मुजफ्फरपुर की जिस शाही लीची के लिए देश दुनिया के लोग इंतजार करते हैं, वह विश्व प्रसिद्ध शाही लीची अब मांग के अनुरूप किसानों के पास नहीं मिल रही है. हालांकि आम लोगों के लिए शाही लीची का बाजार सज चुका है. लेकिन लोगों को इसके लिए दोगुनी कीमत चुकानी पड़ रही है. इस बार लिची का उत्पादन कम होने और उस पर मौसम की मार और बारिश से इस बार लीची की फसल काफी प्रभावित हुई है, जिससे लोगों को एक लीची के लिए 3 से 4 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं. समय पर बारिश नहीं होने से मौसम की मार ने लीची किसानों की कमर तोड़ दी है.
लीची किसानों का कहना है कि इस बार लीची का उत्पादन कम है और उसके बाद बारिश और मौसम की मार फसल पर पड़ी है, जिससे महंगे रेट में लीची बिक रहे हैं. लीची खरीद रहे ग्राहकों का कहना है कि लीची के लिए लोग इंतजार करते हैं और इस बार तो लीची मंहगी है, लेकिन फिर भी हम लोग महंगे लीची को खरीद रहे हैं.
सवा लाख टन का उत्पादन 30 हजार टन तक पहुंचा
बताया जा रहा है कि मुजफ्फरपुर की लीची का उत्पादन क्षमता प्रतिवर्ष 1 लाख 25 हजार टन के आसपास उत्पादन होता था, लेकिन इस वर्ष लीची का उत्पादन क्षमता घट के 30 हजार टन हुआ. मौसम की मार के कारण मांग के अनुरूप बाजार में शाही लीची नहीं मिल रही है और बाजारों में ऊंचे दामों पर बिक रहीं है. जबकि पिछले वर्ष की बात करें तो मुजफ्फरपुर की शाही लीची की एक पीस की कीमत जहां 1 रुपए से डेढ़ रुपए होती थी. इस बार कीमत 3 से 4 रुपये पहुंच गई है.
करीब 12,000 हेक्टेयर भूमि पर लीची की खेती
शाही लीची का उत्पादन मुजफ्फरपुर जिले के कई क्षेत्रों में होता है. इसमें मीनापुर, मुसहरी, बोचहा और कांटी काफी नामी हैं, जहां बड़े पैमाने पर लीची के बागान हैं. पूरे जिले में करीब 12,000 हेक्टेयर भूमि पर लीची की खेती होती है. जो पूरे बिहार के उत्पादन के हिसाब से मुजफ्फरपुर में 40 परसेंट लीची का उत्पादन होता है. अकेले मुजफ्फरपुर जिला से देश दुनिया में हर वर्ष 1 लाख 25 हजार टन शाही लीची भेजी जाती थी, इस वर्ष मौसम अनुकूल नहीं होने के कारण लीची का उत्पादन बहुत कम मात्रा में हुआ है, जिससे इस बार उम्मीद जताई जा रही है कि 30 हजार टन के आसपास लीची का उत्पादन हुआ है. इतना कम मात्रा में लीची का उत्पादन होने से एक तरफ किसानों को काफी क्षति उठानी पड़ रही है तो दूसरे तरफ लोगों को महंगे लीची की खरीदारी करना पड़ रहा है.
15 दिन का ही होता है लीची का बाजार
खास बात यह कि लीची का एक सीमित समय होता है. शाही लीची का मुख्य सीजन बहुत छोटा होता है. यह आमतौर पर मई के दूसरे-तीसरे हफ्ते से शुरू होकर जून के पहले हफ्ते तक (करीब 15 दिनों तक) ही बाजार में रहती है और इसी सीमित समय के अंदर देश-विदेश में पहुंचती है. मुजफ्फरपुर की शाही लीची दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों के साथ-साथ लंदन और दुबई जैसे विदेशी बाजारों तक भेजी जाती है.
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक विकास कुमार दास ने बताया की दिसंबर महीने से ही लीची का फल तैयार होने लगता है, लेकिन आमतौर पर जो लीची के पौधे के लिए टेंपरेचर होना चाहिए वह इस बार नहीं था. जब पेड़ों में मंजर आते हैं उसी वक्त बारिश हो गई और बाद में धूप से तापमान बढ़ गया, जिससे पेड़ से मजर झरने लगे. इतना ही नहीं जब फल आने लगे तो बिन मौसम बारिश ने लीची के फलों को नुकसान पहुंचा दिया.
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