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Exclusive: जेवर एयरपोर्ट जिस LC3 सीमेंट से बना, उसे क्यों माना जा रहा भविष्य का चमत्कार; ऐसी क्या खासियत

स्विट्जरलैंड में विकसित और भारत सहित कई देशों के वैज्ञानिकों के सहयोग से तैयार की गई सीमेंट निर्माण की यह तकनीक जलवायु परिवर्तन से निपटते हुए निर्माण क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है.

Exclusive: जेवर एयरपोर्ट जिस LC3 सीमेंट से बना, उसे क्यों माना जा रहा भविष्य का चमत्कार; ऐसी क्या खासियत
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट में यूज हुई सीमेंट LC3 सीमेंट की खासियतें.
IANS
  • नोएडा एयरपोर्ट में स्विट्जरलैंड विकसित लो-कार्बन लाइमस्टोन कैल्साइंड क्ले सीमेंट का उपयोग किया गया है.
  • LC3 सीमेंट पारंपरिक सीमेंट की तुलना में कार्बन उत्सर्जन 40 प्रतिशत कम करता है और ऊर्जा की खपत भी घटाता है.
  • LC3 का प्रयोग न केवल इमारतों में बल्कि रनवे सहित एयरसाइड इंफ्रास्ट्रक्चर में भी सफलतापूर्वक किया जा रहा है.
नई दिल्ली:

गौतमबु्द्धनगर के जेवर में बना नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट कई मामलों में खास है. इस एयरपोर्ट की कई खासियतें तो आप पहले से जान चुके होंगे, लेकिन अब इस एयरपोर्ट ने निमार्ण में इस्तेमाल हुई सीमेंट के बारे में एक ऐसी जानकारी सामने आई है, जो इसे भविष्य का चमत्कार बनाती है. नोएडा एयरपोर्ट में स्विट्जरलैंड में विकसित हुई बेहद खास सीमेंट का इस्तेमाल हुआ है. जो क्लाइंट चेंज और मौसम जनित कई समस्याओं को कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है. 

दरअसल जेवर स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट भारत की पहली बड़ी सिविल इंजीनियरिंग परियोजना है, जिसमें लो-कार्बन लाइमस्टोन कैल्साइंड क्ले सीमेंट (LC3) का उपयोग किया गया है. 

स्विट्जरलैंड में विकसित और भारत सहित कई देशों के वैज्ञानिकों के सहयोग से तैयार की गई यह तकनीक जलवायु परिवर्तन से निपटते हुए निर्माण क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है. इस उपलब्धि के पीछे एक उल्लेखनीय अंतरराष्ट्रीय साझेदारी है, जिसमें IIT दिल्ली, IIT मद्रास, स्विट्जरलैंड के इकोल पॉलीटेक्निक फेडरल डे लॉज़ान (EPFL) और अन्य वैश्विक संस्थानों के शोधकर्ता शामिल रहे. 

एक दशक से अधिक समय तक चले शोध के बाद वैज्ञानिकों ने ऐसा सीमेंट विकसित किया, जो मजबूती और टिकाऊपन से समझौता किए बिना कार्बन उत्सर्जन को काफी कम कर सकता है.

अब यह तकनीक प्रयोगशालाओं से निकलकर भारत की बड़ी परियोजनाओं में से एक में इस्तेमाल हो रही है. NDTV ने स्विट्जरलैंड के लॉजान में स्थित EPFL की प्रोफेसर करेन स्क्रिवेनर से बात की, जिन्हें LC3 तकनीक की अग्रणी वैज्ञानिक माना जाता है. इस बातचीत में उन्होंने बताया कि नोएडा एयरपोर्ट पर LC3 का उपयोग केवल परीक्षण के तौर पर नहीं, बल्कि पूर्ण पैमाने पर किया जा रहा है.

करेन स्क्रिवेनर ने कहा, 'यह निश्चित रूप से बड़े पैमाने पर उपयोग है. हम आमतौर पर कहते हैं कि इससे CO2 उत्सर्जन में लगभग 40 प्रतिशत की कमी आती है.' उनका यह बयान इस तकनीक के महत्व को दर्शाता है. मालूम हो कि सीमेंट उद्योग दुनिया में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोतों में से एक है और वैश्विक उत्सर्जन का लगभग 8 प्रतिशत इसके कारण होता है. इसका मुख्य कारण क्लिंकर के उत्पादन में लगने वाली अत्यधिक ऊर्जा है, जो पारंपरिक सीमेंट का प्रमुख घटक है.

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट में यूज LC3 सीमेंट के बारे में वैज्ञानिक ने बताया है.

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट में यूज LC3 सीमेंट के बारे में वैज्ञानिक ने बताया है.

LC3 तकनीक क्लिंकर के बड़े हिस्से की जगह कैल्साइंड क्ले और लाइमस्टोन का उपयोग करती है. इस सरल लेकिन प्रभावी बदलाव से उत्पादन में कम ऊर्जा लगती है और कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी कम होता है. प्रोफेसर स्क्रिवेनर ने कहा, "यह एक लो-कार्बन सीमेंट है. इसका मुख्य नवाचार यह है कि क्लिंकर को अधिकतम संभव मात्रा में अन्य सामग्रियों से प्रतिस्थापित किया जाता है."

इस बदलाव का प्रभाव व्यापक है. LC3 के उत्पादन के लिए लगभग 800 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है, जबकि पारंपरिक पोर्टलैंड सीमेंट के लिए लगभग 1450 डिग्री सेल्सियस तापमान चाहिए. इससे ऊर्जा की खपत और उत्सर्जन दोनों में बड़ी कमी आती है.

EPFL की प्रयोगशाला में पर्यावरण-अनुकूल सीमेंट विकसित करने वाले प्रमुख शोधकर्ताओं में शामिल कश्मीर में जन्मी सिविल इंजीनियर डॉ. मेहनाज धर का कहना है कि भारत के लिए LC3 समय की आवश्यकता है. नोएडा एयरपोर्ट में इस तकनीक का उपयोग केवल इमारतों में ही नहीं, बल्कि रनवे सहित एयरसाइड इंफ्रास्ट्रक्चर में भी किया जा रहा है. प्रोफेसर स्क्रिवेनर के अनुसार LC3 का उपयोग बिना किसी सीमा के सभी प्रकार के निर्माण कार्यों में किया जा सकता है.

EPFL की प्रोफेसर करेन स्क्रिवेनर, जिन्हें LC3 तकनीक की अग्रणी वैज्ञानिक माना जाता है

EPFL की प्रोफेसर करेन स्क्रिवेनर, जिन्हें LC3 तकनीक की अग्रणी वैज्ञानिक माना जाता है
Photo Credit: NDTV

उन्होंने कहा, 'आप इसे सभी प्रयोगों में इस्तेमाल कर सकते हैं. मेरा मानना है कि इसका उपयोग रनवे में भी किया जा रहा है, लेकिन निश्चित रूप से इसे इमारतों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.' यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि पानी के बाद कंक्रीट दुनिया में सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली सामग्री है. 

हर साल दुनिया भर में 30 अरब टन से अधिक कंक्रीट का उत्पादन होता है. प्रोफेसर स्क्रिवेनर के अनुसार पृथ्वी पर मानव द्वारा उपयोग की जाने वाली कुल सामग्रियों में लगभग तीन-चौथाई हिस्सा सीमेंट आधारित सामग्रियों का है. इसलिए इसके पर्यावरणीय प्रभाव भी बेहद बड़े हैं. उन्होंने कहा, "यदि LC3 जैसी तकनीकों को व्यापक रूप से अपनाया जाए तो वैश्विक उत्सर्जन में लगभग 2 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है और अन्य उपायों के साथ यह आंकड़ा 5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है."

भारत के लिए इसका महत्व और भी अधिक है क्योंकि देश दुनिया के सबसे बड़े सीमेंट उत्पादकों और उपभोक्ताओं में शामिल है. भारत हर वर्ष करोड़ों टन सीमेंट का उत्पादन करता है और सड़क, पुल, हवाईअड्डे तथा स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाओं पर भारी निवेश करता है. निर्माण क्षेत्र आर्थिक विकास का प्रमुख आधार है, लेकिन यह देश के कार्बन उत्सर्जन में भी योगदान देता है.

ऐसे में नोएडा एयरपोर्ट में LC3 को अपनाना हरित निर्माण (ग्रीन कंस्ट्रक्शन) की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. अल्ट्राटेक, डालमिया भारत, जेके सीमेंट, श्री सीमेंट और जेके लक्ष्मी सीमेंट जैसी प्रमुख भारतीय कंपनियां पहले ही LC3 के व्यावसायिक उत्पादन की ओर बढ़ चुकी हैं. इसका मतलब है कि यह तकनीक अब केवल शोध संस्थानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि औद्योगिक स्तर पर उपयोग के लिए तैयार है.

हालांकि एक बड़ा सवाल यह है कि क्या यह नया सीमेंट हवाईअड्डों जैसे संवेदनशील स्थलों पर पारंपरिक सीमेंट जितना टिकाऊ और भरोसेमंद साबित होगा?

इस पर प्रोफेसर स्क्रिवेनर पूरी तरह आश्वस्त हैं. उन्होंने कहा, "बिल्कुल यह लंबे समय तक टिकेगा. हमें उम्मीद है कि इसकी टिकाऊ क्षमता मौजूदा कंक्रीट से भी बेहतर होगी." उन्होंने बताया कि इसकी ड्यूरेबिलिटी को लेकर कई परीक्षण किए जा चुके हैं. "हमने इसकी टिकाऊ क्षमता से जुड़े सभी परीक्षण किए हैं और हमें पूरा विश्वास है कि यह बेहद अच्छी तरह टिकेगा."

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उनका यह भरोसा निर्माण उद्योग की उस प्रमुख चिंता को संबोधित करता है, जहां सुरक्षा और दीर्घकालिक मजबूती सर्वोच्च प्राथमिकताएं होती हैं. उन्होंने यह भी कहा कि भारत इस तकनीक से लाभ उठाने की अनूठी स्थिति में है. देश में निम्न गुणवत्ता वाले चूना पत्थर और मिट्टी की प्रचुर उपलब्धता है, जो LC3 के लिए आवश्यक कच्चे माल हैं. साथ ही कई पुराने सीमेंट संयंत्रों को कम लागत में इस तकनीक के अनुरूप बदला जा सकता है.

उन्होंने कहा, "भारत ने तेजी से नए सीमेंट संयंत्र स्थापित किए हैं. इसका मतलब है कि कई पुराने प्लांट्स को बहुत कम लागत में कैल्साइंड क्ले आधारित सीमेंट उत्पादन के लिए परिवर्तित किया जा सकता है." इससे बिना भारी निवेश के देशभर में LC3 उत्पादन का तेजी से विस्तार संभव हो सकता है.

  • नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट परियोजना स्वयं भी व्यापक पर्यावरणीय दृष्टिकोण के अनुरूप विकसित की जा रही है. इसका लक्ष्य नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करना है और इसके लिए ऊर्जा-कुशल प्रणालियों तथा पर्यावरण-अनुकूल सामग्रियों का उपयोग किया जा रहा है.
  • परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि LC3 का उपयोग यह दिखाता है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नई तकनीकों को अपनाने और उद्योग के लिए नए मानक स्थापित करने में नेतृत्व कर सकते हैं.
  • स्विट्जरलैंड और भारत के बीच LC3 को लागू करने का यह सहयोग वैश्विक वैज्ञानिक साझेदारी की ताकत को भी दर्शाता है. लॉज़ान की प्रयोगशालाओं से लेकर नोएडा के निर्माण स्थल तक LC3 की यात्रा यह साबित करती है कि नवाचार सीमाओं से परे जाकर वास्तविक परिवर्तन ला सकता है.
  • प्रोफेसर स्क्रिवेनर ने इसकी सफलता को संक्षेप में बताते हुए कहा, "अब तक हम इससे बहुत खुश हैं." भारत जिस तेजी से बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है, उसमें इस परियोजना की सफलता यह तय कर सकती है कि लो-कार्बन सीमेंट भविष्य में नया मानक बनेगा या नहीं.
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अब सवाल यह नहीं है कि यह तकनीक काम करती है या नहीं, बल्कि यह है कि इसे भारत और दुनिया भर में कितनी तेजी से अपनाया जाता है फिलहाल, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट केवल एक नया हवाईअड्डा नहीं, बल्कि सतत निर्माण के भविष्य का प्रतीक बन चुका है. कह सकते हैं कि लॉज़ान और नोएडा के बीच एक ऐसा संबंध ‘सीमेंट' हो गया है, जो पर्यावरण के लिए अधिक स्वच्छ और हरित भविष्य की आधारशिला रख सकता है.

LC3 (Limestone Calcined Clay Cement) तकनीक के प्रमुख फायदे 
 

  1. कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कमी: पारंपरिक सीमेंट की तुलना में LC3 से लगभग 40% तक कम CO₂ उत्सर्जन होता है. सीमेंट उद्योग वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का लगभग 8% हिस्सा है, इसलिए LC3 जलवायु परिवर्तन से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
  2. कम ऊर्जा की आवश्यकता: पारंपरिक सीमेंट के लिए लगभग 1450°C तापमान चाहिए, जबकि LC3 केवल 800°C पर तैयार हो सकता है. इससे ईंधन की खपत और उत्पादन लागत दोनों कम हो सकती हैं.
  3. कच्चे माल की आसान उपलब्धता: LC3 में कम-ग्रेड चूना पत्थर और मिट्टी का उपयोग होता है. भारत में ये संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो सकती है.
  4. बेहतर टिकाऊपन: शोधकर्ताओं के अनुसार LC3 आधारित कंक्रीट सामान्य कंक्रीट की तुलना में अधिक टिकाऊ हो सकता है. इससे इमारतों, पुलों और रनवे की आयु बढ़ सकती है.
  5. पुराने सीमेंट प्लांट का उपयोग: कई पुराने सीमेंट कारखानों को कम निवेश में LC3 उत्पादन के लिए बदला जा सकता है. इससे नई फैक्ट्रियां लगाने की आवश्यकता कम होगी.
  6. बड़े निर्माण कार्यों में उपयोग योग्य: नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट में इसका उपयोग इमारतों और रनवे दोनों में किया जा रहा है. यानी यह सिर्फ प्रयोगशाला की तकनीक नहीं बल्कि व्यावसायिक स्तर पर सफल है.


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