- बेंगलुरु स्थित गैलैक्स आई ने ‘दृष्टि नाम का सैटेलाइट विकसित किया है जो बादलों और अंधेरे के पार भी देख सकेगा
- दृष्टि सैटेलाइट को स्पेसएक्स के फाल्कन-9 रॉकेट से कैलिफोर्निया से मई 2026 में लॉन्च किया जाएगा
- यह सैटेलाइट मल्टीस्पेक्ट्रल कैमरा और सिंथेटिक एपर्चर रडार तकनीक को एक साथ उपयोग करता है
भारत स्पेस के क्षेत्र में कुछ ऐसा करने जा रहा है जिससे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और चीन के लिए चुनौती बढ़ने वाली है. भारत दुनिया में अपनी तरह का एक बिल्कुल नया सैटेलाइट लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है. इसे बेंगलुरु के स्पेस स्टार्ट-अप ने बनाया है. यह सैटेलाइट बादलों और अंधेरे के पार भी देखने में सक्षम होगा.यह मिशन भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है
क्या है सैटेलाइट दृष्टि, कब होगा लॉन्च?
सैटेलाइट ‘दृष्टि' (Drishti) एक खास तरह का पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट है जिसे बेंगलुरु स्थित गैलैक्स आई (GalaxEye) ने विकसित किया है.यह सैटेलाइट एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के फाल्कन‑9 रॉकेट से लॉन्च किया जाएगा. इसकी लॉन्चिंग कैलिफोर्निया से रविवार, 3 मई 2026 को दोपहर 12:29 बजे (भारतीय समयानुसार) लॉन्च कर दिया गया.
लॉन्च से पहले एनडीटीवी से बातचीत में गैलैक्सआई के सीईओ और संस्थापक सुयश सिंह ने इस मिशन को तकनीकी रूप से ऐतिहासिक बताया. उन्होंने कहा कि भारत को सैटेलाइट डिजाइन करते समय पारंपरिक सोच से हटकर सोचना जरूरी था.सुयश सिंह ने कहा,“इस सैटेलाइट मिशन का नाम ‘दृष्टि' है.हमारे संदर्भ में दृष्टि का मतलब है,हर चीज के पार देख पाना. इस सैटेलाइट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें मल्टीस्पेक्ट्रल कैमरा और SAR इमेजर (सिंथेटिक एपर्चर रडार) दोनों एक ही सैटेलाइट में लगाए गए हैं. यह दुनिया में अपनी तरह का पहला सैटेलाइट है.”यह तकनीक भारत को आपदा प्रबंधन, निगरानी और पृथ्वी अध्ययन के क्षेत्र में नई क्षमता देने वाली मानी जा रही है.

पहले बन जाती तो ऑपरेशन सिंदूर में आती काम
अगर यह सैटेलाइट पहले से काम कर रहा होता, तो भारत ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बमबारी से हुए नुकसान की साफ और सटीक तस्वीरें खुद हासिल कर सकता था और उसे अमेरिकी व्यावसायिक सैटेलाइट्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. दरअसल, मौजूदा ईरान‑इजरायल‑अमेरिका संघर्ष ने यह साफ कर दिया है कि देशों को अपनी खुद की सैटेलाइट निगरानी क्षमता कितनी जरूरी है. अमेरिका ने पहले ही स्पेस कंपनी वैंटोर (पहले मैक्सार) को इस संघर्ष से जुड़ी तस्वीरें साझा करने से रोक दिया था. यह दिखाता है कि भारत को अपनी खुद की अंतरिक्ष‑आधारित निगरानी क्षमता की जरूरत है, और अब वह क्षमता जल्द वास्तविकता बनने जा रही है.
Liftoff! pic.twitter.com/HmS624ScKO
— SpaceX (@SpaceX) May 3, 2026
‘दृष्टि' सैटेलाइट का विचार भारत की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों से ही जन्मा. पश्चिमी देशों के समशीतोष्ण क्षेत्रों (Unlike Temperature Regions) के उलट, भारत का बड़ा हिस्सा उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में, कर्क रेखा के पास स्थित है. यहां बादल अक्सर और लंबे समय तक बने रहते हैं, जिससे पारंपरिक ऑप्टिकल सैटेलाइट्स कई बार जमीन को ठीक से देख ही नहीं पाते.इसी चुनौती को ध्यान में रखकर दृष्टि जैसे उन्नत सैटेलाइट को डिजeइन किया गया है, जो बादलों और अंधेरे के बावजूद धरती की साफ तस्वीरें देने में सक्षम होगा.
कितनी खास होगी ये सैटेलाइट?
सुयश सिंह ने बताया,“हमने पाया है कि भारत एक उष्णकटिबंधीय(Tropical) देश है.यहां पश्चिमी देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा बादल रहते हैं. पश्चिम ने इस तरह की तकनीक के बारे में कभी नहीं सोचा, क्योंकि उन्होंने इस समस्या का सामना नहीं किया. वहां या तो आसमान साफ होता है, या थोड़ी देर के लिए बादल आते हैं और फिर चले जाते हैं.” गैलैक्स आई को सैटेलाइट डिजाइन पर दोबारा सोचने के लिए एक अहम आंकड़े ने मजबूर किया. नासा के एक अध्ययन का हवाला देते हुए सुयश सिंह ने कहा, “किसी भी समय धरती की जमीन का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा बादलों से ढका रहता है, जबकि समुद्रों में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत तक पहुंच जाता है यानी हर दस में से सात सैटेलाइट तस्वीरें बादलों से ढकी होंगी, खासकर उष्णकटिबंधीय इलाकों(Tropical Regions) में.”

उन्होंने कहा कि सैटेलाइट डेटा इस्तेमाल करने वालों के लिए बादल सिर्फ एक परेशानी नहीं, बल्कि आंखों पर पट्टी जैसे होते हैं. चाहे आपदा प्रबंधन, कृषि, इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी हो या सुरक्षा और निगरानी, इन सभी क्षेत्रों को हर हाल में भरोसेमंद और साफ़ तस्वीरों की जरूरत होती है. इसी चुनौती को ध्यान में रखकर दृष्टि जैसे उन्नत सैटेलाइट विकसित किए जा रहे हैं, ताकि बादलों के बावजूद धरती पर नजर रखी जा सके.
सुयश सिंह ने कहा,“इसी वजह से हमारे दिमाग में यह विचार आया कि क्या ऐसा कोई तरीका हो सकता है, जिससे हम बादलों के पार देख सकें और फिर भी उससे सही जानकारी निकाल सकें.” इसका समाधान यह निकला कि अब तक अलग‑अलग इस्तेमाल होने वाली दो सेंसिंग तकनीकों को एक ही सैटेलाइट पर जोड़ा जाए. ऑप्टिकल इमेजिंग साफ और रंगीन तस्वीरें देती हैं,जबकि सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) बादलों के बावजूद और रात के अंधेरे में भी जमीन को देख सकता है.
बड़ा मील का पत्थर
सुयश सिंह ने आगे बताया, “इस सैटेलाइट का वजन करीब 190 किलोग्राम है.” उन्होंने कहा कि इसका लॉन्च भी अपने‑आप में एक बड़ा मील‑पत्थर है.अपनी पहली ही उड़ान के लिए गैलैक्सआई ने एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स को चुना है. सुयश सिंह ने बताया कि हम पहली बार स्पेसएक्स के फाल्कन‑9 रॉकेट का इस्तेमाल कर रहे हैं. अब भारत के लिए भी फाल्कन‑9 कोई नई चीज नहीं रहा है.भारतीय अंतरिक्ष यात्री जैसे ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला से लेकर संचार और पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों तक, कई भारतीय पेलोड अब इस अमेरिकी रॉकेट के जरिए कक्षा में पहुंच रहे हैं. गैलैक्सआई का ‘दृष्टि' सैटेलाइट भी उसी बढ़ती सूची में शामिल हो जाएगा. हालांकि, यह सिर्फ शुरुआत है. ‘दृष्टि' कोई अकेला प्रयोग नहीं है. यह एक महत्वाकांक्षी उपग्रह समूह (कांस्टेलेशन) का पहला सदस्य है, जो आगे चलकर भारत को स्वदेशी, भरोसेमंद और हर मौसम में काम करने वाली अंतरिक्ष निगरानी क्षमता प्रदान करेगा.

9 और सैटेलाइट्स लाइन में
सुयश सिंह ने कहा,“हम एक पूरा सैटेलाइट कांस्टेलेशन बनाने जा रहे हैं. पहले सैटेलाइट की सफलता के बाद इसके आगे नौ और सैटेलाइट्स लॉन्च किए जाएंगे.” उन्होंने कहा,“यह न सिर्फ भारत का सबसे भारी निजी उपग्रह है, बल्कि मैं यह भी कहूंगा कि यह भारत के सबसे उच्च‑रिजॉल्यूशन सैटेलाइट्स में से एक है.” रिजॉल्यूशन ही वह क्षेत्र है, जहां ‘दृष्टि' दुनिया की सबसे अच्छे सिस्टम्स से मुकाबला करने की तैयारी में है. सीरीज का पहला सैटेलाइट करीब 1.5 मीटर रिजॉल्यूशन की इमेजरी देगा, जो भारत की कई मौजूदा SAR प्रणालियों में प्रचलित पांच मीटर रिजॉल्यूशन से कहीं अधिक स्पष्ट है.

सुयश सिंह ने आगे बताया, “पहला सैटेलाइट हम 1.5 मीटर रिजॉल्यूशन के साथ लॉन्च कर रहे हैं, जबकि आम तौर पर 5 मीटर रिजॉल्यूशन होता है.इसके बाद आने वाले कांस्टेलेशन में हम रिजॉल्यूशन को और बेहतर करेंगे. हम 0.5 मीटर से लेकर 0.3 मीटर तक पहुंचने की कोशिश करेंगे.” इस तरह ‘दृष्टि' कार्यक्रम भारत को अत्याधुनिक, उच्च‑गुणवत्ता वाली और हर मौसम में काम करने वाली पृथ्वी निगरानी क्षमता देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
सबसे अहम बात यह है कि दोनों सेंसिंग सिस्टम एक‑दूसरे के बराबर क्षमता वाले हैं. सुयश सिंह ने कहा,“इस सैटेलाइट की खासियत यह है कि दोनों सिस्टम ऑप्टिकल और SAR एक जैसी रिजॉल्यूशन देते हैं यानी 1.5 मीटर मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजरी और 1.5 मीटर SAR इमेजिंग.”
तकनीकी संप्रभुता के इस दौर में गैलैक्स आई ने अपनी इस तकनीक को शुरुआत से खुद विकसित किया है और पूरी तरह सुरक्षित भी रखा है.इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी पर पूछे जाने पर सुयश सिंह ने कहा,“यह हमारा अपना पेटेंट है और यह एक वैश्विक पेटेंट भी है.” उन्होंने कहा,“यह दुनिया के लिए गोल्ड स्टैंडर्ड बन सकता है.यह ऐसा काम है, जो पूरी तरह भारत में किया गया है और जिसे दुनिया में पहले कभी आजमाया नहीं गया. हम अन्य देशों के लिए भी संप्रभु सैटेलाइट कांस्टेलेशन स्थापित करने को तैयार हैं.” इस निजी अंतरिक्ष उपलब्धि की जड़ें शैक्षणिक जगत से जुड़ी हैं. गैलैक्सआई को IIT मद्रास में इनक्यूबेट किया गया, जो अब चुपचाप कई डीप‑टेक स्पेस स्टार्ट‑अप्स का केंद्र बन चुका है. रॉकेट से लेकर सैटेलाइट तक, IIT मद्रास यह साबित कर रहा है कि अब क्लासरूम और कैंपस लैब्स सीधे अंतरिक्ष तक पहुंच बना सकते हैं.

इसरो के पूर्व चीफ ने भी पढ़े कसीदे
भारत के अंतरिक्ष नेतृत्व की नजर से यह बदलाव छुपा नहीं रहा है. इस लॉन्च के व्यापक महत्व पर रोशनी डालते हुए इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एस. सोमनाथ ने कहा, “भारत का स्पेस स्टार्ट‑अप सेक्टर अब नवाचार के साथ परिपक्व हो रहा है. गैलैक्स आई एक ऐसा अनोखा सैटेलाइट लॉन्च करने जा रहा है, जिसमें दिन‑रात देखने की क्षमता वाले रडार और ऑप्टिकल इमेजिंग का संयोजन है और वह भी स्पेसएक्स के फाल्कन‑9 रॉकेट के जरिए.भारतीय स्पेस स्टार्ट‑अप्स को मजबूत करने में इसरो के समर्थन के अब ठोस नतीजे दिख रहे हैं. भारत के प्रतिभाशाली युवा अपनी क्षमता साबित कर रहे हैं.”
एक बार कक्षा में पहुंचने के बाद, दृष्टि 24×7 इमेजरी उपलब्ध करा सकेगा. अब बादल या अंधेरा कोई बहाना नहीं रहेगा. यह सैटेलाइट शांत तरीके से सीमाओं के पार एक स्पष्ट संदेश भी देता है, जब आसमान में निगरानी लगातार बनी रहती है, तो अनिश्चितता और अचानक चौंकाने वाली घटनाओं की गुंजाइश कम हो जाती है. कैलिफोर्निया से होने वाले इस लॉन्च की तैयारी के साथ, यह फाल्कन‑9 मिशन सिर्फ एक प्रक्षेपण नहीं है. यह संकेत है कि भारतीय निजी स्पेस स्टार्ट‑अप्स अब वैश्विक मंच पर पहुंच चुके हैं.सिर्फ बड़े सपनों के साथ नहीं, बल्कि मौलिक और अत्याधुनिक तकनीक के साथ. IIT मद्रास के एक इनक्यूबेटर से लेकर स्पेसएक्स के लॉन्च पैड तक, ‘दृष्टि' की यह यात्रा भारत की अंतरिक्ष गाथा के एक नए अध्याय का प्रतीक बन चुकी है.
यह भी पढ़ें- अब मोबाइल पर आएगा भारी बारिश का अपडेट: जानें Mausam ऐप इस्तेमाल करने का सही तरीका
यह भी पढ़ें- ग्रीनफील्ड सैटेलाइट टाउनशिप में स्टेकहोल्डर बनेंगे किसान, जानें क्या है प्रावधान...55 प्रतिशत जमीन मिलेगी वापस
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं