"मंत्री साहब, गांव में चिट्टा बिक रहा है. मेरा बेटा भी नशा करता है. तीन लड़कों की मौत हो चुकी है..." यह शिकायत एक दलित मजदूर ने पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल चीमा से की थी. गांव वालों के बीच खड़े होकर उसने सरकार के सामने वही सवाल रख दिया, जो पंजाब में हजारों परिवार पूछ रहे हैं. लेकिन कुछ दिनों बाद उस व्यक्ति की मौत हो जाती है. मरने से पहले रिकॉर्ड किए गए वीडियो में वह दबाव और प्रताड़ना की बात करता है. इसके बाद शुरू होता है आरोप-प्रत्यारोप का दौर. विपक्ष इसे दलित आवाज दबाने का मामला बता रहा है, AAP इसे राजनीतिक साजिश कह रही है. लेकिन इन सबके बीच एक सवाल अब भी कायम है. जिस व्यक्ति ने नशे की शिकायत की थी, उस गुलजार सिंह की बात आखिर सुनी क्यों नहीं गई? अब यह मुद्दा सरकार के नशा विरोधी अभियान, दलित राजनीति और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले जवाबदेही की बहस के केंद्र में आ चुका है.
कौन थे गुलजार सिंह और क्या था आरोप?
गुलजार सिंह संगरूर जिले के तूर बंजारा गांव के रहने वाले थे. यह इलाका मुख्यमंत्री भगवंत मान और वित्त मंत्री हरपाल चीमा का राजनीतिक गढ़ भी माना जाता है. परिवार के मुताबिक, गुलजार लंबे समय से गांव में बिक रहे नशे को लेकर परेशान थे. उनका अपना बेटा भी नशे की चपेट में था. उन्होंने कई बार गांव में नशे की बिक्री को लेकर चिंता जताई थी. 6 सितंबर को जब वित्त मंत्री हरपाल चीमा गांव पहुंचे तो गुलजार ने सार्वजनिक तौर पर उनसे सवाल कर दिया. उनका कहना था कि गांव में चिट्टा और हेरोइन खुलेआम बिक रही है, कई युवा नशे की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं और उनका अपना बेटा भी इसकी गिरफ्त में है.
गुलजार के सवाल के बाद क्या हुआ?
दरअसल यहीं से विवाद की शुरुआत हुई. परिवार और विपक्ष का आरोप है कि मंत्री के कार्यक्रम में सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाने से कुछ स्थानीय नेता और पंचायत प्रतिनिधि नाराज हो गए. बाद में गुलजार पर दबाव बनाया गया और उनसे माफी मांगने को कहा गया. परिजनों का कहना है कि उन्हें लगातार परेशान किया गया. आरोप है कि इसी कथित दबाव और प्रताड़ना वजह से गुलजार ने जहरीला पदार्थ खा लिया. मामला इसलिए और गंभीर हो गया क्योंकि मौत से पहले उन्होंने एक वीडियो रिकॉर्ड किया. इस वीडियो में उन्होंने कुछ लोगों के नाम लिए और दावा किया कि उन पर दबाव बनाया जा रहा था. इसके बाद इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई और मामला पूरे पंजाब में चर्चा का विषय बन गया.
AAP के 'युद्ध नशे के विरुद्ध' अभियान पर सवाल
गुलजार की मौत ने सरकार के नशा विरोधी अभियान पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.
विपक्ष का तर्क है कि करोड़ों रुपये खर्च कर अभियान चलाने का क्या मतलब, अगर जमीन से आने वाली ऐसी शिकायतों को गंभीरता से ही न लिया जाए.
दलित राजनीति का नया मुद्दा क्यों बन गया मामला?
गुलजार दलित समुदाय से आते थे. पंजाब में दलित आबादी करीब 32 फीसदी मानी जाती है, जो देश में सबसे ज्यादा है. यही वजह है कि विपक्ष इस मामले को दलित सम्मान से जोड़कर उठा रहा है. विपक्ष का आरोप है कि AAP दलितों की बात तो करती है, लेकिन जब एक दलित व्यक्ति ने सरकार से सवाल पूछा तो उसकी आवाज को नजरअंदाज कर दिया गया. कई विपक्षी नेताओं ने यह भी याद दिलाया है कि AAP ने पंजाब में दलित उपमुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था, जो कभी पूरा नहीं हुआ. गुलजार सिंह की मौत के बाद भाजपा, कांग्रेस और अकाली दल के नेताओं ने परिवार से मुलाकात की. भाजपा नेता तरुण चुघ ने आरोप लगाया कि गुलजार ने वित्त मंत्री के सामने नशे की बिक्री की बात उठाई थी, लेकिन नशा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय परिवार पर ही दबाव बनाया गया.वहीं कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने सवाल उठाया कि जब एक व्यक्ति मरने से पहले वीडियो में किसी मंत्री का नाम ले रहा है तो कम से कम मामले की निष्पक्ष जांच और FIR तो होनी चाहिए.पायलट ने यह भी कहा कि नशा खत्म करने के AAP सरकार के वादे जमीन पर दिखाई नहीं दे रहे हैं.
FIR में कौन-कौन है, और कौन नहीं?
पुलिस ने सरपंच, उसके पति और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है. लेकिन वित्त मंत्री हरपाल चीमा का नाम FIR में नहीं है. यही बात विपक्ष को सबसे ज्यादा हमला करने का मौका दे रही है. कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने सवाल उठाया है कि अगर दूसरे मामलों में मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है तो यहां अलग रवैया क्यों अपनाया जा रहा है. कांग्रेस अब हरपाल चीमा के इस्तीफे की मांग कर रही है.
हरपाल चीमा ने क्या कहा?
हरपाल चीमा ने सभी आरोपों को खारिज किया है. उनका कहना है कि विपक्ष एक दुखद घटना पर राजनीति कर रहा है. उन्होंने कहा कि उनके पास हर आरोप का जवाब देने के लिए पर्याप्त सबूत हैं और जांच पूरी होने के बाद वे अपना पक्ष सार्वजनिक करेंगे. चीमा का यह भी कहना है कि किसी के आरोप लगा देने भर से किसी मंत्री को दोषी नहीं माना जा सकता. साथ ही उन्होंने पंजाब में नशे की समस्या के लिए पिछली अकाली दल-BJP सरकारों को जिम्मेदार ठहराया.
भगवंत मान भी बचाव में उतरे
मुख्यमंत्री भगवंत मान भी अपने वित्त मंत्री के समर्थन में सामने आए हैं. मान ने विपक्ष पर "गिद्ध राजनीति" करने का आरोप लगाया और कहा कि विपक्ष हर दुखद घटना को राजनीतिक मुद्दा बनाना चाहता है. उन्होंने कहा कि पंजाब के विकास और भविष्य पर बात करने की बजाय विपक्ष सिर्फ इस्तीफों की राजनीति कर रहा है. बहरहाल गुलजार सिंह की मौत की जांच अभी जारी है, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह मामला AAP सरकार के लिए असहज सवाल खड़े कर चुका है. एक तरफ सरकार कहती है कि उसने नशे के खिलाफ निर्णायक लड़ाई छेड़ रखी है. दूसरी तरफ विपक्ष पूछ रहा है कि अगर गांव का एक व्यक्ति खुद मंत्री के सामने नशे की शिकायत कर रहा था, तो उसकी बात पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यही वजह है कि यह मामला अब एक गांव या एक व्यक्ति की मौत तक सीमित नहीं रह गया है. यह पंजाब में नशे, सत्ता, दलित राजनीति और सरकार की जवाबदेही से जुड़ी बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है. और शायद इसी वजह से सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है, जो गुलजार सिंह ने मंत्री के सामने खड़े होकर पूछा था... अगर नशे के खिलाफ युद्ध चल रहा है, तो गांव में चिट्टा आज भी खुलेआम क्यों बिक रहा है?
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