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55 मिनट में दिल्ली-मेरठ: नमो भारत कॉरिडोर एनसीआर की ट्रांसपोर्ट क्रांति की शुरुआत, बनेगा बड़ा गेमचेंजर

नमो भारत कॉरिडोर एनसीआर को एक सुपर-कनेक्टेड मेगारीजन में बदलने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है. इसे ट्रांसपोर्ट रिवोल्यूशन क्यों कहा जा रहा है? एनसीआर में और कितने मेगा ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट चल रहे हैं? रिजनल रैपिट ट्रांजिट सिस्टम क्यों बनाए जा रहे हैं?

55 मिनट में दिल्ली-मेरठ: नमो भारत कॉरिडोर एनसीआर की ट्रांसपोर्ट क्रांति की शुरुआत, बनेगा बड़ा गेमचेंजर
  • अब दिल्ली से मेरठ तक की यात्रा एक घंटे में हुआ करेगी जो रोजाना यात्रियों के लिए गेमचेंजर है.
  • यह केवल सफर का समय ही नहीं बल्कि लाइफस्टाइल और अर्थव्यवस्था को भी बदलेगा.
  • साथ ही यह प्रदूषण भी रोकेगा. आरआरटीएस को मल्टी सिटी ग्रोथ इंजन के रूप में देखा जा रहा है.
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रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस नमो-भारत कॉरिडोर का उद्घाटन किया है वो भारत के ट्रांसपोर्ट सेक्टर में वैसा ही मोड़ ला सकता है जैसा कि मेट्रो ने 2000 के दशक में लाया था. 2016 के आकलन के अनुसार दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ के बीच रोज करीब 6.9 लाख लोग सफर किया करते थे. इनमें 63% निजी वाहनों पर निर्भर थे. पीक आवर में 80 किलोमीटर दूरी तय करने में 3 से 4 घंटे तक लग जाया करते थे, यानी ट्रैफिक सिस्टम पर क्षमता से अधिक लोड था. सड़क ट्रैफिक का औसत दैनिक वॉल्यूम अलग-अलग लोकेशन पर 58,000–1,02,000 वाहन प्रतिदिन पाया गया. यानी बहुत पहले से ही भारी डिमांड मौजूद थी, लेकिन तेज, भरोसेमंद और हाई-कैपेसिटी ट्रांजिट की कमी थी.

अब जबकि नया सिस्टम अपनी रफ्तार में आ गया है तो यह ट्रैफिक के एक बहुत बड़े हिस्से को संभालेगा. इस कॉरिडोर चालू होने पर शुरू-शुरू में करीब 1.67 लाख दैनिक यात्रियों के सफर करने का अनुमान था, जिसके पूरी लाइन चालू होने पर 8 लाख यात्री प्रतिदिन तक पहुंचने का अनुमान जताया गया है.

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इसे ट्रांसपोर्ट रिवोल्यूशन क्यों कहा जा रहा है?

समय में भारी कटौतीः दिल्ली से मेरठ की यात्रा अब तक सकड़ पर ट्रैफिक की मौजूदगी पर निर्भर थी. इसमें अमूमन डेढ़ से ढाई घंटे तक लगा करता था. अब दिल्ली से मेरठ तक की यात्रा एक घंटे में हुआ करेगी जो रोजाना यात्रियों के लिए गेमचेंजर है. 160 किलोमीटर प्रति घंटा ऑपरेशन स्पीड वाली यह भारत की पहली रीजनल ट्रेन है. यह दिल्ली मेट्रो से भी तेज है. इसमें केवल 55 मिनट में 82 किलोमीटर का सफर तय किया जाएगा.

ऑटोमैटिक कंट्रोल, सेफ्टी सिस्टम, प्रीमियम कोच इसे वर्ल्ड क्लास सुविधाओं का सफर बनाएंगे. इसमें मल्टी-मोड इंटीग्रेशन है यानी मेट्रो, बस, रेलवे, रिजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) एक ही नेटवर्क में मिलेगा वो भी सफर में बिना किसी रुकावट के. इसका दूरगामी फायदा डेली कम्यूट करने वाले मॉडल को बदलने में भी होगा. यानी दूसरे शहर में नौकरी करने के बाद रोज घर लौटा जा सकेगा. तो सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि आपकी 'वर्क सिटी' और 'होम सिटी' अलग-अलग हो सकती है. 

इसमें कम्यूट करने वालों को ट्रैफिक की समस्या से छुटकारा मिलेगा. जो लोग सड़कों से नमो भारत में शिफ्ट होंगे उनका न केवल समय बचेगा बल्कि ट्रैफिक के झंझट से छुटकारा भी मिलेगा और सड़कों पर निजी वाहनों के कम होने से प्रदूषण भी घटेगा. कलु मिलाकर इसे भविष्य का हाई-स्पीड रीजनल नेटवर्क प्रोटोटाइप कहें तो गलत नहीं होगा.

इतना ही नहीं यह ट्रेन केवल यातायात का साधन नहीं बल्कि लाइफस्टाइल के साथ साथ सुविधाजनक सफर का अनुभव बदलने वाली होगी जिसका अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना तय है, इसिलिए इसे ट्रांसपोर्ट रिवोल्यूशन कहा जा रहा है.

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गेम-चेंजर इम्पैक्ट

नमो भारत कॉरिडोर का असर अगले तीन फेज या चरणों दिखेगा. अगर इन तीन चरणों को एक, पांच और 10 सालों में देखें तो पहले साल में नमो भारत कॉरिडोर में सुविधा दिखेंगी. दिल्ली–मेरठ डेली यात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ेगी. सड़क ट्रैफिक में शुरुआती कमी आएगी. दफ्तर जाने वालों और स्टूडेंट्स का शिफ्ट रोड से ट्रेन पर हो सकता है. इससे इस ट्रांजिट एरिया में छोटे बिजनेस, कैफे, दुकानें बढ़ेंगीं. 

शुरुआती पांच सालों में एनसीआर में जॉब मार्केट एकीकृत होने लगेगा. इस कॉरिडोर के स्टेशनों के पास रियल एस्टेट हॉट स्पॉट बनेंगे. कंपनियां छोटे शहरों में अपने दफ्तर खोलना शुरू करेंगी. सड़कों से ट्रैफिक के इस कॉरिडोर में शिफ्ट होने से रोड इन्फ्रास्ट्रक्चर पर दबाव कम होगा. यानी पांच सालों में इसका असर यहां की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

वहीं तीसरे चरण यानी 10 सालों में यह पूरा क्षेत्र एक मेगा इकॉनमी जोन बन सकता है. जहां नए टेक पार्क विकसित किए जा सकते हैं और इसका सीधा फायदा गाजियाबाद, मोदीनगर जैसे आसपास के शहरों को मिलेगा. नए इंडस्ट्रियल क्लस्टर बन सकते हैं. कुल मिलाकर इस कॉरिडोर का असर शहरी विकास पर पड़ेगा और यह केवल बड़े शहरों (दिल्ली) तक सीमित नहीं रहेगा.

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NCR में ऐसे और कौन-कौन से मेगा ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट चल रहे हैं?

एनसीआर में चल रहे और प्रस्तावित आरआरटीएस (RRTS) कॉरिडोर में दिल्ली-मेरठ चालू हो गया है. इसके अलावा कई और योजनाएं हैं जिन्हें या तो स्वीकृति मिल चुकी है या फिर उनमें निर्माण कार्य शुरू होना है.

सराय काले खां–बावल कॉरिडोर
लंबाई: 93 किमी
लागत: 32,000 करोड़ रुपये
रूट: दिल्ली-गुरुग्राम-मानेसर-बावल
कैबिनेट मंजूरी अभी बाकी है.

सराय काले खां–करनाल कॉरिडोर
लंबाई: 136 किमी
लागत: 33,000 करोड़ रुपये 
रूट: दिल्ली-सोनीपत-पानीपत-करनाल
डीपीआर तैयार है आगे मंजूरी चरण.

गुरुग्राम–फरीदाबाद–नोएडा कॉरिडोर
लंबाई: 61 किमी
लागत: 15,000 करोड़ रुपये
निर्माण शुरू होने का लक्ष्य: 2026 के आसपास

दीर्घकालिक योजना के तहत एनसीआर में कुल प्रस्तावित आठ कॉरिडोर हैं. ट्रांसपोर्ट मास्टर प्लान-2032 में 8 हाई-स्पीड कॉरिडोर सुझाए गए हैं. जैसे:
दिल्ली–अलवर
दिल्ली–पलवल
दिल्ली–रोहतक
गाजियाबाद–खुर्जा
गाजियाबाद–हापुड़

प्राथमिकता में रखे गए कॉरिडोर
दिल्ली–मेरठ
दिल्ली–अलवर
दिल्ली–पानीपत

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एनसीआर के बाहर भारत में ऐसे प्रोजेक्ट

सरकार ने देशभर में लगभग 2900 किमी RRTS नेटवर्क की संभावनाएं चिन्हित की हैं. जिससे यह केवल एनसीआर प्रोजेक्ट नहीं रह जाएगा. इसे राष्ट्रीय शहरी कनेक्टिविटी मॉडल बनाया जा रहा है. जिन शहरों में फिलहाल इसे बनाने की योजना है उनमें ये शामिल हैं.

बेंगलुरु–मैसूर–तुमकुर–होसुर
चेन्नई–वेल्लोर–विल्लुपुरम
हैदराबाद–वारंगल

सरकारी आकलन के मुताबिक RRTS को बनाने के पीछे उद्देश्य ये है कि इससे लाखों की संख्या में प्रतिदिन शहरी सड़कों से निजी वाहनों के संचालन को रोका जा सकता है. इससे लाखों किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन कम होगा और लाखों की संख्या में रोजगार पैदा होंगे. कुल मिलाकर आरआरटीएस को मल्टी सिटी ग्रोथ इंजन के रूप में देखा जा रहा है.

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