- पश्चिम बंगाल की राजनीति अत्यंत जटिल है और यहां चुनाव परिणाम का अनुमान लगाना भी सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण है
- एक्सिस माय इंडिया के छह सर्वेक्षकों को केवल मतदाताओं से पसंद पूछने के कारण 24 दिन जेल में बिताने पड़े
- इस बार पश्चिम बंगाल में लगभग साठ प्रतिशत मतदाता अपनी मतदान पसंद छुपा रहे हैं, जो अन्य राज्यों से बहुत अधिक है
पश्चिम बंगाल किसका होगा? इसका जवाब उतना ही कठिन है जितना शायद UPSC का एग्जाम निकालना. ऐसा इसलिए भी क्योंकि देश का यही एकमात्र राज्य है,जहां ऊंट किस करवट बैठेगा बताना मुश्किल है. कई राजनीतिक पंडित भी यहां अनुमान लगाने से बचते हैं क्योंकि यहां की राजनीति जितनी सरल दिखती है,उतनी होती नहीं है. पहले चरण का मतदान हो चुका है तो दूसरे चरण के लिए अभी तीन दिन बाकी(29th April Voting Day) हैं, इस बीच एनडीटीवी ने 'एक्सिस माय इंडिया' के चेयरमैन प्रदीप गुप्ता से खास बातचीत की है. एडिटर इन चीफ राहुल कंवल से हुई इस बातचीत में प्रदीप गुप्ता भी खुलकर नहीं बता पाए कि इस बार पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार बनेगी. पेश हैं उनसे बातचीत के खास अंश...
6 सर्वेक्षकों ने 24 दिन जेल में बिताए
एनडीटीवी के एडिटर इन चीफ राहुल कंवल से खास बातचीत के दौरान प्रदीप गुप्ता ने बताया कि हमारे छह सर्वेक्षकों (surveyors) को पश्चिम बंगाल में 24 दिन जेल में बिताने पड़े. उनका कसूर बस इतना था कि वे मतदाताओं से उनकी पसंद पूछ रहे थे, लेकिन पुलिस ने आरोप लगाया कि इससे मतदाता सूची(Voters List) से नाम कट सकते हैं.प्रदीप गुप्ता ने बताया कि इससे पता चलता है कि पश्चिम बंगाल भारत के बाकी हिस्सों की तुलना में इतना अलग और कठिन क्यों है.
'पूरे दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता...'
साल 2013 से अब तक 81 चुनावों में से 74 बार बिल्कुल सही अनुमान लगाने वाले एक्सिस माय इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर प्रदीप गुप्ता का कहना है कि उनकी टीम को जमीन पर जो अनुभव मिले, उससे यह साफ है कि बंगाल शायद इकलौता ऐसा राज्य है जहां बड़े से बड़ा माहिर चुनाव विश्लेषक भी पूरी तरह दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता.
किसकी सरकार बनेगी, पूछने पर चुप्पी साध गए लोग
प्रदीप गुप्ता ने कहा, "जब हमने 10 लोगों से बात की, तो उनमें से केवल दो या तीन ही यह बताने को तैयार थे कि उन्होंने किसे वोट दिया है." उन्होंने आगे बताया कि जिन 60 प्रतिशत लोगों ने चुप्पी साधे रखी, उनमें किस पार्टी का पलड़ा भारी है या किसका कम, यह अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल काम है.गुप्ता के अनुसार, देश के ज्यादातर हिस्सों में अपनी पसंद न बताने वाले मतदाताओं की संख्या लगभग 10 प्रतिशत होती है.गुजरात में यह 20 प्रतिशत और उत्तर-पूर्व में 15 से 20 प्रतिशत तक हो सकती है, लेकिन बंगाल में इस बार के सर्वे में यह आंकड़ा 60 प्रतिशत को पार कर गया है. यह 2016 के विधानसभा चुनाव की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा है, जब केवल 20 से 30 प्रतिशत लोग ही चुप रहते थे.

उन्होंने बताया कि इस चुप्पी के पीछे डर और SIR का खौफ है.बंगाल की राजनीति में डर का माहौल तो दशकों से रहा है, लेकिन नया कारण मतदाता सूची का 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) है. इसकी वजह से चुनाव से पहले बड़ी संख्या में लोगों के नाम काट दिए गए, जिसने जनता के मन में एक नई घबराहट पैदा कर दी है.
एक खास तरह का डर
प्रदीप गुप्ता ने कहा, "लोगों को लगता है कि वे हमें नहीं जानते और न ही यह जानते हैं कि हम क्या पूछना चाह रहे हैं. उन्हें डर है कि अगर उन्होंने किसी खास पार्टी का नाम लिया, तो उनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया जाएगा. तो यह एक अलग तरह का डर है." दिलचस्प बात यह है कि यही वह डर था कि मतदान की पसंद बताने से नाम कट सकते हैं,जिसे आधार बनाकर पुलिस ने प्रदीप गुप्ता के सर्वेक्षकों पर कार्रवाई की थी.
पहले चरण में भारी-भरकम 93 प्रतिशत मतदान होने पर गुप्ता ने समझाया कि अगर नामों को हटाकर वोटर लिस्ट में लगभग 10 से 11 प्रतिशत की कटौती की गई, तो कुल मतदाताओं की संख्या कम हो गई.अगर साल 2016 (जब मतदान 82-83 प्रतिशत था) जितने ही लोग इस बार भी वोट देने निकले, तो कम आधार होने की वजह से वही संख्या अब प्रतिशत में कहीं ज्यादा दिखेगी.उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, "अगर आप वोट देने वाले 84 लोगों को कुल 90 मतदाताओं से भाग देंगे, तो आपको कुल मतदान 92 प्रतिशत से भी ज्यादा दिखाई देगा."

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