- पुणे में सिया गोयल ने अपने मंगेतर केतन अग्रवाल को ट्रेकिंग के बहाने गहरी खाई में धकेलकर हत्या की थी
- NCERB के आंकड़ों के अनुसार भारत में हर साल करीब 1400 से अधिक प्रेम संबंधों के कारण हत्याएं होती हैं
- इंटरनेशनल रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं द्वारा की गई आधी हत्याएं पूर्व योजना के तहत होती हैं
कहते हैं कि दुनिया में हर रिश्ता किसी न किसी उम्मीद या भरोसे की बुनियाद पर टिकता है, लेकिन जब वही बुनियाद मौत का कुआं बन जाए, तो समाज के रोंगटे खड़े होना लाजिमी है. पुणे में हुई हालिया सनसनीखेज वारदात ने एक बार फिर देश को हिलाकर रख दिया है, जहां 20 साल की सिया गोयल ने अपने 26 साल के मंगेतर केतन अग्रवाल को बेहद शातिर तरीके से मौत के घाट उतार दिया. सिया केतन को ट्रेकिंग के बहाने एक सुनसान पहाड़ी पर ले गई और सही मौका देखकर उसे गहरी खाई में धकेल दिया. शुरुआत में इसे महज एक 'हादसा' दिखाने की कोशिश की गई, लेकिन जब पुलिस ने कड़ियां जोड़ीं, तो सच सामने आया.
मेरठ की मुस्कान से इंदौर की सोनम तक
यह कोई पहली या इकलौती घटना नहीं है जो हमें हैरान कर रही है. अगर हम हालिया अतीत के पन्नों को पलटें, तो ऐसे ही कई और डरावने मामले सामने आते हैं. कुछ समय पहले ऐसा ही एक मामला सामने आया था जब राजा रघुवंशी और सोनम का नाम सुर्खियों में था, जहां हनीमून जैसी खूबसूरत शुरुआत का अंत बेहद खौफनाक मर्डर से हुआ. उससे भी पहले, मेरठ का वो बदनाम 'नीला ड्रम' वाला मामला भला कौन भूल सकता है? उसमें एक पत्नी (मुस्कान) ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर न केवल अपने पति सौरभ की हत्या की, बल्कि क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए उसके शव को टुकड़ों में काट दिया. पकड़े जाने के डर से उन टुकड़ों को एक नीले प्लास्टिक के ड्रम में डालकर ऊपर से सीमेंट भर दिया, ताकि कोई सबूत न बचे और लाश हमेशा के लिए कंक्रीट का हिस्सा बन जाए. ये तमाम वारदातें केवल अपराध की कहानियां नहीं हैं, बल्कि ये हमारे समाज के भीतर पनप रही एक गहरी और खौफनाक 'साइकोपैथी' का सबूत हैं.
प्यार में कत्ल: भारत में क्या कहते हैं NCRB के आंकड़े?
अक्सर ऐसी घटनाओं को देखकर लोग सोचते हैं कि यह किसी विक्षिप्त दिमाग का काम है और समाज में ऐसा कभी-कभार ही होता है. लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े इस मुगालते को पूरी तरह दूर कर देते हैं. अगर हम पिछले पांच सालों के आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो भारत में 'अफेयर्स' या प्रेम संबंधों के कारण होने वाली हत्याओं का ग्राफ बेहद डरावना और स्थिर है.
- साल 2020: 1,443 हत्याएं
- साल 2021: 1,566 हत्याएं
- साल 2022: 1,401 हत्याएं
- साल 2023: 1,441 हत्याएं
- साल 2024: 1,391 हत्याएं
1,400 से ज्यादा लोग करीबी या पार्टनर के हाथों मारे जा रहे
ये आंकड़े गवाही देते हैं कि भारत में हर साल औसतन 1,400 से ज्यादा लोग अपने ही किसी बेहद करीबी या पार्टनर के हाथों जान गंवा रहे हैं. यह संख्या यह सोचने पर मजबूर करती है कि जिसे हम 'लव' या 'कमिटमेंट' का नाम देते हैं, वह कितनी आसानी से 'कोल्ड-ब्लडेड' मर्डर की प्लानिंग में बदल जाता है.

इस क्रूरता के पीछे का मनोविज्ञान जानें
ऑस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी (AIC) का बड़ा खुलासा हुआ है कि इस प्रकार के अपराधों के पीछे अपराधियों की क्या मानसिकता होती है? क्या वे यह सब किसी तात्कालिक गुस्से में करते हैं? आम तौर पर सामाजिक धारणा यह रही है कि हिंसक और क्रूर अपराध मुख्य रूप से पुरुष करते हैं, और महिलाएं केवल तभी हिंसक होती हैं जब वे किसी अत्यधिक घरेलू प्रताड़ना का शिकार होती हैं. लेकिन ऑस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी (AIC) की विस्तृत रिसर्च रिपोर्ट "Female perpetrated intimate partner homicide" इस पारंपरिक सोच और सामाजिक मिथक को पूरी तरह से खारिज करती है. इस वैश्विक अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष इन तीनों भारतीय मामलों (सिया गोयल, सोनम और मुस्कान) के पूरे 'मोडस ऑपेरंडी' (कार्यप्रणाली) को परत-दर-परत खोलते हैं.
ठंडे दिमाग से रची गई सोची-समझी साजिश
AIC की रिपोर्ट में यह बेहद चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि महिलाओं द्वारा अपने पार्टनर की हत्या करने के लगभग आधे मामले (48 प्रतिशत) अचानक या आवेश में आकर नहीं किए जाते.ये पूरी तरह से 'प्री-मेडिटेटेड' यानी ठंडे दिमाग से महीनों पहले प्लान किए गए मर्डर होते हैं. पुणे की सिया गोयल का मामला इसका सटीक उदाहरण है. मंगेतर को ट्रेकिंग के बहाने एक ऐसी जगह ले जाना जहां कोई गवाह न हो और फिर उसे दुर्घटना का रूप देने की कोशिश करना, यह साफ तौर पर एक सोची-समझी क्रिमिनल प्लानिंग का हिस्सा था.

शारीरिक ताकत के बजाय धोखे और सह-आरोपियों का सहारा
चूंकि पुरुषों की तुलना में महिलाओं की शारीरिक बनावट अलग होती है, इसलिए इस स्टडी के मुताबिक, महिलाएं सीधे शारीरिक टकराव या बल प्रयोग से बचती हैं. वे इसके बजाय दो तरीके अपनाती हैं. या तो वे पार्टनर पर तब हमला करती हैं जब वह सो रहा हो या बेखबर हो, या फिर वे इस कत्ल की साजिश में किसी तीसरे व्यक्ति, यानी अपने प्रेमी को शामिल कर लेती हैं. मेरठ का 'नीला ड्रम केस' क्रिमिनोलॉजी की इस थ्योरी को पूरी तरह चरितार्थ करता है, जहां पत्नी मुस्कान ने खुद सीधे उलझने के बजाय अपने प्रेमी को साथ मिलाया, पति की हत्या की और फिर लाश को ठिकाने लगाने के लिए कंक्रीट का सहारा लिया.
ईर्ष्या, बेवफाई और पुरानी रिलेशनशिप को छुपाने की चाहत
रिपोर्ट बताती है कि इन हत्याओं के पीछे सबसे बड़े ट्रिगर या मोटिव पार्टनर की बेवफाई, ईर्ष्या या अपनी किसी सीक्रेट लाइफ को छुपाने की चाहत होती है. जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसका मौजूदा मंगेतर या पति उसकी नई जिंदगी या आजादी के रास्ते की रुकावट बन रहा है, तो वह अलग होने (तलाक या ब्रेकअप) का कानूनी और लंबा रास्ता चुनने के बजाय उसे हमेशा के लिए रास्ते से हटा देना ज्यादा 'आसान' शॉर्टकट समझता है.
नशे और मानसिक अस्थिरता का जानलेवा कॉकटेल
AIC की रिसर्च इस बात पर भी विशेष जोर देती है कि इस तरह की खौफनाक वारदातों को अंजाम देने से ठीक पहले के 24 घंटों में 68 प्रतिशत महिला अपराधियों ने भारी मात्रा में अल्कोहल (शराब) का सेवन किया था, जबकि लगभग 19 प्रतिशत ने अन्य नशीले पदार्थों का इस्तेमाल किया था.
इसके अलावा, करीब 42 प्रतिशत आरोपी महिलाएं पहले से ही किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से ग्रसित पाई गईं. भारत के मामलों में भी यह देखा गया है कि हत्या करने या लाश के टुकड़े करने जैसी क्रूरता के दौरान अपराधी अक्सर किसी न किसी प्रकार के नशे या गहरे मानसिक अवसाद/अस्थिरता की स्थिति में होते हैं.
समाज के टूटते ताने-बाने की गंभीर चेतावनी
चाहे वह मेरठ के नीले ड्रम की सीमेंट में दफन चीखें हों, पुणे की खाई में गिरते केतन की आखिरी पुकार हो, या पहाड़ों में हनीमून पर मिटा दिया गया सुहाग हो. ये घटनाएं केवल पुलिस फाइलों के केस नंबर नहीं हैं. ये आज के समाज की उस कड़वी हकीकत का आईना हैं जहां मानवीय संवेदनाएं और 'सहानुभूति' (Empathy) पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं. आज के 'इंस्टाग्राम और रील्स' के दौर में जहां शादियां और सगाइयां बाहर से जितनी परफेक्ट दिखती हैं, उनके पीछे का सच कई बार उतना ही खोखला होता है.
हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहां रिश्तों में धैर्य की भारी कमी है. साथी को एक इंसान समझने के बजाय एक 'ऑब्जेक्ट' मान लिया गया है, जिसे अपनी सहूलियत के हिसाब से बदला या मिटाया जा सकता है. जब तक समाज में नैतिक मूल्यों, आपसी संवाद और किसी गलत रिश्ते से सम्मानजनक तरीके से बाहर निकलने (तलाक या अलगाव) की सामाजिक स्वीकार्यता को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा, तब तक भारत का NCRB हो या ऑस्ट्रेलिया की AIC, ये खौफनाक आंकड़े हर साल हमारे अखबारों के पन्नों को यूं ही लाल करते रहेंगे.
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