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ममता बनर्जी की बड़ी हार में मुसलमान वोट का बड़ा रोल, समझिए कांग्रेस, ओवैसी और हुमायूं ने कैसे किया TMC का डिब्बा गोल

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी TMC को करारी हार का सामना करना पड़ा है. इस चुनाव में ममता बनर्जी को मुस्लिम वोट बैंक का भी कम साथ मिल पाया. समझिए कैसे

ममता बनर्जी की बड़ी हार में मुसलमान वोट का बड़ा रोल, समझिए कांग्रेस, ओवैसी और हुमायूं ने कैसे किया TMC का डिब्बा गोल
  • मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ जिससे तृणमूल कांग्रेस के मुस्लिम विधायक संख्या में कमी आई और बीजेपी को फायदा मिला
  • हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी ने कई उम्मीदवार उतारे और उनके वोटों ने TMC को नुकसान पहुंचाया
  • मुस्लिम बहुल इलाकों में बीजेपी ने महत्वपूर्ण सीटें जीतीं, जहां पहले TMC का प्रभुत्व था और मुस्लिम वोट बंटे
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पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजों के बाद अब जब इसका विश्लेषण किया जा रहा है तो कई नए कारणों का पता चल रहा है, जो ममता बनर्जी की हार के महत्वपूर्ण कारण बने हों. इस विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को स्पष्ट हार का सामना करना पड़ा है और हार जीत के आंकड़े एकदम से पलट गए हैं. इस बार बीजेपी 207 और तृणमूल 80 पर आ टिकी है. यह सब क्यों और कैसे हुआ इसकी जांच पड़ताल की जा रही है. माना जा रहा है कि एसआईआर में 91 लाख वोटों का कटना, पिछले 15 साल की जनता में सत्ता विरोधी लहर, भ्रष्टाचार और वोटों का ध्रुवीकरण इसकी वजह बना. लेकिन एक महत्वपूर्ण कारण ममता बनर्जी के कोर या कट्टर वोटों में सेंध लगना भी है. 

मुस्लिम वोट कैसे बंट गए?

बंगाल में इस चुनाव में मुस्लिम वोट भी बंटे हैं. विभाजन के बाद से ही बंगाल में मुस्लिम वोटों की संख्या हमेशा से अच्छी रही है. कई जिलों में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी या उससे भी अधिक है. अभी भी मोटे तौर पर बंगाल में मुस्लिम आबादी 27 फीसदी है. इस बार चुनाव के बाद बंगाल में मुस्लिम विधायकों के प्रतिनिधित्व में भी कमी आई है. पिछली बार 44 मुस्लिम विधायक थे जिसमें तृणमूल कांग्रेस के 43 थे. 2026 में मुस्लिम विधायकों की संख्या 40 है जिसमें तृणमूल कांग्रेस के 34, कांग्रेस के 2, सीपीएम और आईएसएफ का 1-1 विधायक है. 

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वहीं हुमायूं कबीर ने दो सीटों पर जीत दर्ज की है. हुमायूं कबीर रेजीनगर और नौदा दो जगहों से चुनाव लड़े थे और दोनों सीट पर जीत दर्ज की. पिछली बार ये दोनों सीट तृणमूल कांग्रेस के खाते में थी. हालांकि हुमायूं कबीर की पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी ने 143 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. केवल हुमायूं ही दो जगह से जीते. लेकिन उनके अन्य उम्मीदवारों ने तृणमूल कांग्रेस के वोट में सेंध लगा दी. 

इसी तरह मुस्लिम बहुल कांदी सीट बीजेपी को मिली क्योंकि कांग्रेस को 30 हजार और ओवैसी की पार्टी को करीब 23 हजार वोट मिले. मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर की 43 सीटों में से तृणमूल कांग्रेस को पिछली बार 35 सीटें मिली थीं वही इस बार तृणमूल कांग्रेस को 22 सीट मिली और बीजेपी 8 से बढ़कर 19 हो गई. 

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जहां बनानी थी बाबरी मस्जिद वो सीट भी BJP जीत गई

सबसे दिलचस्प बात है कि बेलडांगा जहां पर हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा की है और चंदा इकट्ठा किया वो सीट बीजेपी ने जीती है. यही नहीं मालदा की माणिकचक और वैष्णव नगर जहां 47 फीसदी मुस्लिम आबादी है वो भी बीजेपी ने जीती. इसी तरह 24 नार्थ और साउथ परगना जहां 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है, वहीं की 64 सीटों में पिछली बार बीजेपी केवल 5 जीती थी. लेकिन इसबार उसे 34 सीटें मिली हैं. 

यदि वोटों के प्रतिशत की बात करें तो पिछली बार तृणमूल कांग्रेस को 57.7 फीसदी वोट मिला था इस बार घटकर 41.41 फीसदी हो गया जबकि वामदलों और कांग्रेस का वोट शेयर 15.9 से बढ़कर 23.3 फीसदी हो गया. बीजेपी का वोट इन इलाकों में बढ़ा है जो मुख्य रूप से हिंदू वोट होगा.

कुछ मिला कर पश्चिम बंगाल चुनाव का नतीजा यह बताता है कि जहां भी मुस्लिम वोटों की संख्या 30 फीसदी या उससे अधिक होता है उनका वोटिंग पैटर्न भी बदल जाता है वो बंट भी जाता है यही चीज बिहार के सीमांचल में देखने में मिला जहां ओवैसी की पार्टी को सफलता मिली मगर बंगाल में ये वोट कांग्रेस,लेफ्ट और हुमायूं कबीर के बीच में बंटा और नुकसान तृणमूल कांग्रेस को हुआ.

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