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कर्नाटक सरकार ने 2022 दंगों के दौरान दर्ज किए गए मामलों को लिया वापस, BJP ने बताया तुष्टिकरण

कर्नाटक सरकार के दंगों के दौरान दर्ज मामले वापस लेने के फैसले पर बीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कांग्रेस सरकार पर हिंसक तत्वों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया.

कर्नाटक सरकार ने 2022 दंगों के दौरान दर्ज किए गए मामलों को लिया वापस, BJP ने बताया तुष्टिकरण
बेंगलुरु:

कर्नाटक मंत्रिमंडल ने राज्य भर में 42 आपराधिक मामले वापस लेने का फैसला किया है, जिनमें कलबुर्गी जिले के आलंद कस्बे में स्थित विवादित लाडले मशक दरगाह में 2022 में हुई झड़पों से जुड़े कई मामले भी शामिल हैं. वापस लिए गए मामलों में 13 मामले सांप्रदायिक हिंसा से संबंधित हैं, जो दरगाह के भीतर शिवलिंग के अपमान के आरोपों के बाद भड़की थी.

इस घटना के बाद इलाके में तनाव फैल गया था, जब हिंदू कार्यकर्ताओं के एक समूह ने कथित तौर पर शिवलिंग की सफाई के लिए दरगाह परिसर में प्रवेश करने का प्रयास किया, जिसके बाद पत्थरबाजी और झड़पें हुईं.

हिंसा के दौरान कई वाहन क्षतिग्रस्त हो गए, जिनमें सरकारी वाहन और राजनीतिक नेताओं से जुड़ी गाड़ियां भी शामिल थीं. अशांति के दौरान केंद्रीय मंत्री भगवान खुबा और कलबुर्गी के उपायुक्त की कारों में भी तोड़फोड़ की गई थी.

सूत्रों के अनुसार, गृह विभाग ने शुरुआत में दंगा संबंधी मामलों को वापस लेने के कदम का विरोध किया था, जिसमें एडवर्स लीगल ओपिनियन और सांप्रदायिक हिंसा के संवेदनशील मामले में प्रॉसिक्यूशन रोकने पर आपत्ति जताई गई थी.

हालांकि, कैबिनेट की एक उप-समिति ने बाद में इन मामलों को वापस लेने की मंजूरी दे दी, जिससे विभाग की पिछली आपत्तियां और कानूनी चिंताएं प्रभावी रूप से खारिज हो गईं. इसके बाद प्रस्ताव को कैबिनेट के समक्ष रखा गया, जिसने कल अपनी बैठक में इस निर्णय को मंजूरी दे दी.

वहीं इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, भाजपा प्रवक्ता एस. प्रकाश ने कांग्रेस सरकार पर हिंसक तत्वों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, “यह तीसरी बार है जब कांग्रेस सरकार राज्य में गंभीर मामले वापस ले रही है. दंगा और पुलिस थानों को जलाने के प्रयास से जुड़े मामले भी पहले वापस लिए जा चुके हैं. पिछली बार इन मामलों को अदालत में चुनौती दी गई थी और स्थगन आदेश जारी किए गए थे. सरकार ने अतीत के अनुभवों से कोई सबक नहीं सीखा है.”

प्रकाश ने आरोप लगाया कि यह निर्णय कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के दबाव में लिया गया होगा. उन्होंने आरोप लगाया, “यह कदम प्रियांक खरगे या मल्लिकार्जुन खरगे के दबाव में उठाया गया होगा. ऐसे मामलों को वापस लेकर सरकार हिंसा को बढ़ावा दे रही है.”

इधर कैबिनेट के फैसले का बचाव करते हुए कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने कहा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हर मामले की अलग-अलग जांच की गई थी.

कर्नाटक के गृह मंत्री ने कहा, “कैबिनेट उप-समिति में हर मामले पर अलग-अलग चर्चा की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या इसे कानूनी रूप से वापस लिया जा सकता है. समिति ने निष्कर्ष निकाला कि कुछ मामलों को वापस लेने की कानूनी गुंजाइश है. राज्य भर के विभिन्न संगठनों से जुड़े लगभग 52 मामलों की समीक्षा की गई.”

उन्होंने आगे कहा, “यह मामला कल कैबिनेट के समक्ष रखा गया था और कैबिनेट ने फैसला किया कि इन मामलों को वापस लिया जा सकता है. मैं दरगाह मामले के विवरण में नहीं जाऊंगा. इसे वापस लेने का निर्णय कैबिनेट का था. निर्णय लेने से पहले इन सभी पहलुओं पर विचार-विमर्श किया गया था. यह कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं था.”

मंत्री सतीश जारकीहोली ने भी सरकार का बचाव किया और भाजपा के आरोपों की आलोचना की. उन्होंने कहा, “हमने कई मामले वापस लिए हैं. इन मामलों में मुसलमान, किसान, राजनीतिक दलों के नेता और कई अन्य लोग शामिल हैं. जब भी इस तरह के विवाद होते हैं, वे कहते हैं कि केवल मुसलमानों को ही सीधा लाभ हुआ है. यह उनका हमेशा का आरोप है.”
 

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