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सोनम वांगचुक के उपवास तोड़ने को कैसे देखा जा रहा है? उनके फैसले की तारीफ और आलोचना, दोनों क्यों हो रही हैं?

26 दिन बाद सोनम वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ दिया है. उनके इस फैसले का एक तरफ स्वागत हो रहा है तो दूसरी तरफ अनशन तोड़ने के तरीके की आलोचना. किसने सवाल उठाए और पत्नी गीतांजलि के बयान पर क्यों मचा है सियासी विवाद, पढ़िए पूरी रिपोर्ट.

सोनम वांगचुक के उपवास तोड़ने को कैसे देखा जा रहा है? उनके फैसले की तारीफ और आलोचना, दोनों क्यों हो रही हैं?
सोमन वांगचुक के अनशन तोड़ने पर आई मिलीजुली प्रतिक्रिया
PTI/NDTV
  • सोनम वांगचुक के अनशन तोड़ने पर हर तरह की प्रतिक्रियाएं आईं.
  • अधिकांश लोगों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि उनका जीवन अधिक मूल्यवान है.
  • वहीं कुछ लोगों ने उनके अनशन तोड़ने की तो तारीफ की पर इसके तरीके पर सवाल उठाए.

सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल में गुरुवार देर रात अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी. इस पर हर तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. अधिकांश लोगों ने उनके उपवास तोड़ने के फैसले का स्वागत किया है, जबकि कई अन्य लोगों ने इसे निराशाजनक बताया. वहीं वांगचुक की पत्नी गीतांजलि की राहुल गांधी के पीएम आवास के बाहर किए गए विरोध प्रदर्शन को ईमानदार नहीं बताए जाने पर भी कुछ लोगों ने प्रतिक्रिया दी है. गीतांजलि ने कहा था कि राहुल गांधी को जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन के साथ खड़ा होना चाहिए था. जनता को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता.

26 दिन तक चले भूख हड़ताल को खत्म करने के बाद सोनम वांगचुक ने कप से घूंट लेकर उपवास तोड़ा और कहा कि वह इस फैसले से खुश हैं. साथ ही उन्होंने सभी समर्थकों से शांति बनाए रखने और किसी भी तरह की हिंसा से दूर रहने की अपील की.

वांगचुक ने कहा कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के साथ हुई बातचीत तथा आगे संवाद की सहमति के बाद उन्होंने यह फैसला लिया. उन्होंने कहा कि देश के कई हिस्सों में तनाव बढ़ने की आशंका थी और वह नहीं चाहते थे कि उनके आंदोलन के नाम पर हिंसा हो. 

उनके इस कदम का एक बड़ा वर्ग स्वागत कर रहा है और इसे संवाद की जीत बता रहा है. वहीं कुछ समर्थकों का कहना है कि बिना सभी मांगें पूरी हुए अनशन खत्म करना आंदोलन को कमजोर कर सकता है. इस बीच उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो के राहुल गांधी पर दिए बयान ने राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया.

फैसले पर कैसी प्रतिक्रिया?

अनशन समाप्त होने के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं.

वांगचुक के समर्थकों, कई शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि उनका जीवित और स्वस्थ रहना आंदोलन के लिए ज्यादा जरूरी है. उनका तर्क है कि लंबी लड़ाई लड़ने के लिए नेतृत्व का सुरक्षित रहना आवश्यक है.

कई लोगों ने लिखा कि अनशन खत्म होना आंदोलन का अंत नहीं बल्कि बातचीत के नए दौर की शुरुआत है.

सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा, "यह देखकर अच्छा लगा कि मामला बातचीत की ओर बढ़ रहा है. मैं वांगचुक जी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं और उम्मीद करता हूं कि सभी पक्ष मिलकर शांतिपूर्ण और स्थायी समाधान के लिए काम करेंगे."

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन
Photo Credit: PTI

कुछ समर्थकों ने निराशा भी जताई

दूसरी ओर कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर निराशा जताई. उनका कहना है कि आंदोलन की सभी प्रमुख मांगों पर ठोस लिखित आश्वासन मिलने से पहले अनशन समाप्त नहीं होना चाहिए था.

कुछ पोस्ट में यह भी कहा गया कि सरकार को ज्यादा राजनीतिक बढ़त मिल गई, जबकि आंदोलन की मूल मांगों पर अभी अंतिम फैसला बाकी है.

डीयू में प्रोफेसर अपूर्वानंद ने वांगचुक के अनशन तोड़ने पर कड़ी टिप्पणी की. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "आपने उन्हीं से जूस लेना चुना, जिनके हाथों पर छात्रों का खून लगा है, लेकिन छात्रों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. वे उस आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं जिसके आप भी हिस्सा थे."

हालांकि इन प्रतिक्रियाओं के बीच वांगचुक समर्थकों का एक वर्ग लगातार यह कह रहा है कि किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन का अंतिम उद्देश्य संवाद होता है, न कि अनिश्चितकाल तक टकराव.

विपक्ष की प्रतिक्रिया

अनशन खत्म होने से पहले कई विपक्षी सांसद मेदांता अस्पताल पहुंचे थे और उन्होंने वांगचुक से स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए उपवास समाप्त करने की अपील की थी. विपक्षी नेताओं ने कहा था कि उनकी लड़ाई पूरे देश ने सुन ली है और अब उन्हें स्वस्थ रहकर आगे नेतृत्व करना चाहिए.

सरकार का रुख

सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह ने अस्पताल जाकर वांगचुक से मुलाकात की. इसके बाद बातचीत का रास्ता खुला और अंततः उन्होंने अनशन समाप्त करने का फैसला किया.

गीतांजलि जे आंग्मो (सोनम वांगचुक की पत्नी)

गीतांजलि जे आंग्मो (सोनम वांगचुक की पत्नी)
Photo Credit: PTI

पत्नी गीतांजलि के बयान पर नई बहस

इस पूरे घटनाक्रम के बीच वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो का राहुल गांधी को लेकर दिया गया बयान भी चर्चा में है.

गीतांजलि ने कहा कि अगर राहुल गांधी वास्तव में छात्रों के आंदोलन के साथ खड़े थे तो उन्हें प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन करने के बजाय जंतर-मंतर पहुंचना चाहिए था. उन्होंने कहा कि जनता सब समझती है और उसे प्रतीकात्मक राजनीति से प्रभावित नहीं किया जा सकता.

इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई.

एक वर्ग ने गीतांजलि के बयान को बेबाक और ईमानदार बताया. उनका कहना है कि विपक्ष को सिर्फ बयान देने के बजाय आंदोलन स्थल पर मौजूद रहना चाहिए था.

वहीं कांग्रेस समर्थकों का कहना है कि राहुल गांधी लगातार सरकार की आलोचना करते रहे हैं और उनका विरोध प्रदर्शन भी इसी अभियान का हिस्सा था. इसलिए उनकी मंशा पर सवाल उठाना उचित नहीं है.

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स्वास्थ्य सबसे बड़ी चिंता

वांगचुक पिछले कई दिनों से लगातार वजन घटने और शारीरिक कमजोरी का सामना कर रहे थे. अस्पताल के मुताबिक उनकी हालत फिलहाल स्थिर है और डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है. पहले दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर उन्हें सफदरजंग अस्पताल से मेदांता अस्पताल लाया गया था. 

अनशन समाप्त होने के साथ ही केंद्र सरकार और आंदोलनकारी पक्ष CJP के बीच कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में बातचीत होने पर सहमति बनी है. यदि वार्ता सकारात्मक रहती है तो इसे आंदोलन की बड़ी उपलब्धि माना जाएगा. वहीं बातचीत ठोस नतीजे तक नहीं पहुंची, तो आंदोलन दोबारा तेज होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

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