"नज़र नहीं है नज़ारों की बात करते हैं
ज़मीं पे चाँद-सितारों की बात करते हैं
वो हाथ जोड़कर बस्ती को लूटने वाले
भरी सभा में सुधारों की बात करते हैं!"
याद है ये पंक्तियां? कुछ समय पहले UP विधानसभा में CM योगी आदित्यनाथ ने ये शेर पढ़ा था. और फिर संसद में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इन्हीं पंक्तियों से अपनी बात रखी थी. ये शेर पूरे देश में वायरल हुआ. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन मशहूर लाइनों को लिखने वाला कलमकार कौन है? क्या आपको पता है कि दिल्ली के 'कर्तव्य पथ' पर पिछले 3 सालों से उत्तर प्रदेश की झांकी अपना परचम लहरा रही है, जिसे लगातार अवार्ड्स मिल रहे हैं, उसको लिखने वाले 'गीतकार' कौन है?
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अब बात हम उसी शख्स की करेंगे जिसकी कलम ने यूपी के विकास और विरासत को शब्दों में पिरोकर पूरी दुनिया को अपना मुरीद बना लिया है. नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड में उत्तर प्रदेश ने कमाल कर दिया है. लगातार तीसरे साल यूपी की झांकी को पहला पुरस्कार मिला है. और अब तैयारी है 2026 की!
चौथी बार उत्तर प्रदेश की झांकी कर्तव्य पथ पर सजने के लिए तैयार है. इस बार की थीम बहुत खास है— "कलिंजर का किला और यूपी का विकास". लेकिन इन झांकियों की जो रूह होती है, यानी इनका 'थीम सॉन्ग', उसे लिखने वाले शख्स का नाम है— वीरेन्द्र प्रताप सिंह (Virendra Singh Vats) जिन्हें साहित्य की दुनिया में 'वीरेन्द्र वत्स' के नाम से जाना जाता है. वीरेन्द्र वत्स सिर्फ एक कवि नहीं हैं, बल्कि वो उत्तर प्रदेश के 'राज्य सूचना आयुक्त' भी हैं और एक मंजे हुए वरिष्ठ पत्रकार भी रहे हैं.

उनकी कहानी शुरू होती है 1986 में, जब उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए किया. और यहाँ एक बहुत दिलचस्प मोड़ आया! उस दौरान उन्हें महान कवयित्री महादेवी वर्मा का सान्निध्य मिला. वीरेन्द्र वत्स ने अपनी पहली कविता 'यह देश' महादेवी वर्मा को दिखाई थी. महादेवी वर्मा ने उन्हें कुछ सुझाव दिए, उन्हें तराशा, और बस... वहां से उनकी लेखनी ने जो रफ़्तार पकड़ी, वो आज हम सबके सामने है.
33 साल तक पत्रकारिता करने के बाद, आज वो यूपी के हर बड़े सरकारी प्रोग्राम के 'आधिकारिक गीतकार' जैसे बन गए हैं. चाहे संसद हो या विधानसभा, पक्ष हो या विपक्ष, हर कोई इनकी रचनाओं का कायल है. अब बात करते हैं 2026 के गणतंत्र दिवस की. इस बार जो गाना गूंजने वाला है, उसकी कुछ पंक्तियाँ सामने आई हैं.
"शक्तिवान बेटियों की अब नई उड़ान है,
आज यूपी में विकास का नया विहान है.
खिल रही विरासतें हैं, बन रहा ब्रह्मोस भी,
मिल रहा है रोज़गार, बढ़ रहा है जोश भी."
इन पंक्तियों में आप देख सकते हैं कि कैसे उन्होंने 'नारी शक्ति', 'विरासत' और 'ब्रह्मोस मिसाइल' (डिफेंस कॉरिडोर) जैसी आधुनिक प्रगति को एक साथ जोड़ दिया है. यही वीरेन्द्र वत्स की खूबी है. चलिए, एक छोटा सा रीकैप देखते हैं कि पिछले सालों में उन्होंने अपनी कलम से क्या जादू बिखेरा है:
2021 (अयोध्या मंदिर झांकी): गीत था— 'जहां अयोध्या सियाराम की देती समता का संदेश, कला और संस्कृति की धरती धन्य-धन्य उत्तर प्रदेश.'
2022 (काशी विश्वनाथ कॉरिडोर): गीत के बोल थे - 'काशी का गौरव लौटा जब खुला भव्य गलियारा, विश्वनाथ से मिलकर पुलकित है गंगा की धारा.'
2023 (अयोध्या दीपोत्सव): 'सीता-राम अयोध्या लौटे, चारों ओर दिवाली है, चमक रहा है उत्तर प्रदेश घर-घर में खुशहाली है.'
2024 (रामलला जन्मोत्सव): 'आज धरा के भाग्य खुले हैं पावन बेला आई, रामलला ने जन्म लिया है घर-घर बजे बधाई.'
2025 (महाकुम्भ): इसके लिए उन्होंने लिखा है - 'स्वर्गलोक की आभा उतरी तीर्थराज के आंगन में, झूम रहे हैं साधु-संत जन, पुलक भरा है तन-मन में.'
ये थे वीरेन्द्र प्रताप सिंह 'वत्स'. एक ऐसा व्यक्तित्व जिन्होंने न सिर्फ हिंदी और भोजपुरी फिल्मों के लिए गीत लिखे, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर कविता पाठ किया, बल्कि आज यूपी की प्रगति की कहानी को अपनी कविताओं के जरिए पूरी दुनिया तक पहुंचा रहे हैं. जब हम झांकी देखते हैं, तो हमें उसकी सजावट दिखती है, लेकिन उस झांकी के पीछे जो 'शब्दों की ताकत' होती है, वो वीरेन्द्र वत्स जैसे लेखकों की कलम का कमाल है.
निशान्त मिश्रा NDTV में पत्रकार हैं.
डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.
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