Biju Patnaik fact check:ओडिशा में एक कहावत बड़ी मशहूर है कि यहां के लोग भगवान जगन्नाथ के बाद यदि किसी का नाम सबसे ज्यादा जानते और आदर से लेते हैं, तो वो हैं बीजू पटनायक....इन दिनों उसी बीजू बाबू को लेकर ओडिशा की सियासत में ऊफान आया हुआ है...क्योंकि बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने बीजू पटनायक पर एक बयान देकर सियासी गलियारों में खलबली मचा दी है. उन्होंने सीधे-सीधे कह दिया है कि 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिकी पैसे और सीआईए की मदद से जंग लड़ी थी. इस पूरे खेल में उन्होंने ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को नेहरू और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के बीच की 'कड़ी' करार दिया.दुबे जी ने इस आरोप में ओडिशा के 'चारबतिया एयरबेस' का भी तड़का लगाया गया है, जिसमें अमेरिकी जासूसी विमानों के अड्डे के तौर पर इसके इस्तेमाल करने की बात कही गई है. अब इस पर सियासत तो खूब हो रही है, लेकिन जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो कहानी दिलचस्प और ज्यादा संजीदा नजर आती है.तो चलिए, ऐतिहासिक दस्तावेजों के हवाले से पड़ताल करते हैं कि आखिर मामला क्या था?

नेहरू के संकटमोचक और 'डैशिंग' पायलट बीजू बाबू
बीजू पटनायक सिर्फ सफेद कुर्ता-पायजामा पहनने वाले राजनेता भर नहीं थे. वे एक बेहद जांबाज और मंझे हुए पायलट भी थे.द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने रॉयल इंडियन एयरफोर्स में रहते हुए और बाद में अपनी कलिंगा एयरलाइंस के जरिए ऐसे-ऐसे हैरतअंगेज कारनामों को अंजाम दिया था कि पंडित नेहरू उनके मुरीद हो गए थे.जब 1947 में पाकिस्तानी कबायलियों ने कश्मीर पर धावा बोला,तो यह बीजू पटनायक ही थे जो खतरों की परवाह न करते हुए डकोटा विमान से सिख रेजिमेंट के जवानों को लेकर सबसे पहले श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतरे थे. इस बात का जिक्र ओडिशा सरकार के आधिकारिक जर्नल 'Odisha Review' (फरवरी-मार्च 2017 अंक) के लेखों में मिलता है. बहरहाल इस वजह से नेहरू के मन में उनकी ऐसी छवि बनी कि जहां भी कोई बड़ा जोखिम होगा, वहां बीजू पटनायक से बेहतर संकटमोचक कोई दूसरा नहीं हो सकता.

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1962 की हार और सीआईए से हाथ मिलाने की मजबूरी
अक्टूबर 1962 में जब चीन ने भारत पर पीठ पीछे हमला किया, तो हमारी फौज को भारी नुकसान उठाना पड़ा. देश के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया था. उस वक्त भारत अपनी 'गुटनिरपेक्षता' की जिद को थोड़े समय के लिए किनारे रखकर मदद के लिए अमेरिका की तरफ देखने को मजबूर हुआ था.मशहूर लेखकों केनेथ कॉन्बॉय और जेम्स मॉरिसन की चर्चित किताब 'The CIA's Secret War in Tibet' के अनुसार, चीनी सेना पर नजर रखने के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने नेहरू से मदद मांगी थी. इस मसले पर पहले तो नेहरू ने इनकार किया लेकिन बाद में परिस्थितियां कुछ ऐसी बदलीं कि वे राजी हो गए. अब चूंकि बीजू पटनायक विमानन और मिलिट्री स्ट्रैटेजी के उस्ताद थे, इसलिए नेहरू ने उन्हें अपनी सरकार के 'रक्षा सलाहकार' के तौर पर इस गुप्त मिशन की कमान सौंपी थी. इसी किताब में दर्ज है कि बीजू पटनायक ने ही आईबी के तत्कालीन चीफ बी.एन. मलिक के साथ मिलकर नेहरू को इस बात के लिए राजी किया था कि तिब्बती युवाओं को मिलाकर एक स्पेशल गोरिल्ला फोर्स बनाई जाए. इसी के बाद 'एस्टेब्लिशमेंट 22' यानी स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) की नींव पड़ी, जिसकी ट्रेनिंग में सीआईए ने भारत की जमकर आर्थिक और हथियारों से मदद की थी.

चारबतिया एयरबेस और यू-2 जासूसी विमानों का असली सच
अब आते हैं उस 'चारबतिया एयरबेस' पर जिसका जिक्र निशिकांत दुबे ने किया है. इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो पता चलेगा कि भारत-चीन सीमा की टोह लेने के लिए सीआईए भारत में अपने अत्याधुनिक 'यू-2' जासूसी विमानों का एक बेस बनाना चाहती थी.'The CIA's Secret War in Tibet' किताब के मुताबिक, शुरुआत में नेहरू भारत की धरती पर सीधे अमेरिकी फौज की मौजूदगी को लेकर बहुत हिचकिचा रहे थे. लेकिन बीजू पटनायक ने कूटनीतिक सूझबूझ दिखाई. वे चाहते थे कि यह बेस ओडिशा के चारबतिया में बने.आखिरकार लंबी माथापच्ची के बाद नेहरू इस शर्त पर राजी हुए कि बेस की कमान भारतीयों के हाथ में ही रहेगी. ओडिशा सरकार के 'Odisha Review' जर्नल के अनुसार, चारबतिया एयरबेस पर बाकायदा एक बड़ा कॉम्प्लेक्स बनाया गया, जहां करीब 60 सीआईए तकनीशियन काम करते थे. दस्तावेजों के मुताबिक, मई 1964 में एक सीआईए के जासूसी विमान ने वहां से उड़ान भी भरी थी, जिसके ब्रेक फेल होने की वजह से वह रनवे से उतर गया था और एक बड़ा हंगामा मचने से बच गया था.
तो क्या बीजू पटनायक सीआईए के 'एजेंट' थे?
अब सबसे बड़ा सवाल. क्या बीजू पटनायक सीआईए से जुड़े हुए थे? जवाब है- बिल्कुल नहीं. वे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के आधिकारिक नुमाइंदे थे. केनेथ कॉन्बॉय की किताब के अनुसार, मार्च 1963 में बीजू पटनायक बकायदा भारत सरकार के दूत बनकर वॉशिंगटन गए थे और वहां उन्होंने पेंटागन और सीआईए के बड़े अधिकारियों के साथ सीधी बातचीत की थी.युद्ध के उस बेहद कठिन दौर में, जब देश की सुरक्षा दांव पर लगी थी, तब अमेरिका से हाथ मिलाना नेहरू सरकार की एक सोची-समझी रणनीतिक मजबूरी थी. बीजू पटनायक ने इस पूरे मामले में एक देशभक्त और कुशल रणनीतिकार की तरह काम किया था, न कि किसी विदेशी एजेंसी के मोहरे के तौर पर. ओडिशा के सीनियर जर्नलिस्ट और एक्सपर्ट गिरिजा शंकर दास बताते हैं कि बीजू पटनायक भारत के सबसे बड़े देशभक्तों में से एक थे. उनका योगदान एविएशन, इंडस्ट्री, पॉलिटिक्स और ग्लोबल डिप्लोमेसी तक था. देश का गर्व उनकी रगों में बसा था और उन्होंने अपनी ज़िंदगी भारत को आज़ाद कराने और ओडिशा को ऊपर उठाने के लिए लगा दी. उन्होंने यह सब एक पायलट, इंडस्ट्रियलिस्ट, पॉलिटिकल लीडर और ग्लोबल ट्रबल शूटर के तौर पर किया. वे नेहरू और सीआईए के बीच की कड़ी जरूर बने, लेकिन वो कड़ी देशहित के लिए जोड़ी गई थी.
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