- पश्चिम बंगाल में RSS ने चुनावी मौसम में पौने दो लाख से अधिक बैठकों के माध्यम से जागरूकता बढ़ाई है.
- पिछले 15 वर्षों में राज्य में संघ की शाखाओं की संख्या नौ सौ से बढ़कर पांच हजार दो सौ तक पहुंच गई है.
- संघ सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे रामनवमी जुलूस और सेवा प्रकल्प के जरिए अपनी पहुंच बढ़ा रहा है.
चुनावी मौसम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पश्चिम बंगाल में बड़ा अभियान चला रहा है. करीब पौने दो लाख बैठकें हो चुकी हैं. स्वयंसेवक घर-घर जाकर वोटरों को जागरूक कर रहे हैं. राज्य में RSS का अभियान इस बार ज्यादा धारदार है. इस स्टोरी में समझेंगे कि क्यों राज्य में संघ का बढ़ता आधार इस अभियान को ईंधन दे रहा है.
पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का लगातार हो रहा विस्तार वहां के जमीनी हालात में हो रहे बदलाव का एक बड़ा इशारा दे रहा है. हिंदुओं के बीच लगातार कार्यक्रम कर आरएसएस अपना विस्तार कर रहा है. शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों के माध्यम से संघ ने राज्य के बुद्धिजीवी वर्ग में भी अपनी पैठ बढ़ाई है.

पश्चिम बंगाल से RSS का ऐतिहासिक जुड़ाव
पश्चिम बंगाल से संघ का पुराना नाता रहा है. यहां 1937 से ही संघ की गतिविधियों का संचालन हो रहा है. राज्य में संघ के पूर्व क्षेत्र के प्रचार प्रमुख जिश्नु बसु के अनुसार, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कुछ समय के लिए संघ की गतिविधियां रोकी गईं थीं और उसके बाद दोबारा शुरू कर दी गईं थीं. संघ के दिग्गज नेताओं गुरु गोलवलकर, मोरोपंत पिंगले, विट्ठल राव पतकी, दत्तोपंत ठेंगडे, एकनाथ रानाडे, बाला साहेब देवरस के साथ ही वर्तमान संघ प्रमुख मोहन भागवत का भी पश्चिम बंगाल एक प्रमुख केंद्र रहा है.
पश्चिम बंगाल में संघ वैसे तो लगातार अपनी गतिविधियां मजबूत करता आया है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इसकी गतिविधियों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है. राज्य के बदले माहौल ने लोगों को संघ के प्रति आकर्षित किया. पिछले केवल तीन सालों में मध्य बंग प्रांत में 500 से अधिक नई शाखाएं शुरू हुई हैं, अगर पिछले 15 सालों की बात करें तो राज्य में संघ की शाखाओं की संख्या 900 से बढ़कर 5200 तक पहुंच गई है.

तीन क्षेत्रीय प्रभाग, हजारों शाखाएं और नया संगठनात्मक ढांचा
संघ के नेताओं के अनुसार, बंगाल में आरएसएस के तीन क्षेत्रीय प्रभाग हैं- उत्तर बंग प्रांत (उत्तर बंगाल के जिले), मध्य बंग प्रांत (पूर्व व पश्चिम बर्द्धमान, बीरभूम, बांकुड़ा, मुर्शिदाबाद और पुरुलिया) और दक्षिण बंग प्रांत (दक्षिण बंगाल के जिले). केवल मध्य बंगाल क्षेत्र में 2023 से 2025 के बीच 500 से अधिक नई शाखाएं जोड़ी गईं हैं. मार्च 2023 में जहां यहां 1,320 शाखाएं थी, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 1,823 हो गई. इस दौरान उत्तर बंग प्रांत में शाखाओं की सख्या 1,034 से बढ़कर 1,153 और दक्षिण बंग प्रांत में 1,206 से बढ़कर 1,564 हो गई. अगले वर्ष से संघ की संभाग प्रमुख व्यवस्था शुरू होगी, जिसके तहत राज्य में पांच संभाग बनाए जाएंगे.
सामाजिक कार्यक्रमों, रामनवमी जुलूसों से बढ़ती पहुंच
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में आरएसएस की लगातार मजबूत होती स्थिति के पीछे कई कारण हैं. संघ सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से अपना विस्तार करता जा रहा है. संघ ने गली-मोहल्लों में बैठकें कर और रामनवमी के जुलूसों के माध्यम से लोगों तक पहुंच बढ़ाई है. राज्य में 29 हजार से भी अधिक स्थानों पर रामनवमी के जुलूस निकाले गए. दक्षिण बंगाल में बारह हजार, उत्तरी बंगाल में दस हजार और मध्य बंगाल में सात हजार जुलूस निकाले गए.
राज्य में कई स्थानों पर सेवा प्रकल्प और पाठदान (एकल विद्या) केंद्र चलाए जा रहे हैं. बसु के अनुसार, कोलकाता, हावड़ा महानगर, सिलीगुड़ी और बर्धमान में 764 स्थानों पर ऐसे केंद्र चलाए जा रहे हैं. राज्य में आरएसएस की ताकत बढ़ने के घटनाक्रम में एक बड़ा मोड़ 2012-13 में आया था, जब स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती के अवसर पर युवा शिविर का आयोजन किया गया. इसमें 9876 युवा आए जो तीन दिनों तक रहे. इसके बाद से ही राज्य में संघ की गतिविधियां तेज हुईं.

बंगाल में RSS से जुड़े ये संगठन भी सक्रिय
राज्य में संघ से जुड़े कई संगठन सक्रिय हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद छात्रों के बीच विचारधारा के विस्तार में लगा है. भारतीय मजदूर संघ राज्य के श्रमिकों के बीच पैर पसार रहा है. भारतीय किसान संघ ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को संगठित करने में लगा है. सीमांत चेतना मंच के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों में लोगों को जागरुक किया जा रहा है. लघु उद्योग भारती छोटे उद्यमियों के बीच सक्रिय है. वहीं अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ शिक्षकों को संगठित करने में जुटा है. वनबंधु परिषद राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में सक्रियता से काम कर रही है.

शताब्दी वर्ष कार्यक्रम और हिंदू सम्मेलनों की भूमिका
संघ के नेताओं के अनुसार, राज्य में आरएसएस के विस्तार के कई प्रमुख कारण हैं. हाल ही में संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का सफलतापूर्व आयोजन इसके पीछे एक बड़ी वजह है. इसके तहत संघ ने अपना संपर्क अभियान तेज किया. राज्य भर में दो हजार से अधिक हिंदू सम्मेलनों का आयोजन किया गया. प्रमुख केंद्रों पर पथ संचलन का आयोजन किया गया. प्रमुख हिंदू धार्मिक हस्तियों के साथ संपर्क स्थापित हुआ. इसके अलावा राज्य में चल रही धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों ने भी जमीनी माहौल को बदलने में मदद दी. उदाहरण के तौर पर सामूहिक गीता पाठ के कार्यक्रम में पांच लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया. यह संघ का कार्यक्रम नहीं था, लेकिन ऐसे कार्यक्रमों से संघ को अपना काम आगे बढ़ाने में मदद मिली.
हिंदू समाज की जागरूकता और राजनीतिक पृष्ठभूमि
संघ के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, राज्य में हिंदू समाज की जागरुकता बढ़ी है और यह शाखाओं के विस्तार का एक बड़ा कारण माना जा सकता है. उनके अनुसार जिस तरह से पिछले पंद्रह वर्षों में ममता सरकार ने तुष्टिकरण को बढ़ावा दिया है, उससे हिंदू एकता के संघ के काम को आगे बढ़ाने के लिए माहौल बना है. कई आश्रमों को निशाना बनाया गया. राम कृष्ण मिशन पर हमला बोला गया. भवानीपुर में भोलागिरी आश्रम पर हमले और साधुओं के खिलाफ हिंसा के आरोप टीएमसी कार्यकर्ताओं पर लगाए गए.
इन घटनाओं ने धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों को संघ के साथ आने में मदद की. आरएसएस के यही नेता कहते हैं कि मुर्शिदाबाद और हावड़ा आदि में कट्टरपंथी मुस्लिमों की ओर से की गई घटनाओं के कारण लोगों में प्रतिक्रिया हुई और संघ के प्रति रुझान बढ़ा क्योंकि ऐसे मामलों में संघ के अलावा कोई और नहीं बोलता. वे कहते हैं कि ऐसे मामलों में पुलिस खामोश रहती है. संघ के नेता घुसपैठ के मुद्दे को भी हाईलाइट करते हैं जो अब आम लोगों में एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है.
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