विज्ञापन

मेरी चुप्पी की परीक्षा ली जा रही... अरविंद केजरीवाल के आरोपों पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने दिया जवाब

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल के आरोपों पर जवाब दिया है. उन्होंने कहा है कि कोई भी बार और जजों के रिश्ते को तोड़ या कमजोर नहीं कर सकता. जानिए उन्होंने क्या-क्या कहा

मेरी चुप्पी की परीक्षा ली जा रही... अरविंद केजरीवाल के आरोपों पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने दिया जवाब
  • जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल के हितों के टकराव के आरोपों को मनगढ़ंत और आधारहीन बताया है
  • जजों के बच्चों के कानूनी पेशे में आने को उनके मौलिक अधिकारों के खिलाफ कहना अनुचित और अस्वीकार्य है
  • जस्टिस शर्मा ने कहा कि बार और बेंच के बीच संबंधों को कोई केस कमजोर या प्रभावित नहीं कर सकता है
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

दिल्ली शराब नीति मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल के आरोपों पर जवाब दिया है. उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने 'हितों के टकराव' का मनगढ़ंत केस बनाने की कोशिश की है. मेरा या मेरे किसी रिश्तेदार का दिल्ली शराब नीति से जुड़े किसी भी मामले में कोई लेना-देना नहीं है. केजरीवाल के आरोपों पर पलटवार करते हुए जस्टिस शर्मा ने पूछा कि अगर एक राजनेता की पत्नी राजनीति में कदम रख सकती है, तो हम जजों के बच्चों के कानूनी पेशे में आने के चुनाव पर सवाल कैसे उठा सकते हैं? यह किसी जज के बच्चों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है कि यह कहा जाए कि वे कानूनी पेशे में नहीं आ सकते.

'बार और जजों के रिश्ते नहीं हो सकते कमजोर'

जस्टिस शर्मा ने RTI जानकारी से जुड़े उन आरोपों पर बात की, जिनमें कहा गया था कि उनके परिवार के सदस्यों को केस मिल रहे हैं.  उन्होंने कहा कि भले ही इस अदालत के रिश्तेदार सरकारी पैनल में हों, फिर भी केस करने वाले को यह दिखाना होगा कि इसका मौजूदा मामले या इस अदालत की फैसला लेने की शक्ति पर क्या असर पड़ रहा है. केजरीवाल ने ऐसा कोई भी संबंध नहीं दिखाया है. उन्होंने कहा कि कोई भी केस करने वाला 'बार' (वकीलों) और 'बेंच' (जजों) के बीच के रिश्ते को तोड़ या कमजोर नहीं कर सकता.

केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा पर आरएसएस से जुड़े संगठनों के कार्यक्रमों में जाने का आरोप लगाया था. इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा कि संगठन चाहे कोई भी हो, उसका संस्थापक कोई भी हो, जजों को अदालत के जज के तौर पर ही छात्रों या बार के सदस्यों से बातचीत करने के लिए बुलाया जाता है. यह बातचीत सिर्फ कानून तक ही सीमित होती है. बार और बेंच के बीच का रिश्ता सिर्फ अदालत के कमरों तक ही सीमित नहीं होता.

'मेरी चुप्पी की परीक्षा ली जा रही'

दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल की 'खुद को केस से अलग करने' वाली अर्जी पर फैसला सुनाया. जस्टिस शर्मा ने कहा कि एक जज के तौर पर मेरी चुप्पी की परीक्षा ली जा रही है. उन्होंने कहा कि खुद के खिलाफ लगाए गए आरोपों और इशारों को सुनने का मुश्किल रास्ता चुना, ताकि वह 'खुद को केस से अलग करने' वाली अर्जी पर फैसला ले सकें. यह पहली बार नहीं है कि किसी जज के सामने खुद को केस से अलग करने के लिए ऐसी कोई अर्जी दायर की गई हो.

जस्टिस शर्मा ने कहा, जब मैंने यह फैसला लिखना शुरू किया, तो अदालत में पूरी तरह सन्नाटा छा गया था. जो बचा था, वह था एक जज होने का शांत और भारी एहसास. एक ऐसा जज जिसने भारत के संविधान की शपथ ली है. उन्होंने कहा, 'मुझे एहसास हुआ कि एक जज के तौर पर मेरी चुप्पी की ही परीक्षा ली जा रही थी और अब सवाल जज की निष्पक्षता और खुद संस्था की निष्पक्षता को लेकर था. यह मुद्दा बिल्कुल साफ था कि क्या मुझे खुद को इस केस से अलग कर लेना चाहिए. मेरी निष्पक्षता और गरिमा को चुनौती दी गई थी. आसान रास्ता यह होता कि मैं अर्जी सुने बिना ही खुद को इस मामले से अलग कर लेती. लेकिन मैंने अर्जी पर फैसला करने का निर्णय लिया, क्योंकि यह संस्था का सवाल था.'

उन्होंने आगे कहा, 'मैंने फैसला किया कि मैं इन आरोपों से प्रभावित हुए बिना ही इस पर फैसला लूंगी, जैसा कि मैंने अपने 34 साल के न्यायिक करियर में हमेशा किया है. इस काम को मुश्किल बनाने वाली बात यह है कि बहस के दौरान एक-दूसरे के विपरीत रुख अपनाए गए हैं.' उन्होंने (केजरीवाल) कहा है कि उन्हें जज की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि केस ट्रांसफर कर दिया जाए, इसलिए नहीं कि कोई पक्षपात हो रहा है, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें पक्षपात की आशंका है.

'जब राहत दी तब नहीं लगाए भेदभाव के आरोप'

जस्टिस शर्मा ने यह भी बताया कि उन्होंने CBI की उस अर्जी पर अंतरिम रोक क्यों लगाई, जिसमें जमानत ऑर्डर को चुनौती दी गई थी. जस्टिस शर्मा ने उन मामलों की सूची गिनाई, जिनमें उन्होंने केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य लोगों को बिना दूसरी पार्टी की बात सुने ही अंतरिम राहत दी थी. उन्होंने कहा, अरविंद केजरीवाल ने न सिर्फ मुझे, बल्कि न्यायपालिका जैसी संस्था को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है. जब मैंने पहले AAP नेताओं को राहत दी थी, तब पक्षपात या किसी विचारधारा की ओर झुकाव के कोई आरोप नहीं लगाए गए थे. अरविंद केजरीवाल की पार्टी से जुड़े लोगों ने यह तर्क नहीं दिया था कि उनके पक्ष में कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जाना चाहिए.' उन्होंने कहा, 'इस अदालत के सामने कई अन्य मामले भी लंबित हैं, जिनमें अरविंद केजरीवाल की पार्टी से जुड़े नेताओं के मामले भी शामिल हैं. इस अदालत और जज द्वारा ऐसे कई आदेश जारी रखे गए हैं, लेकिन तब कोई आरोप नहीं लगाए गए थे. शायद इसलिए, क्योंकि वे आदेश उनके पक्ष में थे.

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा, 'अब मैं उस आरोप से निपट रही हूं, जिसमें यह कहा गया है कि मैं जो भी आदेश देती हूं, उसे सुप्रीम कोर्ट रद्द कर देता है. किसी भी मुवक्किल को यह हक नहीं है कि वह अदालत को यह बताए कि कौन सा जज किस मामले की सुनवाई करने के लायक है. अगर किसी जज के आदेश को कोई ऊपरी अदालत रद्द कर देती है, तो उस मुवक्किल को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह यहां खड़े होकर यह कहे कि यह जज मामले की सुनवाई करने लायक नहीं है.

यह भी पढ़ें: दिल्ली HC में केजरीवाल की पेशी, जज के बच्चों को लेकर दायर हलफनामे को कोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया 

'नेताओं के बयान पर अदालत का कंट्रोल नहीं'

जस्टिस शर्मा अब गृह मंत्री अमित शाह के बयान के संबंध में केजरीवाल की दलीलों पर विचार कर रही हैं. उनका कहना है कि ऐसे आधार पर जज के खुद को मामले से अलग करने की मांग करना, पूरी तरह से कोरी कल्पना पर आधारित कार्रवाई करने जैसा होगा. कोई राजनेता सार्वजनिक मंच पर क्या बयान देना चुनता है, इस पर इस अदालत का कोई नियंत्रण नहीं है. इसी तरह, यह अदालत राजनेताओं द्वारा दिए गए बयानों को भी नियंत्रित नहीं कर सकती. 

उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने चुनिंदा तौर पर इस बात का जिक्र किया कि उन्होंने अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था. यह आधार किसी और प्रतिवादी ने नहीं उठाया है, इसलिए ये टिप्पणियां सिर्फ उनके आवेदन में ही बताई जा रही हैं. ये कार्यक्रम नए आपराधिक कानूनों और महिला दिवस के आयोजनों पर थे, या फिर बार के युवा सदस्यों के साथ बातचीत करने के लिए थे. कई जज इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेते रहे हैं. इस तरह की भागीदारी का इस्तेमाल वैचारिक पक्षपात का आरोप लगाने के लिए नहीं किया जा सकता. यह समझना मुश्किल है कि मुख्य अतिथि या वक्ता के तौर पर महज भागीदारी से पक्षपात की आशंका कैसे पैदा हो सकती है, या इससे किसी जज की किसी मामले पर फैसला सुनाने की क्षमता कैसे खत्म हो सकती है.

जस्टिस शर्मा का कहना है कि वह 34 साल से जज हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोपों पर ज्यादा ध्यान देने की ट्रेनिंग मिली है. सोशल मीडिया पर 1000 बार दोहराए गए झूठ से वह सच नहीं हो जाता. दो चीजें होती हैं. एक वह है जो असल में कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट है और एक यह कि आप किसी चीज को ऐसे प्रोजेक्ट करें कि यह तो कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट है. मैंने उससे अपने जजमेंट में डील किया है. इस कोर्ट के एक ऑफिसर के तौर पर मुझे इस बात का पता है कि एक झूठ को कोर्ट या सोशल मीडिया पर हजार बार दोहराने पर भी वह सच नहीं हो जाता. 

यह भी पढ़ें: दिल्‍ली हाई कोर्ट ने स्वीकार की अरविंद केजरीवाल की अर्जी, कहा- आपके लिए आउट ऑफ वे जाकर अर्जी स्वीकार की

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com