
कानून मंत्री सदानंद गौड़ा (फाइल फोटो)
नई दिल्ली:
उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के कानून को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त करने के करीब एक महीने बाद सरकार ने इस बात पर जोर दिया है कि संसद को शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों को नियुक्त करने की प्रक्रिया और मानदंडों का 'संचालन' करने का 'अधिकार' है।
लोकसभा में एक सवाल के लिखित उत्तर में विधि मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने कहा, 'संसद को संविधान के दायरे में उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों को नियुक्ति करने की प्रक्रिया और मनदंडों के संचालन करने का अधिकार है।' निचले सदन में 10 सदस्यों ने सरकार से सवाल पूछा था कि क्या सरकार राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति अधिनियम 2014 की समीक्षा का प्रस्ताव करती है। सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्तूबर को इस कानून को निरस्त कर दिया था।
सदस्यों ने शीर्ष अदालत के फैसले के बाद सरकार के प्रस्तावित कदमों का ब्यौरा मांगा था। विधि मंत्री ने कहा कि शीर्ष अदालत के फैसले के बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति की कालेजियम प्रणाली फिर से परिचालन में आ गई है। गौड़ा ने कहा कि सरकार उच्चतम न्यायालय कालेजियम प्रणाली के कामकाज को बेहतर बनाने के लिए उपयुक्त कदम उठाने पर विचार कर रही है और उसने इस संबंध में सुझाव पेश किए हैं। एनजेएसी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पहली बार विधि मंत्री ने संसद में इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है।
लोकसभा में एक सवाल के लिखित उत्तर में विधि मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने कहा, 'संसद को संविधान के दायरे में उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों को नियुक्ति करने की प्रक्रिया और मनदंडों के संचालन करने का अधिकार है।' निचले सदन में 10 सदस्यों ने सरकार से सवाल पूछा था कि क्या सरकार राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति अधिनियम 2014 की समीक्षा का प्रस्ताव करती है। सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्तूबर को इस कानून को निरस्त कर दिया था।
सदस्यों ने शीर्ष अदालत के फैसले के बाद सरकार के प्रस्तावित कदमों का ब्यौरा मांगा था। विधि मंत्री ने कहा कि शीर्ष अदालत के फैसले के बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति की कालेजियम प्रणाली फिर से परिचालन में आ गई है। गौड़ा ने कहा कि सरकार उच्चतम न्यायालय कालेजियम प्रणाली के कामकाज को बेहतर बनाने के लिए उपयुक्त कदम उठाने पर विचार कर रही है और उसने इस संबंध में सुझाव पेश किए हैं। एनजेएसी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पहली बार विधि मंत्री ने संसद में इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है।
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