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This Article is From Aug 27, 2022

क्लासरूम निर्माण मामले में CVC रिपोर्ट पर कार्रवाई में देरी पर दिल्ली सरकार से LG ने मांगा जवाब

एडिशनल कामों या बदली स्पेसिफिकेशन के लिए कोई फ्रेश टेंडर जारी नहीं हुआ बल्कि मौजूदा ठेकेदार थे, जो दूसरे स्कूलों में काम कर रहे थे उन्हीं ने सारा काम किया.

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)
नई दिल्ली:

दिल्ली की केजरीवाल सरकार को एक और मामले में घेरने की कोशिश होती नजर आ रही है. दिल्ली के उपराज्यपाल ने दिल्ली के मुख्य सचिव से रिपोर्ट मांगी है कि दिल्ली सरकार के स्कूलों में एडिशनल क्लासरूम बनाने के मामले में जो सीवीसी ने रिपोर्ट दी थी उस पर विजिलेंस ने कार्रवाई में 2.5 साल की देरी क्यों की?

उपराज्यपाल दफ़्तर सूत्रों के मुताबिक 17/02/2020 को सीवीसी ने दिल्ली के सेक्रेटरी विजिलेंस को वो रिपोर्ट भेजी थी जिसमें दिल्ली सरकार के स्कूलों में क्लासरूम कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में भारी अनियमितता और प्रक्रिया में गड़बड़ी पाई थी. उपराज्यपाल दफ्तर सूत्रों के मुताबिक एलजी ने इस अत्यधिक देरी को गंभीरता से लिया है, जो सीवीसी मैनुअल के प्रासंगिक खंडों के उल्लंघन के अलावा, भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हुए घोर कदाचार को कवर करने का एक स्पष्ट प्रयास प्रतीत होता है.

25 जुलाई, 2019 को केंद्रीय सतर्कता आयोग को बीजेपी नेता विजेंद्र गुप्ता ने एक शिकायत की थी, जिसमें यह कहा गया था कि - 

1. बिना टेंडर के स्पेसिफिकेशन बदलने के नाम पर कंस्ट्रक्शन कॉस्ट 90 फ़ीसदी तक बढ़ाई गई
2. दिल्ली सरकार ने 500 करोड़ रुपए की कॉस्ट एस्केलेशन लागत बढ़ाई जो कीमत वह बिना टेंडर के थी. 
3. GFR और CPWD वर्क मैन्युअल का उल्लंघन
4. खराब क्वालिटी का काम हुआ है और अधूरा है.

उपराज्यपाल दफ्तर सूत्रों के मुताबिक शुरुआत में जो टेंडर जारी किए गए और मंजूर किए गए, उनमें आगे चल कर अच्छी स्पेसिफिकेशन, प्लिंथ एरिया, सर्विस टैक्स के नाम पर 17 से लेकर 90 फ़ीसदी तक वैल्यू में बदलाव हुआ. फिर 326 करोड़ का कॉस्ट एस्केलेशन हुआ यानी प्रोजेक्ट की कॉस्ट बढ़ी जो टेंडर अमाउंट से 53 प्रतिशत ज्यादा थी. कॉस्ट एस्केलेशन का इस्तेमाल केवल 4027 क्लासरूम के निर्माण में किया गया जबकि 6133 क्लासरूम बनने थे. 

साथ ही क्लासरूम निर्माण की कीमत करीब 33 लाख रुपये प्रति क्लासरूम बैठी. 194 स्कूलों के अंदर 1214 टॉयलेट्स बनाए गए जबकि 160 की जरूरत थी, इसमें से ₹37 करोड़ का एक्स्ट्रा का खर्चा हुआ. टॉयलेट्स की गिनती और पेशी क्लास रूम की तरह हुई. इन प्रोजेक्ट का सैंक्शंड अमाउंट 989 करोड़ था. 860 करोड़ के टेंडर हुए लेकिन असल खर्चा 1315 करोड़ आया. 

एडिशनल कामों या बदली स्पेसिफिकेशन के लिए कोई फ्रेश टेंडर जारी नहीं हुआ बल्कि मौजूदा ठेकेदार थे, जो दूसरे स्कूलों में काम कर रहे थे उन्हीं ने यह काम किया. बहुत से काम पूरे भी नहीं हुए और कई जगह क्वालिटी इशू भी हैं. GFR, CPWD वर्क्स मैन्युअल और सीवीसी गाइडलाइंस का घोर उल्लंघन हुआ है. 

पूरे मामले में सीवीसी की सिफारिश है कि क्लासरूम कंस्ट्रक्शन मामले में विस्तृत जांच की जाए. एक आर्किटेक्ट फर्म, उसको किस तरह से इस मामले में शामिल किया गया है इसकी इंक्वायरी की जाए.

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