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नितिन नबीन बने बीजेपी अध्यक्ष- क्या हैं उनके सामने 10 सबसे बड़ी चुनौतियां?

नितिन नबीन बने बीजेपीअध्यक्ष. अब उनके सामने हैं वो 10 चुनौतियां, जिन पर फोकस कर वे एक यादगार अध्यक्ष बनेंगे, जिसे पार्टी अगली पीढ़ी के निर्माता के रूप में याद रखेगी.

नितिन नबीन बने बीजेपी अध्यक्ष- क्या हैं उनके सामने 10 सबसे बड़ी चुनौतियां?
  • नितिन नबीन की पहली परीक्षा विधानसभा चुनाव हैं, जहां पश्चिम बंगाल समेत कुछ राज्यों में बीजेपी सत्ता से बाहर है.
  • पार्टी में युवाओं और वरिष्ठ नेताओं के बीच, तो पार्टी से बाहर सहयोगियों के साथ संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती है.
  • दक्षिण भारत में संगठन मजबूत करना और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ तालमेल रखना भी उतना ही अहम है.
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नितिन नबीन ऐसे समय में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं जब पार्टी सत्ता में होते हुए भी कई मुश्किलों से जूझ रही है. उम्र सिर्फ 45 साल लेकिन उम्र कम होना अपने आप में चुनौती भी है और मौका भी. उनके सामने सवाल यही है कि वे सिर्फ एक युवा चेहरा बनकर रह जाएंगे या वाकई पार्टी को अगले दौर के लिए तैयार करेंगे. कार्यकाल संभालते ही नितिन नबीन के सामने ऐसी 10 बड़ी चुनौतियां सामने आने वाली हैं जिनसे निपट कर वो पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर अपने चयन को और मजबूत बनाएंगे.

1. पहली चुनौती क्या है?

नितिन नबीन की असली परीक्षा बहुत जल्दी शुरू हो जाएगी. पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं. इनमें से असम और पुडुचेरी को छोड़ दें तो बाकी जगह बीजेपी सत्ता में नहीं है. तमिलनाडु और केरल में बीजेपी का संगठन कमजोर है. पश्चिम बंगाल में पार्टी मुख्य विपक्ष जरूर है, लेकिन ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ और तृणमूल कांग्रेस की जमीनी ताकत बीजेपी के लिए बड़ी रुकावट है. ऐसे में इन चुनावों में जीत से ज्यादा अहम बात होगी कि बीजेपी कैसा प्रदर्शन करती है. अगर नतीजे बहुत खराब रहे तो सवाल सीधे नितिन नबीन के नेतृत्व पर उठेंगे. यही वजह है कि ये चुनाव उनके लिए अग्निपरीक्षा जैसे हैं. इन राज्यों में जीत से अधिक महत्वपूर्ण है बीजेपी का प्रदर्शन और वोट-शेयर. खराब नतीजे नितिन नबीन की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर सकते हैं. साथ ही, सत्ता विरोधी लहर और क्षेत्रीय मुद्दों के बीच बीजेपी की राष्ट्रीय रणनीति को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाना उनके लिए कठिन कार्य होगा.

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2. पार्टी में पीढ़ीगत संतुलन

नितिन नबीन खुद युवा हैं और बीजेपी नेतृत्व उनसे उम्मीद करता है कि वे युवाओं को आगे बढ़ाएं. आज का वोटर भी युवा है. लेकिन दिक्कत ये है कि बीजेपी का संगठन अभी भी वरिष्ठ अनुभवी नेताओं और पुराने ढांचे पर टिका है. अगर वे सिर्फ युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाते हैं तो वरिष्ठ नेताओं में नाराजगी हो सकती है. अनुभव की अनदेखी संगठन को नुकसान पहुंचा सकती है. इसलिए उन्हें ऐसा नेतृत्व खड़ा करना होगा जिसमें युवा भी हों और अनुभवी भी. यानी युवा और अनुभव के बीच संतुलन बनाना होगा. साथ ही उन्हें ये भी दिखाना होगा कि वे सिर्फ नाम के अध्यक्ष नहीं हैं, बल्कि फैसले लेने की ताकत रखते हैं. उन्हें अपनी निर्णय लेने की क्षमता को स्थापित करना होगा ताकि वे केवल एक प्रतीकात्मक युवा चेहरा न बनकर वास्तविक अध्यक्ष के रूप में उभर सकें.

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3. संगठन और सरकार के बीच संतुलन

बीजेपी लंबे समय से केंद्र की सत्ता में है. ऐसे में संगठन अक्सर सरकार की उपलब्धियों के प्रचार तक सीमित हो जाता है. नितिन नबीन के सामने चुनौती है कि वे पार्टी संगठन को सरकार से अलग पहचान दें. संगठन का काम केवल सरकारी योजनाओं का प्रचार नहीं, बल्कि कैडर निर्माण, जनसंवाद और वैचारिक प्रशिक्षण भी है. अगर संगठन कमजोर हुआ तो बीजेपी केवल प्रधानमंत्री की लोकप्रियता पर निर्भर रह जाएगी. लंबे समय में ये देशव्यापी चुनाव परिणाम के लिहाज से पार्टी के लिए नुकसानदायक हो सकता है. इसलिए नितिन नबीन को संगठन को सक्रिय, आत्मनिर्भर और सरकार से संवाद करने वाली इकाई के रूप में बनाए रखना होगा.

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4. दक्षिण भारत में बीजेपी का विस्तार

दक्षिण भारत चुनाव परिणामों के लिहाज से बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरी है. तमिलनाडु और केरल में पार्टी का आधार बहुत सीमित है. यहां की क्षेत्रीय तथा वैचारिक राजनीति बीजेपी के खिलाफ जाती रही है. द्रविड़ आंदोलन, भाषा और सामाजिक न्याय की राजनीति ने तमिलनाडु में बीजेपी की राह कठिन बनाई है. केरल में वामपंथ और कांग्रेस का प्रभुत्व है. केरल में हाल ही में हुए निकाय चुनाव में कुछ सफलताओं ने संभावनाओं की उम्मीदें जगाई भी हैं. स्थानीय नेतृत्व, सांस्कृतिक मुद्दों की समझ और क्षेत्रीय राजनीति के साथ तालमेल बना कर बीजेपी को दक्षिण में मजबूत अपने संगठन को मजबूत बनाना होगा. वहां स्थानीय नेताओं को आगे लाना होगा. उत्तर भारत का राजनीतिक फॉर्मूला दक्षिण भारत में नहीं चलेगा और ये बात अब बीजेपी को भी बखूबी पता है. तो नितिन नबीन के लिए चुनौती यह है कि वे यहां तात्कालिक चुनावी लाभ की बजाय दीर्घकालिक संगठन निर्माण पर ध्यान दें.

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5. बीजेपी-संघ की ताकत

जब जब संघ और बीजेपी के बीच तालमेल कमजोर पड़ा है पार्टी की जमीनी ताकत पर असर पड़ा है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बीजेपी की वैचारिक और संगठनात्मक शक्ति का मुख्य स्रोत है. नितिन नबीन को यह सुनिश्चित करना होगा कि बीजेपी और आरएसएस के बीच समन्वय बना रहे. दोनों संगठनों की कार्यशैली अलग है, संघ वैचारिक और दीर्घकालिक सोच रखता है जबकि बीजेपी चुनावी और व्यावहारिक राजनीति करती है. किसी भी तरह का मतभेद कैडर स्तर पर भ्रम और असंतोष पैदा कर सकता है. इसलिए नितिन नबीन के लिए यह एक संवेदनशील चुनौती है कि वे वैचारिक प्रतिबद्धता और चुनावी रणनीति के बीच संतुलन बनाए रखें.

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6. एनडीए के सहयोगियों के साथ संतुलन

बीजेपी अकेले नहीं, बल्कि NDA के साथ चुनाव लड़ती है. बीजेपी की राष्ट्रीय सफलता में एनडीए की अहम भूमिका रही है. अलग-अलग राज्यों में सहयोगी दलों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं और महत्वाकांक्षाएं होती हैं. सीट बंटवारे, नेतृत्व के प्रश्न और क्षेत्रीय मुद्दों पर मतभेद स्वाभाविक हैं. नितिन नबीन को गठबंधन धर्म निभाते हुए बीजेपी के हितों की रक्षा करनी होगी. उन्हें ध्यान रखना होगा कि कोई भी सहयोगी नाराज न हो. किसी भी सहयोगी का अलग होना बीजेपी के लिए राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है. इसलिए गठबंधन की राजनीति में संयम, संवाद और समझदारी की रणनीति को अपनाना होगा जो बड़ी चुनौतियों में से एक है.

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Photo Credit: X @NitinNabin

7. एंटी-इंकम्बेंसी और आर्थिक असंतोष

भले ही नितिन नबीन सरकार में न हों, लेकिन सरकार की नीतियों का असर सीधे पार्टी पर पड़ता है. महंगाई, बेरोजगारी और आम आदमी की परेशानियां विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार होती हैं. पार्टी अध्यक्ष के तौर पर नितिन नबीन को इन मुद्दों पर कार्यकर्ताओं को तैयार करना होगा. लोगों से संवाद बढ़ाना होगा. सिर्फ आंकड़े गिनाने से काम नहीं चलेगा. अगर जनता की नाराजगी को नजरअंदाज किया गया तो इसका चुनावी नुकसान हो सकता है.

8. संगठन से सरकार तक सामाजिक संतुलन

बीजेपी की चुनावी ताकत अलग-अलग सामाजिक वर्गों के समर्थन से बनती है. लेकिन नेतृत्व में हर वर्ग के वास्तविक प्रतिनिधित्व की मांग लगातार बढ़ रही है- खास कर महिलाओं, ओबीसी, दलितों और युवाओं की. ऐसे में नितिन नबीन को संगठन में यह संतुलन बनाना होगा. यह केवल प्रतीकात्मक न हो बल्कि वास्तविक भागीदारी के रूप में होना चाहिए. ऐसे करने में सफल रहे तो सामाजिक संतुलन बना रहेगा और बीजेपी का आकार बड़े से और बड़ा यानी विकराल होगा. इसके उलट ऐसा न करने की सूरत में लंबे दौर में खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है.

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Photo Credit: BJP

9. बड़े संरचनात्मक और राजनीतिक मुद्दे

महिला आरक्षण, परिसीमन और ‘वन नेशन, वन इलेक्शन' जैसे मुद्दे राजनीतिक रूप से संवेदनशील हैं. ये सीधे राज्यों और विपक्ष को प्रभावित करते हैं. यही कारण है कि इन पर राष्ट्रीय सहमति बनाना आसान नहीं है. इन मुद्दों पर कोई भी जल्दबाजी या सख्ती राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकती है. नितिन नबीन को यहां संवाद और सहमति का रास्ता अपनाना होगा. उन्हें पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगहों पर संवाद स्थापित करना होगा. वरना पार्टी पर जबरदस्ती करने का आरोप लग सकता है. गलत तरीके से हैंडल किए गए ये मुद्दे क्षेत्रीय असंतोष और राजनीतिक विरोध को बढ़ा सकते हैं.

10. अध्यक्ष पद की वास्तविक भूमिका स्थापित करना

अक्सर यह कहा जाता है कि बीजेपी अध्यक्ष का पद सिर्फ प्रतीकात्मक रह गया है. नितिन नबीन के सामने चुनौती है कि वे इस धारणा को तोड़ें. उन्हें संगठनात्मक फैसलों, उम्मीदवारों के चयन और रणनीति निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी होगी. तभी वे एक मजबूत अध्यक्ष के रूप में स्थापित हो पाएंगे.

कुल मिलाकर नितिन नबीन की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होगा कि पार्टी ने किसी चुनाव में कितनी सीटें हासिल कीं. बल्कि उनके पार्टी अध्यक्ष की भूमिका के केंद्र में संगठन की मजबूती और अगली पीढ़ी के लिए बीजेपी की तैयारी है. तो जब भी नितिन नबीन के अध्यक्ष काल का आकलन होगा तो सबसे अहम सवाल यही होगा कि क्या बीजेपी उनके कार्यकाल में खुद को भविष्य की राजनीति के लिए ढाल पाई?

बीजेपी लंबे समय से केंद्र की सत्ता में है. ऐसे में संगठन अक्सर सरकार की उपलब्धियों के प्रचार तक सीमित हो जाता है. नितिन नबीन के सामने चुनौती है कि वे पार्टी संगठन को सरकार से अलग पहचान दें. संगठन का काम केवल सरकारी योजनाओं का प्रचार नहीं, बल्कि कैडर निर्माण, जनसंवाद और वैचारिक प्रशिक्षण भी है. अगर संगठन कमजोर हुआ तो बीजेपी केवल प्रधानमंत्री की लोकप्रियता पर निर्भर रह जाएगी. लंबे समय में ये देशव्यापी चुनाव परिणाम के लिहाज से पार्टी के लिए नुकसानदायक हो सकता है. इसलिए नितिन नबीन को संगठन को सक्रिय, आत्मनिर्भर और सरकार से संवाद करने वाली इकाई के रूप में बनाए रखना होगा.

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