- हालिया आंदोलनों में बाबा साहेब अंबेडकर की तस्वीर प्रदर्शनकारियों के बीच प्रतीक के रूप में दिखाई देती है
- अंबेडकर की शिक्षाएं आज के डिजिटल युग के युवाओं को मुखर होकर संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती हैं
- आंदोलनकारी बाबा साहेब की तस्वीर लेकर यह संदेश देते हैं कि उनका संघर्ष संविधान के दायरे में है
जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ तो जंतर मंतर पर जश्न मनने लगा. प्रदर्शनकारियों ने CJP फाउंडर अभिजीत दीपके को कंधे पर उठा लिया. लेकिन उनसे भी ऊपर एक तस्वीर उठी वो तस्वीर थी बाबा साहेब अबंडेकर की तस्वीर. और नारे लगे- जय, जय जय भीम. हाल फिलहाल में जब भी कोई बड़ा आंदोलन हुआ, एक शख्सियत आंदोलनकारियों की रहनुमाई करने के लिए जरूर मौजूद होते हैं-वो हैं बाबा साहेब अंबेडकर.

विरोध के प्रतीक अंबेडकर
हाल फिलहाल के तमाम बड़े आंदोलनों को याद कीजिए. एक तस्वीर आपको जरूर याद आएगी. प्रदर्शनकारियों के हाथों में बाबा साहेब की तस्वीर. चाहे वो किसान आंदोलन हो या फिर नागरिकता को लेकर हुआ आंदोलन. हर बार बाबा साहेब प्रदर्शनकारियों को राह दिखाते नजर आते हैं. दरअसल जैसे जैसे वक्त बीत रहा अंबेडकर और प्रांसगिक बन गए हैं. भारत के आधुनिक इतिहास में कई जुझारू नेता हुए. लेकिन आज के युवाओं को शायद बाबा साहेब का तरीका ज्यादा करीब लगता है. अपनी आवाज खुलकर उठाओ और मुखर हो जाओ. आज के डिजिटल युग के युवाओं को अंबेडकर ज्यादा सीधे तौर पर प्रेरित करते हैं. उनका नारा 'शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो', युवाओं को ज्यादा अपील करता है.

किसान आंदोलन के दौरान भी खूब दिखे थे अंबेडकर
बाबा साहेब संविधान निर्माता थे. तो सड़क पर उतरने वाले जब उनकी तस्वीर अपनी हाथों में लेते हैं तो ये संदेश भी होता है कि हम आंदोलन तो कर रहे हैं लेकिन संविधान के दायरे में रहकर. लंबे समय तक इस देश में आंदोलन का मतलब महात्मा गांधी रहा. लेकिन लगभग सभी सरकारों ने महात्मा गांधी को अपनी योजनाओं, नीतियों और कार्यक्रमों का प्रतीक बनाया है. ऐसे में आंदोलन करने वाले शायद सरकारी प्रतीक चिन्ह को अपना प्रतीक नहीं बनाना चाहते. प्रदर्शन करने वालों को ऐसे में एक ऐसे प्रतीक की तलाश होती है जो व्यवस्था को चुनौती देता हो. और अक्सर ये तलाश बाबा साहेब अंबेडकर पर आकर रुकती है.

बाबा साहेब का पर्सनल संघर्ष
बाबा साहेब अंबेडकर ने बचपन से लेकर जवानी तक भेदभाव को खुद की जिंदगी में झेला. बचपन में उन्हें अलग बोरी पर बिठाया जाता. अछूत होने के कारण उन्हें पानी भी ऊपर से गिरा दिया जाता था. इतनी गरीबी और संघर्ष के बाद जब पढ़ लिखकर अफसर बने तो भी भेदभाव बंद नहीं हुआ. गरीबी और भेदभाव के कारण उनका अपना परिवार बिखर गया. इन पर्सनल संघर्षों को उन्होंने समाज का संघर्ष बनाया और अपने जैसे करोड़ों शोषितों को इंसाफ दिलाया. जिस तालाब से पशुओं को तो पानी पीने की इजाजत थी लेकिन दलितों को नहीं. इसके खिलाफ उन्होंने महाड़ सत्याग्रह किया और सदियों पुरानी बेड़ियों को तोड़ डाला. मंदिरों में दलितों को नहीं आने देते थे, लिहाजा मनुस्मृति जलाई और कालाराम मंदिर आंदोलन किया.

आज के राजनीतिक दल भी जानते हैं कि आज अगर कोई एक शख्स सबसे ज्यादा प्रासंगिक है तो वो हैं अंबेडकर. इसलिए पक्ष से लेकर विपक्ष तक नेता अंबेडकर की पूजा के लिए कतारों में खड़े नजर आते हैं. अफसोस ये है कि अंबेडकर का ये सम्मान आडंबर ज्यादा दिखता है और असलियत कम. क्योंकि अंबेडकर की चाह और आज के नेताओं की राह अलग है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं