- लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान स्पीकर के आसन पर बैठने के नियमों को लेकर विपक्ष ने आपत्ति जताई
- गोगोई ने सवाल उठाया कि अविश्वास प्रस्ताव के समय स्पीकर या डिप्टी स्पीकर की गैरमौजूदगी में चेयर पर कौन बैठेगा
- अमित शाह ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुसार स्पीकर का कार्यालय अविश्वास प्रस्ताव के दौरान भी सक्रिय रहता है
लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर महाबहस शुरू होते ही सदन के आसन पर बैठने से जुड़े नियमों को लेकर काफी बहस हुई. कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने आरोप लगाया कि सदन में नियमों का उल्लंघन हो रहा है. सदन में ये कैसे तय हुआ कि स्पीकर या डिप्टी स्पीकर की गैरमौजूदगी में कौन चेयर पर आसीन होगा. जब चेयर पर बैठे सांसद जगदंबिका पाल के बार-बार समझाने पर विपक्षी सांसद नहीं माने तो तो गृह मंत्री अमित शाह सीट से खड़े हुए और कहा कि कांग्रेस सांसद नियमों की गलत व्याख्या कर रहे हैं. अविश्वास प्रस्ताव के दौरान भी स्पीकर का कार्यालय अपना काम करता रहता है.
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने भाषण में पहले नबाम रेबिया बनाम डिप्टी स्पीकर केस में सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का उल्लेख किया. स्पीकर को निष्पक्ष, पारदर्शी और पक्षपातरहित होना चाहिए. जो भी स्पीकर होते हैं या उसकी चेयर पर होते हैं. आर्टिकल 96 से ये चर्चा की शुरुआत हुई, जिसमें कहा गया है कि अविश्वास प्रस्ताव के दौरान स्पीकर या डिप्टी स्पीकर उपस्थित नहीं रह सकता. लेकिन उस दौरान कोई आसन पर बैठेगा, ये कैसे तय हुआ कि. हम इस बात पर कठोर आपत्ति दर्ज करते हैं. पैनल पर चेयरपर्सन के पैनल में कौन बैठेगा, ये तय नहीं हुआ है. नियमों के मुताबिक, ये सदन तय करेगा कि कौन चेयर पर बैठेगा. इस पर जगदंबिका पाल ने कहा, भले ही मोहम्मद जावेद ने प्रस्ताव दिया था, लेकिन उन्होंने गौरव गोगोई को इसी भावनाओं के आधार पर सबसे पहले बोलने का मौका दिया है.
गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, मैं इनको टोकना नहीं चाहता था. संविधान के अंदर प्रिसाइड शब्द का जो प्रयोग किया गया है, उससे स्पीकर का कार्यालय खत्म नहीं होता है. ये गलत व्याख्या की जा रही है. सदन भंग भी हो जाए और चुनाव के दौरान तब भी स्पीकर का पद रहता है, जब तक कि चुनाव के बाद नए स्पीकर का चुनाव न हो जाए. ये गलत व्याख्या की जा रही है.
सदन में आसन पर बैठे जगदंबिका पाल ने कहा कि सदन भंग भी हो जाए, तब भी स्पीकर का पद रहता है. जब तक नए सरकार का गठन न हो जाए या नए स्पीकर का चयन न हो जाए. 95(2) के अनुसार, सदन यह तय करता है कि ऐसे प्रस्ताव के दौरान कौन आसन पर बैठेगा. अभी जो आसन पर बैठने का फैसला किया गया है, वो स्पीकर की शक्ति इस्तेमाल की गई है.
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गौरव गोगोई ने कहा, पहले भी जब ऐसा अविश्वास प्रस्ताव आया है तो डिप्टी स्पीकर पद पर बैठता है. देश में 200 से ज्यादा विपक्षी सांसद होते हुए भी आज डिप्टी स्पीकर नहीं है, ये दिखाता है कि कैसे सदन चल रहा है. सदन में माइक भी अस्त्र बन गया है. सत्ता पक्ष का ये हथियार बन गया है और नेता विपक्ष को भी मौका नहीं दिया जाता है.
गोगोई ने कहा, ये प्रस्ताव किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है. व्यक्तिगत तौर पर ओम बिरला का रिश्ता सभी सदस्यों के साथ अच्छा है. हम दुखी हैं. लेकिन हमारा धर्म है कि संसद की मर्यादा को बचाना. इसीलिए हम ये प्रस्ताव लाए हैं. कोई संसद के हर सदस्य का कर्तव्य है कि हम सदन की गरिमा बनाए रखें. हम ओम बिरला पर आक्रमण नहीं करना चाहते हैं. हम संविधान, लोकतंत्र में विश्वास कायम रखने के लिए नो कॉन्फिडेंस मोशन ला रहे हैं.
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प्रधानमंत्री भी कहते हैं कि ये सदन लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है, ये सदन किसी धर्म,जाति, लिंग से परे है. ये सबके लिए खुला है. सदन के संचालन में अध्यक्ष की भूमिका काफी अहम हो जाती है. स्पीकर का क्या दायरा होना चाहिए, तो इसमें यह कहा गया है कि संवैधानिक नैतिकता निष्पक्षता की मांग रखती है. स्पीकर सरकार की आवाज नहीं है, बल्कि सदन का संरक्षक है. फिर चाहे नेता सदन हो या नेता प्रतिपक्ष या कोई और सांसद. सबके संरक्षण की जिम्मेदारी स्पीकर पर होती है. जीवी मावलंकर से लेकर सोमनाथ चटर्जी तक इसके उदाहरण हैं. जबकि गौरव गोगोई ने कहा, लोकसभा में स्पीकर को धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान नहीं बोलने दिया गया. 20 बार व्यवधान किया गया.
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