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This Article is From Nov 19, 2025

साल 2025 का शब्द पैरासोशल- कितना सोशल कितना ऐंटी सोशल?

कैंब्रिज डिक्शनरी ने मंगलवार को घोषणा की कि ‘पैरासोशल‘ को ‘वर्ड ऑफ द ईयर-2025’ घोषित किया गया है जिसका अभिप्राय होता है कि व्यक्ति किसी ऐसे प्रसिद्ध व्यक्ति के साथ जुड़ाव या उससे संबंधित होना महससू करता है, जिसे वह नहीं जानता.

साल 2025 का शब्द पैरासोशल- कितना सोशल कितना ऐंटी सोशल?

इस साल कैंब्रिज ने 'पैरासोशल' शब्द को  साल 2025 का वर्ड ऑव द ईयर चुना है. पैरासोशल- यानी ऐसा व्यक्ति जो किसी ऐसे प्रसिद्ध व्यक्ति से बहुत निजी और गहरा जुड़ाव महसूस करता है जिसे वह जानता तक नहीं. इस शब्द को 2023 में कैंब्रिज ने अपने शब्दकोश में शामिल किया था. 

शब्द का क्या है मतलब?

वैसे ये कोई नया शब्द नहीं है. दो समाजशास्त्रियों डोनाल्ड हॉर्टन और आर रिचर्ड वोल ने इसे 1956 में ही गढ़ा था. उन्होंने एक पर्चा लिखा था जिसका शीर्षक था- मास कम्युनिकेशन ऐंड पैरा सोशल इंटरैक्शन. उन्होंने इस शब्द का इस्तेमाल उस रिश्ते को लेकर किया जो मीडिया में आने वाली शख्सियतों के प्रति दर्शक महसूस करते हैं. उनके मुताबिक ये बिल्कुल आमने-सामने के रिश्ते जैसा मालूम होता था. 

अब 75 साल बाद जब हम हर तरफ़ सोशल मीडिया से घिरे हैं, हर तरफ तरह-तरह की शख़्सियतें हमारे हर लम्हे को भरे हुए हैं, हमारे वास्तविक रिश्ते कहीं दूर छिटके हुए हैं, बच्चे बाहर हैंं, मित्र व्यस्त हैं, घरों की दीवारों के बीच कई और अदृश्य दीवारें बन गई हैं- वाईफाई की खड़ी की हुई दीवारें- तो इस बढ़ते अकेलेपन में वह पैरा सोशल रिश्ता कुछ और बड़ा और बहुआयामी होता जा रहा है जो शायद बीती सदी के छठे दशक में एक नई प्रवृत्ति का इशारा मात्र था. 

अकेलापन कोई नई चीज़ नहीं है. अलग-अलग दौर में लोग, समाज, समूह और देश तक अकेले पड़ते रहे हैं. लेकिन इक्कीसवीं सदी के इस तीसरे दशक का अकेलापन बीसवीं सदी के अकेलेपन से भिन्न था. दो-दो विश्वयुद्धों और कई आने-जाने वाले युद्धों से बिल्कुल कुचली हुई सी बीसवीं सदी में लोग अकेलेपन और अनास्था को अपने इकलौते शरण्यों की तरह देखते थे. आल्बेयर कामू के उपन्यास 'अजनबी' का नायक ऐसा ही अकेला नायक है.

तकनीक ने शहरों, मोहल्लों, घरों को किया अकेला

ग्राहम ग्रीन के उपन्यासों में यह अकेलापन अलग ढंग से पढ़ा जा सकता है. मगर इक्कीसवीं सदी का अकेलापन युद्धों, सामाजिक तनावों और टकरावों की देन नहीं है, वह तकनीक के हमले से पैदा हुई चीज़ है. तकनीक ने शहरों, मोहल्लों, घरों और कमरों तक को अकेला कर दिया है. पुरानी भौगोलिक संरचनाएं बेमानी हैं और नए मित्र पड़ोस में नहीं, कहीं दूर बन रहे हैं. वे हमारी स्मृति और कल्पना में बन रहे हैं. इनमें वे शख्सियतें भी चली आ रही हैं जिन्हें न हमने देखा है न जाना है, लेकिन जिनसे बहुत गहरा रिश्ता महसूस करने लगे हैं.

क्या इसका वास्ता कुछ उस राजनीतिक अपसंस्कृति से भी है जो लोगों को निराश करती है और मीडिया के बनाए नायकों का मुरीद और भक्त बना डालती है? क्या राष्ट्रों और समाजों के भीतर पैदा नकली पराभव के भाव से भी पैरासोशल संबंध बनते हैं?  जिसे हम पर्सनालिटी कल्ट बोलते हैं क्या वह कुछ ऐसी ही चीज़ होती है? क्या एक दौर में हिटलर और मुसोलिनी जैसी शख्सियतें इस व्यक्तिपूजा के नतीजे से पैदा हुई थीं? क्या आज भी हमारे चारों ओर ऐसे लोग हैं जिन्हें हम मीडिया में देखकर उनके प्रति बिल्कुल निजी रागात्मकता महसूस करते हैं?  

बहरहाल, पैरासोशल एक ऐसे समय में एक नए शब्द की तरह हमारी दुनिया में आया है जब शब्द अपने अर्थ, अपने मानी खो रहे हैं. सच सच नहीं रहा, झूठ झूठ नहीं रहा, न्याय न्याय नहीं रहा, शासन शासन नहीं रहा, धर्म धर्म नहीं रहा, लोकतंत्र लोकतंत्र नहीं रहा. लेकिन शब्दों की या भाषा की एक चुनौती यह भी होती है कि जब उनके अर्थ चुकने लगें तो नए शब्द बनाए जाएं, भाषा को नए अर्थ दिए जाएं. यह काम इन दिनों कम हो रहा है- भाषा हमारे लिए जैसे गैरज़रूरी हुई जा रही है. जीवन में वह वास्तविक सरोकार नहीं रहा, वे मूल्य नहीं बचे जो हमें प्रेरित कर सकें कि हम जीवन को नए ढंग से समझें.

लेकिन पैरासोशल जैसा कोई शब्द आता है या फिर बीते साल ऑक्सफोर्ड द्वारा चुना गय ब्रेन रॉट जैसा शब्द सामने आता है तो अचानक हमें अपने समय में बढ़ती सड़ांध का खयाल आता है, अपने खोखले हो रहे रिश्तों पर नज़र जाती है. 'पैरासोशल' से डरने की ज़रूरत नहीं है, उसके सामने सोशल को खडा करने की ज़रूरत है. ब्रेन रॉट से परेशान होने की बात नहीं है, इसे रोकने के लिए दिमाग खोलने की ज़रूरत है. लेकिन क्या यह काम आसान रह गया है? 'पैरासोशल' हमारे समाज में रिश्तों के खालीपन से ही पैदा नहीं हुआ है, यह एक राजनीतिक प्रक्रिया द्वारा भी थोपा जा रहा है जिसे समझने और जिसकी काट खोजने की जरूरत है. जाहिर है, यह काट उस वास्तविक सामूुहिकता से ही संभव है जिसमें कुछ वास्तविक रिश्ते बनें, कुछ असली नायक बनें. और वे न भी बनें तो हम अपने-आप को, अपने आसपास को कुछ बेहतर ढंग से पहचान सकें- किसी अनजान मीडिया शख़्सियत पर इस तरह जान न छिड़कें कि उसके लिए जान लेने-देने के खेल में शरीक दिखें. 
 

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