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कौन थीं अरुणा शॉनबाग, 42 साल अस्पताल के बेड पर 'जिंदा लाश' बनकर रहीं, हरीश राणा के इच्छामृत्यु केस से फिर सुर्खियों में आईं

Passive Euthanasia in India: गाजियाबाद के हरीश राणा को इच्छामृत्यु की इजाजत मिलने के बाद अरुणा शॉनबाग का केस फिर सुर्खियों में आ गया है. वो 42 साल तक जिंदगी और मौत के बीच झूलती रहीं और असहनीय दर्द झेला.

कौन थीं अरुणा शॉनबाग, 42 साल अस्पताल के बेड पर 'जिंदा लाश' बनकर रहीं, हरीश राणा के इच्छामृत्यु केस से फिर सुर्खियों में आईं
Aruna Shanbaug passive euthanasia Case
नई दिल्ली:

गाजियाबाद के हरीश राणा को इच्छामृत्यु की इजाजत के बीच नर्स अरुणा शॉनबाग का मामला भी सुर्खियों में आ गया है. अरुणा शॉनबाग मुंबई के केईएम (KEM) अस्पताल में एक नर्स के तौर काम करती थीं. 27 नवंबर 1973 की रात को अरुणा शॉनबाग के साथ ऐसी घटना घटी, जिसके बाद वो 42 सालों तक बेड पर एक जिंदा लाश की तरह पड़ी रही. खाना-पीना से लेकर हर चीज के लिए वो दूसरों की मोहताज हो गई. खबरों के मुताबिक, उसी अस्पताल का एक वार्ड बॉय सोहनलाल वाल्मीकि अरुणा से नाराज था. अरुणा ने लापरवाही को लेकर उसे टोका था. उस रात जब अरुणा अपनी ड्यूटी खत्म कर कपड़े बदल रही थीं तो सोहनलाल ने उन पर हमला किया. उसने अरुणा का गला कुत्ते बांधने वाली लोहे की चेन से कस दिया और उनके साथ बर्बरता की.

शरीर तो जिंदा, लेकिन चेतना खत्म

गले में चेन कस जाने के कारण उनके मस्तिष्क तक ऑक्सीजन सप्लाई रुक गई. अगले दिन जब अरुणा शॉनबाग को खोजा गया तो वो जिंदा तो थी, लेकिन उनका दिमाग पूरी तरह डैमेज हो चुका था. वह पर्मानेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) यानी ऐसी हालत में चली गईं, जहां शरीर तो जिंदा रहता है लेकिन चेतना खत्म हो जाती है. गाजियाबाद के हरीश राणा के इच्छामृत्यु केस के पहले ये बड़ा मामला था.

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सुप्रीम कोर्ट और इच्छामृत्यु का मामला

क्रूरता की शिकार अरुणा शॉनबाग 37 सालों तक अस्पताल के बिस्तर पर बेसुध पड़ी रहीं. अरुणा शॉनबाग की देखभाल उनके परिवार ने नहीं, बल्कि केईएम अस्पताल की नर्सों ने अपनी बहन मानकर की. ये इंसानियत की एक मिसाल थी. जिस अस्पताल में एक वॉर्ड ब्वॉय ने उसे मौत के मुहाने पर लाकर छोड़ दिया, उसी ने अरुणा को जिंदा रखने के लिए पूरी ताकत झोंक दी. 

पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता पिंकी विरानी ने 2009 मेंसुप्रीम कोर्ट में अरुणा के लिए इच्छामृत्यु की याचिका दाखिल की. विरानी का तर्क था कि अरुणा पिछले 30-35 सालों से एक लाश की तरह जी रही हैं और उन्हें इस दर्द से मुक्ति दी जानी चाहिए.

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अरुणा शॉनबाग की देखभाल कर रहीं नर्सों का विरोध

विरानी की याचिका के विरोध में केईएम अस्पताल की नर्सें आईं. उनका कहना था कि अरुणा हमारी अपनी है, हम उनकी अच्छे से देखभाल कर रहे हैं. किसी को उन्हें मारने का अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में लंबी बहस चली. 

इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 7 मार्च 2011 को अरुणा शॉनबाग की इच्छामृत्यु की याचिका को खारिज कर दिया क्योंकि वह 'डेड' नहीं थीं. वो भोजन ले रही थीं और कभी-कभी प्रतिक्रिया भी देती थीं. अदालत ने अरुणा की देखभाल कर रहीं नर्सों और उनकी चिकित्सा सलाह को महत्वपूर्ण माना. 

कोर्ट ने अरुणा शॉनबाग के लिए दायर ये अर्जी खारिज कर दी. इसी केस के बहाने भारत में पैसिव यूथेनेशिया' (Passive Euthanasia) यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दे दी. यानी अगर कोई मरीज लाइलाज स्थिति में है, तो कोर्ट की अनुमति से उसका लाइफ सपोर्ट (वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) हटाया जा सकता है.

अरुणा शॉनबाग की मौत कैसे हुई?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी अरुणा शॉनबाग करीब 4 साल तक केईएम अस्पताल के वार्ड नंबर 4 के उसी कमरे में रहीं. उन्हें निमोनिया (Pneumonia) हो गया. 18 मई 2015 को उम्र बढ़ने के साथ उनका शरीर कमजोर हो चुका था. उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन 42 साल के लंबे संघर्ष के बाद उन्होंने अंतिम सांस ली. अस्पताल की नर्सों ने भावुक होकर उन्हें अंतिम विदाई दी. उनका अंतिम संस्कार भी केईएम अस्पताल के स्टाफ ने किया था.

42 साल का असहनीय दर्द

अरुणा शॉनबाग पर जानलेवा हमले का दोषी सोहनलाल सिर्फ 7 साल की सजा के बाद जेल से बाहर आ गया था. उस पर बलात्कार (Rape) का केस नहीं बल्कि सिर्फ हत्या के प्रयास और चोरी का केस चला था. लेकिन अरुणा ने 42 साल तक उस असहनीय दर्द को झेला. अरुणा शॉनबाग आज भी भारत में सम्मान के साथ मरने का अधिकार (Right to Die With Dignity) का प्रतीक मानी जाती हैं.

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