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बीजेपी ने कैसे जीती पश्चिम बंगाल की लड़ाई, मोदी-शाह की किस रणनीति के सामने टिक नहीं पाईं ममता

विवेक शुक्ल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 06, 2026 14:51 pm IST
    • Published On मई 06, 2026 14:51 pm IST
    • Last Updated On मई 06, 2026 14:51 pm IST
बीजेपी ने कैसे जीती पश्चिम बंगाल की लड़ाई, मोदी-शाह की किस रणनीति के सामने टिक नहीं पाईं ममता

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के रुझान आने के बाद राजधानी दिल्ली के दीन दयाल उपाध्याय मार्ग स्थित बीजेपी मुख्यालय में काफी गहमा-गहमी थी.दफ्तर के आगे पार्क में लगी बीजेपी के पितृ पुरुष दीन दयाल उपाध्याय की आदमकद मूरत पर पार्टी के नेता और कार्यकर्ता माल्यार्पण कर रहे थे. हालांकि शुरुआती रुझानों से पहले चेहरों पर साफ तनाव नजर आ रहा था, लेकिन जैसे-जैसे नतीजे आने लगे, वो तनाव धीरे-धीरे उत्साह और खुशी में बदलने लगा.

टूट गईं पुरानी जंजीरें

पश्चिम बंगाल की जनता ने आखिरकार दशकों पुरानी राजनीतिक गुलामी और तानाशाही की जंजीरें तोड़ दी हैं. ममता बनर्जी के शासनकाल की गुंडागर्दी, हिंसा और तुष्टिकरण की नीतियों का भयावह दौर समाप्त हो चुका है. बंगाल की जनता ने इस बार भारी, क्रांतिकारी और स्पष्ट जनादेश देकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को सत्ता सौंपी है. यह कोई सामान्य चुनावी जीत नहीं, बल्कि बंगाल की आत्मा का पुनरुत्थान है. यह उन लाखों लोगों का जमा हुआ गुस्सा था, जो सालों से राजनीतिक आतंक, भ्रष्टाचार और राज्य को बर्बादी की ओर ले जाने वाली नीतियों से त्रस्त थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की दूरदर्शी अगुवाई में बीजेपी ने जो करिश्मा किया है, वह इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज हो जाएगा.पहले ओडिशा, अब बंगाल. हिंदी पट्टी से निकली बीजेपी अब पूरे भारत को अपने विकास और राष्ट्रवाद के एजेंडे से जोड़ रही है. बंगाल की जनता ने साफ संदेश दिया है, अब और नहीं. चोर-दरवाजे की राजनीति, वोट बैंक का तुष्टिकरण और हिंसा की संस्कृति का अंत होना चाहिए.

बीजेपी राजनीति में शॉर्टकट्स पर विश्वास नहीं करती. वह जानती है कि चोर-दरवाजे से हासिल की गई सत्ता अल्पकालिक होती है. इसलिए पार्टी ने बंगाल में चमक-दमक वाले रास्तों के बजाय सतत संघर्ष, अथक परिश्रम और लोहे जैसी इच्छाशक्ति का रास्ता चुना. इसी रणनीतिक धैर्य और जनता के दर्द को समझने वाले आक्रामक नेतृत्व ने इस भारी जीत की नींव रखी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व और अमित शाह की फूलप्रूफ रणनीति ने पूरे अभियान को नई ऊर्जा दी. दोनों ने मिलकर बंगाल की सड़कों से लेकर गलियों तक तूफान खड़ा कर दिया. बंगाल जीतना बीजेपी के लिए लोहे के चने चबाने जितना कठिन था. राज्य की जटिल जनसांख्यिकी सबसे बड़ी बाधा थी. यहां देश का सबसे बड़ा मुस्लिम वोट बैंक मौजूद है और करीब 85 सीटें मुस्लिम-बहुल हैं. 2021 में टीएमसी ने इनमें से 75 पर कब्जा किया था. इस बार भी टीएमसी को कुछ सहारा मिला, लेकिन सबसे बड़ा धमाका यह हुआ कि मुस्लिम वोट बैंक में दरार पड़ गई. बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं और युवाओं ने बीजेपी का साथ दिया.

यह मोदी सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं और अमित शाह के जमीनी संघर्ष का नतीजा था. शाह ने मुस्लिम समुदाय को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने के बजाय उन्हें मुख्यधारा में लाने का साहसिक कदम उठाया. मुस्लिम महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपए की आर्थिक सहायता का वादा घर-घर पहुंचाया गया. भेदभाव-मुक्त विकास का यह संदेश बंगाल की बेटियों तक असरदार साबित हुआ.

बीजेपी की इस ऐतिहासिक जीत का सबसे मजबूत आधार राजनीतिक हिंसा पर लगाया गया सख्त अंकुश था. ममता बनर्जी सत्ता बचाने के लिए कम्युनिस्ट काल की क्रूर हिंसा की नीति अपना रही थीं. उनके गुंडों को खुला संरक्षण मिला हुआ था. इस बार अमित शाह ने कोई नरमी नहीं बरती. चुनाव आयोग के साथ समन्वय कर केंद्रीय सशस्त्र बलों की भारी तैनाती की गई. स्थानीय गुंडों और पुलिस की मनमानी बंद हुई. शाह का सख्त संदेश 'मतदान के बाद किसी को प्रताड़ित किया तो उल्टा लटकाएंगे' ने आम मतदाता के मन से सालों का भय निकाल दिया. परिणामस्वरूप मतदान प्रतिशत 90 फीसदी से ऊपर पहुंच गया. बंगाल की जनता पहली बार बिना डरे, खुलकर वोट डाल सकी.

स्थानीय चेहरों को मौका देने की रणनीति

जानकार कहते थे कि बीजेपी के पास बंगाल में स्वीकार्य स्थानीय चेहरा नहीं है. पार्टी ने इस कमी को रणनीतिक रूप से दूर
किया. शुभेंदु अधिकारी के साथ कई स्थानीय बंगाली चेहरे आगे आए. भवानीपुर में ममता बनर्जी के खिलाफ शुभेंदु को उतारना अमित शाह का दिमागी मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ. टीएमसी के 'बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी' वाले प्रचार का करारा जवाब देते हुए शाह ने कहा कि 'बांग्ला बोलने वाला, बंगाल का ही मुख्यमंत्री बनेगा.'' जनता ने इस यकीन को अपनाया.ओडिशा चुनाव खत्म होते ही महासचिव सुनील बंसल को बंगाल भेजा गया. संघ के साथ बेहतर समन्वय स्थापित किया गया. बूथ स्तर तक मजबूत संगठन खड़ा किया गया. देश भर से हजारों कार्यकर्ता बंगाल पहुंचे और मतदाताओंको बूथ तक पहुंचाने का जिम्मा संभाला.

दूसरी ओर टीएमसी पूरी तरह बिखरी नजर आई. ममता बनर्जी पर सब कुछ टिका था, लेकिन वे खुद भ्रष्टाचार, आरजी कर, घोटाले और अवैध घुसपैठ के मामलों में घिरी हुई थीं. अदालतें उनकी दलीलें खारिज करती रहीं. केंद्रीय बलों की निगरानी में उनके गुंडे बेकाबू हो गए.'भाषा और संस्कृति के दुश्मन' वाला प्रचार भी फेल रहा, क्योंकि बीजेपी ने मिथुन चक्रवर्ती, स्वपन दासगुप्ता जैसे प्रतिष्ठित बंगाली चेहरों को आगे किया.इसके अलावा बीजेपी ने व्यक्तिगत हमलों के बजाय बंगाल के असली मुद्दों जैसे राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और अवैध घुसपैठ को प्रमुखता दी. ममता के प्रति जनता में सहानुभूति पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी.

पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल बीजेपी के लिए अंतिम बड़ी चुनौती थी. मोदी-शाह जोड़ी ने इसे पहले ही तैयार कर रखा था. इस जीत के साथ बीजेपी का वोट शेयर लोकसभा के 38 फीसदी से विधानसभा में लगभग 48 फीसदी तक पहुंच गया. यह पूरे देश के लिए गेम-चेंजर साबित होगा. बंगाल की यह शानदार जीत साबित करती है कि निरंतर परिश्रम, साहसी स्थानीय नेतृत्व, सच्ची विकास राजनीति और सख्त कानून-व्यवस्था का मिश्रण अजेय है. बीजेपी अब पूर्व से पश्चिम तक अटल रूप से स्थापित हो चुकी है. बंगाल का यह जनादेश न सिर्फ राज्य की राजनीति, बल्कि पूरे राष्ट्र की दिशा बदलने वाला ऐतिहासिक फैसला है.

डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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