- अभिषेक बनर्जी 2011 से सक्रिय हैं और तृणमूल कांग्रेस के भविष्य के नेता माने जाते हैं
- अभिषेक ने चुनावी रणनीति बनाई और ‘तृणमूल नबो ज्वार यात्रा’ तथा ‘अबार जितबे बांग्ला यात्रा’ आयोजित की
- अभिषेक बनर्जी ने आईपैक से जुड़ाव कराया और टिकट वितरण में केवल प्रदर्शन के आधार पर फैसले लेने का तरीका अपनाया
पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच मुकाबला कड़ा है, जिसमें दोनों पार्टियों ने अपनी पूरी ताकत झोंकी हुई है. बीजेपी की तरफ से बंगाल के स्थानीय नेताओं के अलावा केंद्रीय गृह मंत्री और प्रधानमंत्री भी प्रचार में जुटे हैं. यही नहीं बीजेपी शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों का भी लगातार दौरा हो रहा है. एक तरह से बीजेपी ने बंगाल में चुनाव प्रचार के लिए नेताओं की फौज उतार रखी है. वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस की तरफ से ममता बनर्जी ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है और इस बार उनको साथ मिल रहा है अभिषेक बनर्जी का.
2011 से राजनीति में एक्टिव हैं अभिषेक
अभिषेक बनर्जी रिश्ते में ममता बनर्जी के भतीजे हैं और उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है. अभिषेक की राजनीति में एंट्री 2011 के विधानसभा चुनाव में हुई, जब उन्हें तृणमूल कांग्रेस के यूथ विंग का अध्यक्ष बनाया गया. फिर 2014 में डायमंड हार्बर से लोकसभा का चुनाव जीते तब वो संसद में सबसे युवा सांसद थे. 2019 और 2024 में अभिषेक फिर से डायमंड हार्बर से जीते और इस बार तो मार्जिन 7 लाख वोटों का था.

अभिषेक बनर्जी के लिए खास है यह चुनाव
बंगाल में इस विधानसभा चुनाव को ममता बनर्जी के चुनाव के साथ साथ अभिषेक बनर्जी के चुनावी मैनेजमेंट के रूप में भी देखा जा रहा है. यह भी कहा जा रहा है कि अभिषेक बनर्जी ने ही इस बार के रणनीतिकार हैं और ममता बनर्जी के पुराने लोग बॉबी हकीम, अरूप विश्वास, सुब्रतो बक्षी और पार्थ चटर्जी जैसे लोग पीछे रह गए और अभिषेक ने अपनी जगह बनाई. दरअसल अभिषेक बनर्जी ने 2023 में राहुल गांधी के तर्ज पर 50 दिनों की ‘तृणमूल नबो ज्वार यात्रा' निकाली, जिसका फायदा तृणमूल कांग्रेस को 2024 के लोकसभा चुनाव में हुआ. इसी से अभिषेक बनर्जी पर ममता बनर्जी का भरोसा और बढ़ गया. उसके बाद अभिषेक बनर्जी ने विधानसभा चुनाव को नजर में रखते हुए ‘अबार जितबे बांग्ला' यात्रा निकाली और इन दोनों यात्राओं के फीडबैक पर ही उम्मीदवारों का चयन किया गया. अभिषेक बनर्जी ही वो शख्स हैं जिसने ममता बनर्जी को प्रशांत किशोर और आईपैक के लोगों से मिलवाया और 2021 के चुनाव के बाद भी तृणमूल कांग्रेस आईपैक की सेवाएं लेगा यह निर्णय भी अभिषेक का ही था ऐसा यहां कहा जाता है.
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प्रचार के तरीके में भी किया बदलाव
अभिषेक ने चुनाव प्रचार करने के ढंग में भी बदलाव किया. उन्होंने पहली बार बंगाल में प्रचार के लिए मंच के बजाए रैंप का इस्तेमाल किया. अपने प्रचार में हाइपर लोकल मुद्दों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तक की बात करते हैं और बेहद तीखे तेवर में भाषण देते हैं. जैसे एक दिन पहले ही अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय गृह मंत्री को लेकर भाषण में कहा कि यदि हिम्मत है तो 4 तारीख को आधी रात के बाद बंगाल में मौजूद रहना. जिसकी अब पूरे बंगाल में खूब चर्चा हो रही है.
इतना तो जरूर है कि अभिषेक बनर्जी ने अपने आप को ममता बनर्जी के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित कर लिया है और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसे स्वीकार भी कर लिया है मगर क्या वो अभी भी ममता बनर्जी की छाया से आगे निकल पाए हैं या फिर निकल पाएंगे.
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