आस्था की नगरी शिर्डी से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने देशभर के लाखों साईं भक्तों के बीच हलचल पैदा कर दी है. श्री साईबाबा संस्थान के प्रसादालय में परोसे जाने वाले महाप्रसाद की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. आरोप है कि जिस भोजन को भक्त पूरे भक्ति भाव और श्रद्धा से ग्रहण करते हैं, उसे तैयार करने में कथित तौर पर 'घटिया दर्जे' (C-Grade) के कच्चे माल का इस्तेमाल किया जा रहा है. सामाजिक कार्यकर्ता संजय काले द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जुटाई गई जानकारी और संस्थान के स्टोर रूम के प्रत्यक्ष निरीक्षण के बाद यह मामला अब पूरी तरह गरमा गया है.
निविदा में 'A' ग्रेड, हकीकत में 'C' ग्रेड का खेल?
इस पूरे विवाद का मुख्य आधार राशन की गुणवत्ता और निविदा प्रक्रिया में की गई कथित हेराफेरी है. सामाजिक कार्यकर्ता संजय काले का दावा है कि संस्थान के दस्तावेजों और टेंडर की शर्तों में जिस राशन को 'अ' यानी उत्तम श्रेणी का दिखाया गया है, वास्तविकता में सप्लायर्स द्वारा वहां 'क' श्रेणी का निकृष्ट माल भेजा जा रहा है. काले ने आरोप लगाया कि ठेकेदारों ने निविदा हासिल करने के समय जो नमूने दिखाए थे, वे बेहद उच्च गुणवत्ता के थे, लेकिन गोदामों में जो स्टॉक मौजूद है, वह उस मानक से कहीं नीचे है. उन्होंने इसे सीधे तौर पर प्रशासन और सप्लायर्स के बीच सांठगांठ और बड़े भ्रष्टाचार का हिस्सा बताया है.
सालाना 100 करोड़ का राशन और 17 संदिग्ध नमूने
शिर्डी का साईं प्रसादालय दुनिया के उन चुनिंदा रसोईघरों में शामिल है जहाँ प्रतिदिन औसतन 50,000 से अधिक भक्त भोजन करते हैं. इस विशाल व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए संस्थान द्वारा सालाना लगभग 70 से 100 करोड़ रुपये का किराना सामान खरीदा जाता है. इसकी आपूर्ति मुंबई, पुणे, जळगाव और नाशिक जैसे शहरों के करीब 20 बड़े सप्लायर्स द्वारा की जाती है. विवाद बढ़ने के बाद, संजय काले ने संस्थान से 17 विभिन्न खाद्य वस्तुओं के नमूने लिए हैं, जिनमें गेहूं, चावल, तुअर दाल, मूंगफली, काजू और किशमिश जैसे महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं. इन नमूनों की स्वतंत्र जांच कराने के बाद अब इस मामले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है.
प्रसादालय की विशाल खपत का ब्योरा
प्रसादालय की व्यवस्था कितनी व्यापक है, इसका अंदाजा यहां होने वाली राशन की मासिक खपत से लगाया जा सकता है. संस्थान में हर महीने औसतन 600 से 650 क्विंटल चीनी और 550 से 600 क्विंटल चावल की खपत होती है. इसके अलावा, रोजाना हजारों रोटियां बनाने के लिए करीब 450 से 500 क्विंटल गेहूं का उपयोग किया जाता है. दालों और अन्य सामग्रियों की बात करें तो प्रतिमाह 300 से 350 क्विंटल हरभरा और लगभग 25 से 30 क्विंटल मूंग दाल की जरूरत पड़ती है. इतनी भारी मात्रा में होने वाली खरीद में गुणवत्ता से समझौता होने की बात ने भक्तों की चिंता बढ़ा दी है.
संस्थान का पक्ष: 'प्रक्रिया पारदर्शी, जांच प्रणाली मजबूत'
इन गंभीर आरोपों के सामने आने के बाद साईं संस्थान प्रशासन ने अपना पक्ष रखते हुए सफाई दी है. संस्थान के सीईओ गोरक्ष गाडीलकर ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि राशन की पूरी खरीद प्रक्रिया ई-टेंडरिंग के माध्यम से सरकारी नियमों के कड़े पालन के साथ की जाती है. उन्होंने बताया कि संस्थान के पास अपनी एक आधुनिक 'फूड टेस्टिंग लैब' है, जहाँ गोदाम में आने वाले हर सामान की गुणवत्ता जांची जाती है. साथ ही, घी और तेल जैसे संवेदनशील उत्पादों को सरकारी लैब में परीक्षण के बाद ही इस्तेमाल में लाया जाता है. प्रशासन का दावा है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है और भक्तों की सेहत से कोई खिलवाड़ नहीं किया जाता.
श्रद्धा और विश्वास का सवाल
दुनिया भर से आने वाले साईं भक्त अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा संस्थान को दान करते हैं, ताकि वहां आने वाले हर श्रद्धालु को सात्विक और शुद्ध महाप्रसाद मिल सके. ऐसे में भक्तों का कहना है कि यदि महाप्रसाद की सामग्री में मिलावट या घटिया गुणवत्ता के आरोप जरा भी सच साबित होते हैं, तो यह न केवल वित्तीय भ्रष्टाचार होगा, बल्कि करोड़ों लोगों की अटूट श्रद्धा के साथ एक बड़ा विश्वासघात भी होगा. फिलहाल सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले की कोई निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होगी जिससे सच सामने आ सके.
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