- सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने ब्रेकफास्ट मीटिंग से संदेश दिया कि वो पुरानी बातों को भुलाकर आगे बढ़ रहे हैं
- सूत्रों के अनुसार, शिवकुमार को टॉप पोस्ट मिलने की पूरी संभावना है और यह बदलाव मार्च-अप्रैल तक हो सकता है
- समझौते के मुताबिक, शिवकुमार को सत्ता मिलने तक चुप रहना होगा, बदले में वफादारों को ज्यादा कैबिनेट पद मिलेंगे
कर्नाटक में कु्र्सी को लेकर सीएम सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच खींचतान शनिवार को ब्रेकफास्ट मीटिंग के बाद नया मोड़ लेती दिख रही है. सूत्रों के मुताबिक, दोनों नेताओं की तनातनी एक समझौता फॉर्मूला के तहत सुलझती दिख रही है. फाइनल तस्वीर तो कांग्रेस हाईकमान की मुहर के बाद सामने आएगी. लेकिन इस फॉमूले से कर्नाटक के सियासी नाटक का फिलहाल पटाक्षेप होने की उम्मीद बढ़ गई है.
सिद्धारमैया-डीके की ब्रेकफास्ट मीटिंग में बनी बात
सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने शनिवार सुबह ब्रेकफास्ट मीटिंग से संदेश दिया कि दोनों अब पुरानी बातों को भुलाकर आगे बढ़ रहे हैं. यह मुलाकात तनावपूर्ण संबंधों को दरकिनार कर सद्भाव दिखाने के लिहाज से अहम थी. विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक महज दिखावा नहीं थी बल्कि तनाव घटाने का एक सफल प्रयास थी, जिसमें जल्द से जल्द सत्ता के सुचारु हस्तांतरण की प्रबल संभावना है. सूत्रों के अनुसार, इसके तहत शिवकुमार के टॉप पोस्ट पर आसीन होने की पूरी संभावना है और यह बदलाव आगामी मार्च-अप्रैल तक हो सकता है.
'सत्ता मिलने तक चुप रहें डीके, मिलेंगे ज्यादा मंत्री'
इस समझौता फॉर्मूला के तहत बताया जा रहा है कि डीके शिवकुमार को सत्ता हस्तांतरण होने तक चुप्पी बनाए रखनी होगी और उपमुख्यमंत्री पद से ही संतोष करना होगा. सूत्रों के मुताबिक, इसके बदले में शिवकुमार के वफादार विधायकों को कैबिनेट में ज्यादा पद दिए जाएंगे. इसके अलावा वह कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष भी बने रहेंगे.
'सिद्धारमैया को 2028 में डीके का सपोर्ट करना होगा'
सूत्रों का कहना है कि फॉर्मूले के तहत 2028 के अगले चुनाव में सिद्धारमैया को डीके की लीडरशिप का समर्थन करना होगा. सिद्धारमैया पहले ही कह चुके हैं कि यह उनका अंतिम कार्यकाल होगा. सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री इस समझौते के पक्ष में इसलिए हैं क्योंकि वह अपनी विरासत को मजबूत करके कर्नाटक के सबसे बड़े नेताओं में से एक के रूप में सकारात्मक विदाई चाहते हैं.
सिद्धारमैया की नाराजगी पार्टी को पड़ सकती है भारी
इस समझौते को मानना शिवकुमार की भी मजबूरी है क्योंकि तुरंत तख्तापलट के लिए उनके पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है. वहीं कांग्रेस पार्टी यह जानती है कि सिद्धारमैया जैसे अनुभवी और वरिष्ठ नेता को इस तरह हटाना पार्टी को राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है. ऐसे हालात में शिवकुमार ने यह समझौता बेस्ट डील लगती है.
समझौता कितना सफल, इन बातों से होगा तय
क्या ये समझौता फार्मूले सफल हो पाएगा, यह कुछ बातों पर निर्भर करेगा. यही चीजें तय करेंगी कि सत्ता का हस्तांतरण सुचारु होगा या मुश्किलों भरा.
- 1. क्या शिवकुमार को सिद्धारमैया पर अपना वादा निभाने के लिए भरोसा हो पाएगा? क्योंकि कर्नाटक की राजनीति में सत्ता-साझेदारी पर अंतिम समय में अप्रत्याशित बदलाव का इतिहास रहा है.
- 2. आलाकमान की भूमिका भी अहम होगी. इस सवाल का जवाब ढूंढना होगा कि क्या दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान 2028 के चुनाव से पहले समय पर यह सत्ता हस्तांतरण सुनिश्चित कर पाएगा?
- 3. तीसरा अहम पहलू है जातिगत समीकरण. सिद्धारमैया को 'अहिंदा' राजनीति का सबसे शक्तिशाली चेहरा माना जाता है, जो लिंगायत और OBC वोक्कालिगा के प्रभुत्व को चुनौती देते हैं. वहीं शिवकुमार को ओबीसी वोक्कालिगा समुदाय का प्रतिनिधि माना जाता है. ऐसे में कांग्रेस के लिए दोनों में से किसी को भी नाराज करना महंगा साबित हो सकता है.
बता दें कि सीएम आवास पर ब्रेकफास्ट मीटिंग के बाद सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने संयुक्त रूप से कहा था कि उनके बीच कोई मतभेद नहीं है. हम एक हैं और 2028 के विधानसभा चुनावों के लिए मिलकर काम करेंगे. सीएम ने कहा कि हाल के दिनों में कुछ कन्फ्यूजन पैदा हुआ है, इसलिए हम साथ बैठे और चर्चा की. हमारा मकसद 2028 का विधानसभा चुनाव और आगामी निकाय चुनाव जीतना है. सिद्दारमैया ने कहा कि हाईकमान जो भी तय करेगा, हम उसे मानेंगे.
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