- भारत G7 का स्थायी सदस्य नहीं है, इसके बावजूद लगभग हर साल भारत को इसके समिट में आमंत्रित किया जाता है.
- सात सबसे अमीर विकसित देशों को अपने समिट के लिए भारत की जरूरत पड़ती है, आइए समझते हैं.
- भारत सिर्फ एक मेहमान की तरह G7 में शामिल नहीं होता, बल्कि वह वैश्विक एजेंडा तय करने में अहम भूमिका निभाता है.
G7 Summit: आज की तारीख में वैश्विक राजनीति का एक नियम बेहद साफ हो चुका है— दुनिया के सबसे अमीर देशों का समूह 'G7' भले ही बंद कमरों में कितनी भी बड़ी बैठकें कर ले, लेकिन जब तक उस टेबल पर भारत की मौजूदगी नहीं होती, तब तक वैश्विक फैसले अधूरे माने जाते हैं. भारत G7 का स्थायी सदस्य नहीं है, इसके बावजूद लगभग हर साल भारत के प्रधानमंत्री को इस शिखर सम्मेलन में 'विशेष अतिथि' के रूप में आमंत्रित किया जाता है. आखिर ऐसा क्यों है? क्यों सात सबसे अमीर विकसित देशों को हर बड़े फैसले के लिए भारत की जरूरत पड़ती है? आइए इसके पीछे के बड़े कारणों को समझते हैं.
ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज
G7 मूल रूप से पश्चिमी और अमीर देशों (जैसे अमेरिका, यूके, जर्मनी, फ्रांस, इटली, कनाडा और जापान) का क्लब है. इन देशों की नीतियां अक्सर विकासशील और गरीब देशों की जमीनी हकीकत से दूर होती हैं. भारत आज अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के उन देशों की मजबूत आवाज बन चुका है जिनकी बात वैश्विक मंचों पर दबा दी जाती है. G7 को यह अच्छी तरह पता है कि अगर उन्हें पूरी दुनिया पर असर डालने वाले फैसले लेने हैं, तो उन्हें भारत के जरिए 'ग्लोबल साउथ' को विश्वास में लेना ही होगा.

दुनिया का सबसे बड़ा बाजार और आर्थिक इंजन
ब्रिटेन को पीछे छोड़कर भारत आज दुनिया की 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जल्द ही एक बार फिर से चौथी और तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने की क़ाबलियत रखता है. 140 करोड़ से अधिक की आबादी के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है. डिजिटल क्रांति (जैसे UPI) और मजबूत मैन्युफैक्चरिंग हब के कारण वैश्विक मंदी के दौर में भी भारत दुनिया के लिए एक 'ग्रोथ इंजन' की तरह काम कर रहा है. ऐसे में वैश्विक अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन की स्थिरता के लिए भारत को नजरअंदाज करना नामुमकिन है.
'ड्रैगन' को संतुलित करने की मजबूरी
इस बात को सार्वजनिक मंचों पर खुलकर कोई नहीं बोलता, लेकिन डिप्लोमेसी की दुनिया में यह सबसे बड़ा सच है. आज अमेरिका और यूरोपीय देशों के सामने चीन की आक्रामक नीतियां और उसका बढ़ता दबदबा सबसे बड़ी चुनौती है. इंडो-पैसिफिक (Indo-Pacific) क्षेत्र में चीन के वर्चस्व को चुनौती देने और उसे संतुलित करने की क्षमता सिर्फ भारत के पास है. अमेरिका और यूरोपीय देशों के लिए भारत एक रणनीतिक साझेदार है. इसलिए, चीन को कड़ा संदेश देने और एशिया में लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने के लिए G7 भारत को अपने सबसे करीब रखना चाहता है.
क्लाइमेट चेंज की लड़ाई भारत के बिना अधूरी
पर्यावरण और ग्रीन एनर्जी को लेकर G7 देश जितने भी बड़े-बड़े वादे करते हैं, वे भारत के सहयोग के बिना कभी पूरे नहीं हो सकते. भारत ने न सिर्फ अपने घरेलू स्तर पर रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) को तेजी से अपनाया है, बल्कि 'इंटरनेशनल सोलर एलायंस' (ISA) जैसी वैश्विक पहलों का नेतृत्व भी किया है. दुनिया का कार्बन उत्सर्जन कम करना हो या सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लक्ष्य हासिल करने हों, भारत की भागीदारी अनिवार्य है.

सबसे बड़ा लोकतंत्र और विश्वसनीय साझेदार
G7 देश खुद को लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों का रक्षक बताते हैं. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. रूस-यूक्रेन युद्ध हो या मध्य-पूर्व का संकट, भारत ने हमेशा शांति, कूटनीति और बातचीत का पक्ष लिया है. भारत की 'गुटनिरपेक्ष' और संतुलित विदेश नीति के कारण दुनिया का हर गुट भारत का सम्मान करता है, जो उसे एक बेहद विश्वसनीय और निष्पक्ष साझेदार बनाता है.
भारत की 'नो-नॉनसेन्स' विदेश नीति
आज का भारत किसी के दबाव में आकर अपनी विदेश नीति तय नहीं करता. रूस-यूक्रेन का मामला हो या मिडल-ईस्ट का संकट, भारत ने हमेशा खुलकर और निष्पक्ष होकर कहा है कि रास्ता युद्ध से नहीं, बल्कि कूटनीति और बातचीत से निकलेगा. हमारी छवि एक ऐसे देश की है जो सबके साथ रिश्ते निभाता है लेकिन अपनी शर्तों पर. सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते हमारी यही विश्वसनीयता भारत को इस मंच पर सबसे अलग और मजबूत बनाती है.
एजेंडा टेकर नहीं, अब एजेंडा सेटर है नया भारत
आज का भारत सिर्फ एक मेहमान की तरह G7 में शामिल नहीं होता, बल्कि वह वैश्विक एजेंडा तय करने में एक अहम भूमिका निभाता है. चाहे वह फूड सिक्योरिटी (खाद्य सुरक्षा) की बात हो, या वैश्विक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की—भारत टेबल पर सिर्फ अपनी समस्याएं लेकर नहीं जाता, बल्कि उनके समाधान लेकर बैठता है.
सीधे शब्दों में कहें तो, बिना भारत के आज G7 का हर फैसला सिर्फ कागज पर रह जाएगा, जमीन पर नहीं. पश्चिम के देश यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि दुनिया का भविष्य अब सिर्फ उनके हाथ में नहीं, बल्कि भारत जैसी उभरती ताकतों के हाथ में है.
यह भी पढ़ें - 'मैं मोदी जितना शांत नहीं हूं...,' डोनाल्ड ट्रंप ने G7 समिट में की पीएम मोदी की तारीफ
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं