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बंगाल की सत्ता के केंद्र के 'राइटर्स बिल्डिंग' से 'नबन्ना' शिफ्ट होने की कहानी

पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के साथ ही अब सत्ता का केंद्र भी बदलेगा. ममता सरकार ने अपना सचिवालय ऐतिहासिक 'राइटर्स बिल्डिंग' से 'नबन्ना' शिफ्ट कर दिया था. अब बीजेपी सरकार इसे फिर 'राइटर्स बिल्डिंग' में शिफ्ट करने का प्लान कर रही है.

बंगाल की सत्ता के केंद्र के 'राइटर्स बिल्डिंग' से 'नबन्ना' शिफ्ट होने की कहानी
राइटर्स बिल्डिंग और नबन्ना. (फाइल फोटो)
IANS
  • ममता बनर्जी की सरकार ने 2013 में सचिवालय का स्थान राइटर्स बिल्डिंग से नबन्ना बिल्डिंग में स्थानांतरित किया था
  • राइटर्स बिल्डिंग लगभग 250 साल पुरानी और जर्जर हो चुकी थी जिससे वहां काम करना असुरक्षित था
  • नबन्ना पहले से मौजूद 14 मंजिला इमारत थी जो हुगली रिवर ब्रिज कमिश्नर के ऑफिस के रूप में इस्तेमाल होती थी
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पश्चिम बंगाल में 2011 में जब ममता बनर्जी की सरकार बनी, तो उन्होंने जो काम सबसे पहले किए, उनमें सचिवालय का पता बदलना भी शामिल थी. बंगाल की जो सरकार तब तक 'राइटर्स बिल्डिंग' से चलती थी, ममता सरकार में उसका पता बदलकर 'नबन्ना' बिल्डिंग हो गया. 

अब बंगाल में 'पोरिबर्तन' हो गया है और बीजेपी की नई सरकार चाहती कि नई सरकार का सचिवालय 'राइटर्स बिल्डिंग' हो. बताया जा रहा है कि इसके लिए बंगाल बीजेपी के नेताओं ने दिल्ली को भी बता दिया है. अगर ऐसा होता है तो एक बार फिर से बंगाल की सरकार ऐतिहासिक 'राइटर्स बिल्डिंग' से चलेगी. इसे ऐसे समझ लीजिए कि ममता के दौर में जो सरकार हावड़ा से चलती थी, अब वह फिर से कोलकाता से ही चलेगी.

मगर ममता ने सचिवालय बदला क्यों?

'राइटर्स बिल्डिंग' लगभग 250 साल पुरानी है. अंग्रेजों के राज में भी यह इमारत सत्ता का केंद्र हुआ करती थी. आजादी के बाद बंगाल में जितनी भी सरकारें बनीं, सबका सचिवालय यही था. लेकिन 2011 में जब ममता बनर्जी की सरकार बनी तो उन्होंने अपना सचिवालय शिफ्ट करने का फैसला लिया.

ममता बनर्जी का 'राइटर्स बिल्डिंग' से सचिवालय 'नबन्ना' शिफ्ट करना एक तरह से जरूरत थी. क्योंकि उस वक्त इमारत काफी जर्जर हो चुकी थी. 

'राइटर्स बिल्डिंग' इतनी पुरानी हो चुकी थी कि यह 'अनसेफ' हो चुकी थी और यहां काम करना खतरे से खाली नहीं था. अगस्त 2013 में ममता बनर्जी ने अपना सचिवालय शिफ्ट करने का ऐलान किया था. तब ममता बनर्जी ने बताया था कि ''राइटर्स बिल्डिंग' अब असुरक्षित हो गई है. यह अब 'बारूद के ढेर' में बदल गई है. मैं अपने कर्मचारियों की सुरक्षा चाहती हूं.'

यह इमारत उस वक्त इतनी जर्जर हो चुकी थी कि बार-बार आग लगने की कई छोटी-बड़ी घटनाएं भी सामने आ रही थीं. उस वक्त एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी थी कि अब इसे पूरी तरह से मरम्मत किया जाना जरूरी है. 

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'नबन्ना' कैसे बना नया सचिवालय?

'नबन्ना' कोई नई इमारत नहीं थी. बल्कि यह पहले से ही बनी थी. यहां हुगली रिवर ब्रिज कमिश्नर (HRBC) का ऑफिस था. नीले और सफेद रंग की यह इमारत 14 मंजिला है.

बताया जाता है कि इस इमारत का नाम रखने के लिए ममता बनर्जी ने ज्योतिषियों से सलाह भी ली थी. उन्होंने 'नबन्ना' नाम इसलिए चुना क्योंकि यह एक बहुत सकारात्मक संदेश देता है. 'नबन्ना' का मतलब 'नई फसल' होता है. यह ममता की पार्टी के नारे 'मां, माटी, मानुष' से भी मेल खाता है.

इतना ही नहीं, इस इमारत का उद्घाटन 1 अक्टूबर 2013 को होना था. लेकिन ज्योतिषियों की सलाह के बाद तारीख को बदला गया और फिर इसका उद्घाटन 5 अक्टूबर को किया गया.

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'राइटर्स बिल्डिंग' का इतिहास क्या है?

साल 1776 में कोलकाता में ईस्ट इंडिया कंपनी ने 'राइटर्स बिल्डिंग' को बनाया गया था. यह इमारत शुरू में कंपनी के जूनियर लेवल के कर्मचारियों के रहने की जगह थी. इन्हें राइटर्स कहा जाता था, इसलिए इस इमारत का नाम 'राइटर्स बिल्डिंग' रखा गया.

यह इमारत गहरे लाल रंग की है. यह टेराकोटा ईंटों से बनी हुई है, जो इसे कोलकाता की दूसरी ब्रिटिश काल में बनी इमारतों से अलग बनाता है. यह इमारत 150 मीटर लंबी है और यह 55,000 वर्ग फीट में बनी है. यह इमारत ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय हुआ करती थी.

जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे राइटर्स को फारसी और हिंदी जैसी दूसरी भाषाओं में ट्रेन्ड करने की जरूरत बढ़ती गई. तब इस परिसर के अंदर फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की गई. छात्रों के लिए एक हॉस्टल, एक लेक्चर हॉल, 4 लाइब्रेरी और एक एग्जाम रूम बनाया गया.

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यह कोलकाता की पहली 3 मंजिला इमारत थी. इसकी पहली और दूसरी मंजिल पर 128 फीट लंबा एक बरामदा भी बनाया गया था, जिसमें शानदार खंभे लगाए गए थे, ताकि इमारत को बढ़े हुए हिस्से को मजबूती से सहारा मिल सके. कुछ साल बाद जब अंग्रेजों ने भारत पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया तो यह इमारत सचिवालय बन गई. 

'राइटर्स बिल्डिंग' कई ऐतिहासिक घटनाओं की भी गवाह बनी. यह वही जगह है जहां बंगाल के तीन क्रांतिकारियों- बिनॉय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने लेफ्टिनेंट कर्नल सिम्पसन की गोली मारकर हत्या कर दी थी. इन क्रांतिकारियों के नाम पर ही बाद में डलहौजी स्क्वायर का नाम बदलकर 'BBD बाग' रख दिया गया.

2013 में जब ममता सरकार ने अपना सचिवालय 'राइटर्स बिल्डिंग' से 'नबन्ना' शिफ्ट करने का फैसला लिया था, तो कम्युनिस्ट पार्टी ने इसका काफी विरोध किया था. बंगाल के इतिहास में यह पहली बार था जब उसकी सरकार का कामकाज कोलकाता से बाहर चलाया गया. अब बीजेपी सरकार फिर से 'राइटर्स बिल्डिंग' में सचिवालय को शिफ्ट करना चाह रही है. लेकिन इसकी मरम्मत में कम से कम 3 महीने का वक्त लग सकता है.

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