सोच रहे हैं. उस AI के पास काल्पनिक कंपनी के कर्मचारियों का मेल एक्सेस था. उसे इंजीनियर की मेल से उसके एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर का पता चला, तो उसने उस इंजीनियर को धमकी दी कि वह अफेयर का खुलासा कर देगा. यही नहीं, टेस्ट के दौरान उसने इंजीनियर को मारने जैसे विकल्पों पर भी तर्क करना शुरू कर दिया. हालांकि AI ने इंजीनियर को मारने के बारे में केवल सोचा था. उसे धमकी नहीं दी थी. पर उसने न केवल ऑप्शन देखे थे बल्कि लॉजिस्टिक्स पर भी विचार किया था. ऐसे उदाहरणों ने 'नुकसानदेह AI' यानी AI के नियंत्रण से बाहर जाने की संभावनाओं को लेकर बहस तेज कर दी. हालांकि ये घटनाएं अभी शुरुआती और सीमित हैं, लेकिन जानकार मानते हैं कि जैसे-जैसे AI की क्षमता बढ़ेगी, जोखिम की संभावनाएं भी बलवती होंगी.

Photo Credit: NDTV
भरोसा बनाम डर
2025 के एक सर्वे के नतीजों के मुताबिक जेन-जी के 69% से ज्यादा लोग चैटबॉट से बात करते समय शिष्टाचार की भाषा इस्तेमाल करते हैं. इससे संकेत मिलता है कि लोग AI को सिर्फ मशीन नहीं बल्कि अपने संवाद का साथी भी मानने लगे हैं. ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक का मानना है कि यह भरोसे का संकेत है, लोग तकनीक पर विश्वास करने लगे हैं.
बच्चों का AI से जुड़ाव भावनात्मक हो सकता है क्योंकि इससे उनकी कौशल में सुधार आ सकता है, पर शोध के आधार पर यह भी आशंका जताई गई है कि इस पर अधिक निर्भरता उनके व्यवहार में बदलाव भी ला सकता है. एक शोध में पाया गया कि AI चैटबॉट बचपन और भावनाओं पर एक जैसी बातें करते हैं, जो थेरेपी के सवालों में इंसानी पैटर्न जैसे होते हैं.

Photo Credit: AFP File Photo
AI से डरें या इसे अपनाएं?
तो क्या AI से डरना चाहिए या फिर इसे आजमाना और अपनाना चाहिए? NDTV Ind.AI Summit के दौरान टेक लीडर्स ने इस पर संतुलित नजरिया अपनाने की सलाह दी. उनका कहना था कि AI से डरना नहीं चाहिए पर करीब-करीब सभी ने उसे लेकर नियम बनाने की वकालत की. सभी ने यह आशंका जताई कि बगैर नियम AI को छोड़ना खतरनाक हो सकता है.
यूसी बर्कले के प्रोफेसर स्टुअर्ट रसेल ने समिट में कहा AI के वर्ल्ड लीडर्स को तब एक बड़ा झटका लग सकता है जब चेर्नोबिल जैसा हादसा हो. बता दें कि चेर्नोबिल के परमाणु संयंत्र के एक रिएक्टर के फटने से 1986 में वहां रेडिएशन फैलने से बहुत बड़ा हादसा हुआ था जिसमें 31 लोगों की मौत हुई थी. हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमान के मुताबिक इस आपदा से 50 लोगों की मौत हुई.
प्रोफेसर स्टुअर्ट रसेल ने बताया, "कुछ सीईओ, करीब-करीब सभी बड़े सीईओ ने माना है कि यह मानव सभ्यता के लिए जोखिम भरा हो सकता है. वो अकेले में कहेंगे कि 'काश मैं इसे रोक पाता.' एन्थ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई ने इसे सबसे सामने कहा है."
जानकारों के मुताबिक खुद से निर्णय लेने वाले सिस्टम, गलत सूचना को तेजी से फैलाने और साइबर सुरक्षा पर हमला जैसे भविष्य के तीन बड़े जोखिम हैं. वो ये भी कहते हैं कि AI को लेकर टेक्नोलॉजी, सरकारी और सामाजिक स्तर पर काम करना आने वाले समय की मांग होगी जो इंसानों के AI से तालमेल पर निर्भर होंगे.
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