Bashir Badr Death News: बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अयोध्या) में हुआ था. उनका रिश्ता, बरेली, मेरठ और फिर भोपाल से भी रहा, जहां उनका आखिरी वक्त बीता. मेरठ दंगों ने बशीर बद्र की पूरी जिंदगी बदल दी थी और सब कुछ राख होने से उन्हें गहरा सदमा लगा था. उनका असली नाम सैयद मोहम्मद बद्र था. बचपन से ही उनका झुकाव साहित्य की ओर था. महज 7 साल की उम्र से ही उन्होंने शेरो शायरी लिखना शुरू कर दी. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से पढ़ाई की. उन्होंने बीए, एमए और फिर उर्दू साहित्य में पीएचडी की डिग्री हासिल की. फिर एएमयू में ही लेक्चरर बन गए.
बशीर बद्र कैसे बने मशहूर शायर
बशीर बद्र ने उर्दू गजल को पारंपरिक और भारी भरकम लफ्जों के जाल से बाहर निकाला. उन्होंने उर्दू शायरी में फारसी या अरबी के कठिन लफ्जों की जगह बहुत सरल हिंदी, उर्दू भाषा का इस्तेमाल किया. इस शेर ने उन्हें ऊंचा मुकाम दिलाया. बशीर बद्र का मानना था कि शायरी दिल की आवाज होनी चाहिए, ताकि आम आदमी के दिलोदिमाग को वो छू जाए. बशीर बद्र की गजलें और शेर आज भी भारत के संसद में देश के प्रधानमंत्रियों और बड़े नेताओं द्वारा अक्सर कोट किए जाते हैं.
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए.
मेरठ में जिंदगी के मुश्किल
अलीगढ़ के बाद बशीर बद्र उत्तर प्रदेश के मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष बने और लगभग 17 वर्षों तक वहां रहे. मेरठ में उनका एक खूबसूरत बंगला था, लेकिन उनकी जिंदगी भर की कमाई, नायाब किताबें और गजलें और डायरियां यहां महफूज रखी थीं. लेकिन 1987 के मेरठ दंगों में दंगाइयों ने उनके घर को लूटा और आग के हवाले कर दिया. बशीर बद्र का आशियाना, उनकी डिग्रियां, उनकी नायाब शायरी के पन्ने सब कुछ जलकर राख हो गए. उन्हें अंदर से तोड़ दिया और उन्हें गहरा सदमा लगा. काफी समय तक लिखना भी छोड़ दिया था.
विशाल भारद्वाज ने लिखीं शायरी
फिल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज उस समय कॉलेज में थे और बशीर साहब के घर अक्सर जाते थे. जब बशीर साहब की गजलें जल गईं तो भारद्वाज ने अपनी याददाश्त के दम पर बशीर बद्र की लगभग 90 फीसदी गजलें दोबारा लिखकर उनको दीं.बशीर बद्र के मुंह से वो ये शायरी सुना करते थे. मेरठ दंगे के बाद बशीर बद्र गुमनामी में चले गए और कुछ वक्त बरेली में गुजारा.फिर दोस्तों की सलाह पर भोपाल पहुंचे. भोपाल की शांत आबोहवा और अदबी माहौल ने उनके जख्मों पर मरहम लगाया.
भोपाल में डॉ. राहत से निकाह
भोपाल में बशीर बद्र की मुलाकात डॉक्टर राहत से हुई, जिनसे बाद में उन्होंने निकाह किया.राहत ने बशीर साहब को उस सदमे से बाहर निकाला और उनकी जिंदगी दोबारा पटरी पर लौटी. बशीर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा था, खुदा ने मुझे गजलों का शहर तोहफे में दिया है, मैं इस सल्तनत को मोहब्बत के नाम करता हूं. भोपाल में उन्होंने अपना नया घर बनाया और फिर से लिखना शुरू किया.
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बशीर बद्र को कई पुरस्कार और सम्मान मिले
बशीर बद्र को साहित्य में उनके योगदान के लिए 1999 में पद्म श्री से नवाजा गया. उसी साल साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रसिद्ध काव्य संग्रह 'आस' के लिए मिला. इकाई, आहट, आमद और कल्लियते बशीर बद्र जैसी कई मशहूर किताबें उन्होंने लिखीं. बशीर बद्र डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) से जूझ रहे थे. बशीर बीमारी के कारण मुशायरों के सुनहरे दिनों में अपनी शेरोशायरी भूल चुके थे. लेकिन उनकी लिखी गजलें हमेशा अमर रहेंगी.
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